16 राज्यों में स्पेशल समरी रिवीजन और मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम अटका

16 राज्यों में स्पेशल समरी रिवीजन और मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम अटका

भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के गलियारों से इस वक्त एक बेहद बड़ी और संवेदनशील राजनीतिक प्रशासनिक खबर सामने आ रही है। देश के करीब 16 राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण यानी स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) की प्रक्रिया फिलहाल अनिश्चितता के दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि चुनाव आयोग के भीतर ही इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया के क्रियान्वयन को लेकर अंदरूनी मतभेद और वैचारिक दूरियां पैदा हो गई हैं। सूत्रों का कहना है कि जब तक इस पूरे मामले पर कोई स्पष्ट और पुख्ता कानूनी दिशा-निर्देश प्राप्त नहीं हो जाते, तब तक इन सोलह राज्यों में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए इंतजार करने की नीति अपनाई गई है, जिससे प्रशासनिक मशीनरी में भी सुस्ती देखी जा रही है।

हेगड़े केस का कानूनी पेंच और अटॉर्नी जनरल की राय का महत्व

इस पूरे गतिरोध के केंद्र में प्रमुख रूप से एक महत्वपूर्ण न्यायिक मामला यानी 'हेगड़े केस' और देश के शीर्ष विधि अधिकारी यानी अटॉर्नी जनरल (AG) की कानूनी राय का इंतजार बना हुआ है। चुनाव आयोग से जुड़े नीतिगत मामलों में कानूनी वैधता सुनिश्चित करने के लिए अटॉर्नी जनरल का परामर्श बेहद अहम माना जाता है। हाल ही में सामने आए कानूनी पेंच और पूर्व के न्यायिक दृष्टांतों को देखते हुए आयोग के भीतर यह बहस छिड़ गई है कि क्या बिना अटॉर्नी जनरल की हरी झंडी और विस्तृत विधिक समीक्षा के इतने बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण अभियान को अमलीजामा पहनाना सही होगा या नहीं। यही वजह है कि कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए आयोग के भीतर ही इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जाए ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की संवैधानिक या कानूनी चुनौती का सामना न करना पड़े।

चुनाव आयोग के भीतर अंदरूनी मतभेद और फैसलों पर सवाल

किसी भी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के भीतर जब प्रशासनिक निर्णयों को लेकर मतभेद उभरते हैं, तो उसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होना लाजमी है। चुनाव आयोग के अंदर भी इस बात को लेकर दो अलग-अलग राय बनती नजर आ रही हैं कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के तौर-तरीकों को किस प्रकार लागू किया जाना चाहिए। एक धड़ा जहां प्रशासनिक गतिशीलता और समय पर प्रक्रिया पूरी करने के पक्ष में है, वहीं दूसरा धड़ा हर एक विधिक बारीकी और अदालती फैसलों के प्रभावों का बारीकी से अध्ययन करने की वकालत कर रहा है। इस अंदरूनी खींचतान के कारण कई महत्वपूर्ण फाइलें और आदेश फिलहाल लंबित पड़े हैं, जिसका असर सीधे तौर पर उन राज्यों की चुनावी तैयारियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ रहा है जहां यह प्रक्रिया प्रस्तावित है।

चुनावी राज्यों और प्रशासनिक तैयारियों पर पड़ने वाला सीधा असर

जिन 16 राज्यों में एसएआर (SSR) या विशेष पुनरीक्षण की प्रक्रिया लंबित है, वहां के स्थानीय चुनावी ढांचे और जिला प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। बूथ लेवल से लेकर जिला निर्वाचन कार्यालय तक के अधिकारी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि वे अपनी आगामी कार्ययोजना किस प्रकार तैयार करें। मतदाता सूचियों की शुचिता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन शीर्ष स्तर पर कानूनी राय के अभाव और आपसी मतभेदों के चलते यदि इसमें देरी होती है, तो इसका असर भविष्य के चुनावी कार्यक्रमों की समय-सारणी पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक दल भी इस पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं और वे यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि आयोग के इस विलंब का उनकी राजनीतिक रणनीतियों पर क्या असर होगा।

भविष्य की दिशा और कानूनी स्पष्टता की उम्मीद

आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि अटॉर्नी जनरल की तरफ से चुनाव आयोग को क्या औपचारिक विधिक राय सौंपी जाती है। जैसे ही कानूनी राय स्पष्ट होगी और हेगड़े केस के संदर्भ में स्थिति साफ होगी, वैसे ही चुनाव आयोग के भीतर चल रहे मतभेदों के भी थमने की उम्मीद जताई जा रही है। देश के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष, पारदर्शी और विवादमुक्त रखना आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और इसके लिए हर एक कानूनी पहलू को साधना जरूरी है। उम्मीद की जा रही है कि बहुत जल्द आयोग इन सोलह राज्यों के संबंध में कोई ठोस और सर्वमान्य निर्णय लेगा, जिससे प्रशासनिक अनिश्चितता का यह दौर समाप्त हो सके और मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम सुचारू रूप से आगे बढ़ सके।