अमेरिका से जंग नहीं हारा ईरान, हथियारों के जखीरे से ताकत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता
अंतरराष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक कूटनीति और मध्य पूर्व (Middle East) में चल रहे महासंग्राम के बीच भारत से एक बहुत ही बड़ा और चौंकाने वाला बयान सामने आया है। बिहार के राज्यपाल ने ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे लंबे तनाव और संघर्ष को लेकर एक बेहद स्पष्ट और दो टूक बयान देते हुए यह कहा है कि ईरान को केवल हथियारों या सैन्य उपकरणों के जखीरे के आधार पर कमजोर नहीं आंका जा सकता और वह अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने अपनी संप्रभुता के लिए डटकर खड़ा है। राज्यपाल के इस कड़े और बेबाक बयान ने भारतीय कूटनीतिक हलकों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा वैश्विक राजनीति और ईरान के प्रतिरोध पर इस प्रकार की बेबाक टिप्पणी करना इस बात का संकेत देता है कि भारत के रणनीतिक विचारक वैश्विक शक्ति संतुलन को किस गहराई से परख रहे हैं। आइए इस विशेष रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि राज्यपाल के इस बयान के क्या सियासी और कूटनीतिक मायने हैं और इसके पीछे की असली इनसाइड स्टोरी क्या है।
मध्य पूर्व का सुलगता रण और अमेरिका-ईरान के बीच सदियों पुराना भू-राजनीतिक संघर्ष
दुनिया के नक्शे पर जब भी पश्चिम एशिया यानी मध्य पूर्व का जिक्र होता है, तो जेहन में बारूद के ढेरों और महाशक्तियों की चालों की तस्वीरें घूमने लगती हैं। पिछले कई दशकों से अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से संघर्ष का दौर जारी रहा है, जिसमें कभी आर्थिक प्रतिबंधों के हथियार चलाए जाते हैं, तो कभी क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्धों के जरिए अपनी ताकत का लोहा मनवाया जाता है। अमेरिका के पास दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक, अत्याधुनिक फाइटर जेट्स, एयरक्राफ्ट कैरियर और परमाणु हथियारों का असीम भंडार है, जिसके बल पर वह पूरी दुनिया पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है। इसके विपरीत, ईरान ने दशकों तक चले कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद अपने स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम, ड्रोन तकनीक और वैचारिक नेटवर्क को मजबूत किया है। ऐसे में जब दुनिया की कोई महाशक्ति किसी देश को आर्थिक या सैन्य रूप से दबाने की कोशिश करती है, तो वहां की जनता और शासन का मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध किस स्तर का होता है, इसी बात को रेखांकित करते हुए बिहार के राज्यपाल ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं बल्कि राष्ट्र की वैचारिक इच्छाशक्ति से लड़े और जीते जाते हैं।
हथियारों की चमक से तय नहीं होती जीत: राज्यपाल का ईरान की प्रतिरोधक क्षमता पर बड़ा तर्क
बिहार के राज्यपाल ने अपने संबोधन और चर्चा के दौरान इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक युद्धक विमानों, मिसाइलों और परमाणु हथियारों के अंबार होने मात्र से यह तय नहीं हो जाता कि कोई देश अजेय हो गया है। इतिहास इस बात गवाह है कि वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान और मध्य पूर्व के कई संघर्षों में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियां भी स्थानीय जनता के कड़े प्रतिरोध और आत्मबल के आगे पस्त हो चुकी हैं। ईरान के पास भले ही अमेरिका जैसी आधुनिक और खर्चीली सैन्य तकनीक न हो, लेकिन वहां की संस्कृति, ऐतिहासिक निरंतरता और वैचारिक दृढ़ता उसे एक ऐसा लचीलापन देती है जिसके चलते वह किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने से इनकार कर देता है। राज्यपाल का यह बयान इस बात की याद दिलाता है कि कूटनीति और युद्ध के मैदान में केवल भौतिक संसाधन ही सब कुछ नहीं होते, बल्कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी जनता का वह मनोबल होता है जो विषम से विषम परिस्थितियों में भी हार मानना नहीं जानता।
वैश्विक कूटनीति के पटल पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और उसके गहरे मायने
भारत हमेशा से गुटनिरपेक्षता और 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांतों पर चलते हुए अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता आया है, जहां वह एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक व व्यापारिक रिश्ते मजबूत करता है, तो दूसरी तरफ ईरान जैसे पुराने मित्रों के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को भी नजरअंदाज नहीं करता है। मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने और कच्चे तेल की सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए भारत के हित दोनों पक्षों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जब देश के भीतर से इस तरह के संतुलित और वैचारिक रूप से परिपक्व बयान सामने आते हैं, तो वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की निष्पक्ष और दूरदर्शी सोच को दर्शाते हैं। दुनिया भर के भू-राजनीतिक विश्लेषक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि कैसे भारत वैश्विक महाशक्तियों के बीच बिना किसी दबाव के अपनी स्वतंत्र राय रखने का माद्दा रखता है, और राज्यपाल का यह बयान इसी रणनीतिक स्वायत्तता का एक जीवंत उदाहरण माना जा रहा है।
क्या ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे इस शीत युद्ध का कोई शांतिपूर्ण समाधान संभव है?
आज पूरी दुनिया एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां जरा सी चूक तृतीय विश्व युद्ध या एक बड़े क्षेत्रीय महासंग्राम को जन्म दे सकती है। ईरान पर लगातार बढ़ते दबाव, परमाणु वार्ताओं के टूटने और खाड़ी देशों में तैनात अमेरिकी युद्धपोतों के बीच यह सवाल हर किसी के मन में है कि क्या इस तनाव का कोई कूटनीतिक हल निकल सकता है। राज्यपाल के बयान ने इस बात की ओर इशारा किया है कि ताकत के बल पर किसी राष्ट्र को हमेशा के लिए गुलाम या लाचार नहीं बनाया जा सकता, और अंततः संवाद तथा आपसी सम्मान के रास्ते पर ही दुनिया का भविष्य टिका है। ईरान जैसे देश अपनी रणनीतिक स्थिति और भौगोलिक महत्व के कारण मध्य पूर्व की धुरी हैं, जिन्हें पश्चिमी देश चाहकर भी पूरी तरह से दरकिनार नहीं कर सकते। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच कभी आपसी तनाव कम होता है या फिर यह संघर्ष वैश्विक राजनीति को और अधिक जटिल बनाता चला जाता है।