'औरंगजेब नहीं, ब्राह्मण ने लगाया था ब्रेस्ट टैक्स', प्रशांत भूषण की SC में दलील, फिर जज ने पूछे तीखे सवाल
सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में हाल ही में एक ऐसी ऐतिहासिक और सामाजिक सुनवाई देखने को मिली, जिसने न केवल कानूनी विशेषज्ञों बल्कि पूरे देश के प्रबुद्ध वर्ग का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष बहस करते हुए एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दे को उठाया। उन्होंने दलील देते हुए दावा किया कि दक्षिण भारत के त्रावणकोर साम्राज्य में महिलाओं पर लगाए गए तथाकथित 'ब्रेस्ट टैक्स' (Mulamkaram / मुलाकरम) का संबंध मुगल शासक औरंगजेब से नहीं था, बल्कि यह कर तत्कालीन उच्च जाति और ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था का परिणाम था। प्रशांत भूषण की इस तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणी के बाद शीर्ष अदालत के कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। उन्होंने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए कई ऐतिहासिक संदर्भों और विद्वानों की शोध पुस्तकों का उल्लेख करते हुए तर्क दिया कि इतिहास को अक्सर गलत तरीके से पेश किया जाता है और समाज के वंचित वर्गों पर थोपी गई कुरीतियों का ठीकरा गलत शासकों के सिर फोड़ा जाता है।
प्रशांत भूषण की दलील पर सुप्रीम कोर्ट के जज ने पूछे तीखे और चुभते सवाल: 'क्या इतिहास की हर कुरीति की सुनवाई अदालत में संभव है?'
प्रशांत भूषण द्वारा अदालत के समक्ष रखी गई इस विवादित और ऐतिहासिक दलील को सुनने के बाद पीठ के माननीय न्यायाधीशों ने कड़ा और विचारणीय रुख अपनाया। जज ने प्रशांत भूषण की दलील पर तीखे और चुभते सवाल पूछते हुए कहा कि आखिर सदियों पुराने इतिहास के पन्नों, सामाजिक व्यवस्थाओं और धार्मिक मान्यताओं को आज के आधुनिक दौर में अदालती याचिकाओं का हिस्सा क्यों बनाया जा रहा है? जज ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या आज के समय में सुप्रीम कोर्ट का काम यह तय करना है कि सदियों पहले कौन सा कर किस शासक या किस सामाजिक वर्ग ने लगाया था? पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इतिहास में कई ऐसी प्रथाएं और कर रहे हैं जो आज के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं, लेकिन इतिहास की हर घटना या सामाजिक बुराई का राजनीतिक और कानूनी रूप से पुनर्मूल्यांकन करना न्यायपालिका के प्राथमिक अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद याचिकाकर्ता और वकीलों के बीच तीखी बहस का माहौल बन गया।
क्या था त्रावणकोर का विवादित 'ब्रेस्ट टैक्स' (मुलाकरम)? जानिए क्या कहते हैं इतिहास के पन्ने और शोध पत्र
प्रशांत भूषण द्वारा सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए 'ब्रेस्ट टैक्स' या 'मुलाकरम' के मुद्दे ने एक बार फिर इतिहास के उस काले पन्ने को खोल दिया है, जो 19वीं सदी की शुरुआत तक त्रावणकोर (वर्तमान केरल) राज्य में लागू था। इतिहास के पन्नों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, यह कोई आधुनिक अर्थों में सरकारी टैक्स नहीं था, बल्कि निचली जाति की महिलाओं (विशेषकर ईझवा और नाडार समुदाय) को अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने से रोकने और उन पर सामाजिक आधिपत्य बनाए रखने के लिए लगाया गया एक बेहद क्रूर सामाजिक नियम था। यदि कोई महिला अपने वक्ष को ढकना चाहती थी, तो उसे अपनी शारीरिक संरचना के हिसाब से कर देना पड़ता था। इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ 'नांगेली' नाम की एक वीर महिला ने अपने प्राणों की आहुति देकर विद्रोह किया था, जिसके बाद इस प्रथा को अंततः समाप्त कर दिया गया था। प्रशांत भूषण ने इसी ऐतिहासिक घटना का हवाला देकर यह साबित करने की कोशिश की कि इस कुरीति का मुगल शासकों या औरंगजेब से कोई लेना-देना नहीं था।
न्यायिक समय का उपयोग बनाम इतिहास का पुनर्लेखन: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से क्या निकलता है बड़ा संदेश?
सुप्रीम कोर्ट में हुई इस पूरी सुनवाई और न्यायाधीशों के तीखे सवालों से यह बड़ा संदेश साफ होकर सामने आता है कि न्यायपालिका ऐतिहासिक विवादों को सुलझाने का मंच नहीं बन सकती। कानूनी जानकारों का कहना है कि आज के दौर में जब अदालतों में लाखों की संख्या में महत्वपूर्ण संवैधानिक, नागरिक और आपराधिक मामले लंबित पड़े हैं, तब ऐतिहासिक कथाओं और सदियों पुरानी सामाजिक बुराइयों पर बहस करने में न्यायिक समय नष्ट करना उचित नहीं है। प्रशांत भूषण और सुप्रीम कोर्ट के बीच हुई इस तीखी बहस ने देश भर के सामाजिक और कानूनी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है कि इतिहास के घावों और विवादों को अदालती कमरों से दूर रखकर शोधकर्ताओं और इतिहासकार के हवाले ही छोड़ देना चाहिए।