ये कांग्रेस शासित राज्य लेकर आ रहा अपनी अलग स्पेस पॉलिसी, अंतरिक्ष से कचरा हटाने पर प्लान
भारत के प्रमुख प्रौद्योगिकी केंद्र और दक्षिण भारतीय राज्य कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में क्रांति लाने की दिशा में एक बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और आईटी/बीटी मंत्री प्रियंक खरगे के नेतृत्व में राज्य सरकार ने देश की पहली समर्पित राज्य-स्तरीय 'ड्राफ्ट स्पेस टेक पॉलिसी 2024-2029' का अनावरण किया है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु और उसके आसपास के क्षेत्रों में पहले से मौजूद एयरोस्पेस और सैटेलाइट इकोसिस्टम को नए पंख प्रदान करना है। कर्नाटक सरकार की इस दूरदर्शी नीति से न केवल भारत के अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र में वैश्विक निवेश को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यह भारत को स्पेस इकोनॉमी में अग्रणी शक्ति बनाने की दिशा में भी एक निर्णायक मील का पत्थर साबित होगी।
अंतरिक्ष का कचरा साफ करने और स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस पर विशेष फोकस
इस नई नीति की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विशेषता यह है कि इसमें 'स्पेस देब्रिस' यानी अंतरिक्ष में जमा हो रहे कचरे को हटाने और स्पेस डोमेन अवेयरनेस (SDA) पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। पृथ्वी की कक्षा में लगातार बढ़ते निष्क्रिय उपग्रहों और मलबे के टुकड़ों से सक्रिय सैटेलाइट्स के टकराने का खतरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। कर्नाटक सरकार ने इस वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्थानों तथा प्राइवेट कंपनियों को आकर्षित करने का खाका तैयार किया है। इस नीति के जरिए अंतरिक्ष में कचरे की ट्रैकिंग करने वाली तकनीकों, रोबोटिक क्लीयरेंस आर्म्स, डी-ऑर्बिटिंग मैकेनिज्म और एक्टिव देब्रिस रिमूवल (ADR) स्टार्टअप्स को विशेष अनुदान, प्रोत्साहन और बुनियादी ढांचा मुहैया कराया जाएगा।
बैंगलोर से मैसूर तक 50% वैश्विक और 75% राष्ट्रीय स्पेस टेक मार्केट पर कब्जा करने का लक्ष्य
कर्नाटक पहले से ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), एचएएल (HAL) और कई प्रमुख वैमानिकी संस्थानों का गढ़ रहा है। राज्य सरकार की इस नई नीति का लक्ष्य वर्ष 2029 तक देश की कुल स्पेस इकोनॉमी में 75 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करना और वैश्विक बाजार में कम से कम 50 प्रतिशत की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराना है। इस रणनीति के तहत बैंगलोर के अलावा मैसूर, हुबली-धारवाड़ और मंगलोर जैसे दूसरे और तीसरे श्रेणी के शहरों में भी एयरोस्पेस पार्क, टेस्टिंग फैसिलिटीज और इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए जाएंगे। इससे न केवल बैंगलोर पर बढ़ता दबाव कम होगा, बल्कि राज्य के अन्य हिस्सों में भी उच्च-तकनीकी रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे।
स्टार्टअप्स और एमएसएमई के लिए करोड़ों की वित्तीय सहायता और टैक्स में बड़ी छूट
निजी अंतरिक्ष कंपनियों और नवोन्मेषी युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कर्नाटक सरकार ने वित्तीय रियायतों का बड़ा पिटारा खोला है। इस नीति के तहत मान्यता प्राप्त स्पेस स्टार्टअप्स को शोध और विकास (R&D) के लिए 10 करोड़ रुपये तक की अनुदान राशि, पेटेंट फाइलिंग पर सब्सिडी और अत्याधुनिक लैब्स में प्राथमिकता से पहुंच दी जाएगी। इसके अलावा, राज्य सरकार ने स्पेस-टेक मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों को गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) रिफंड, बिजली दरों में राहत, स्टाम्प ड्यूटी में छूट और पूंजीगत परिसंपत्तियों पर विशेष इंसेंटिव देने का ऐलान किया है। सरकार का यह कदम भारत के 'इन-स्पेस' (IN-SPACe) सुधारों को राज्य स्तर पर धरातल पर उतारने का सबसे बेहतरीन मॉडल माना जा रहा है।
निष्कर्ष: वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत के नेतृत्व का नया अध्याय
कर्नाटक सरकार का यह कदम केवल एक राज्य नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के अंतरिक्ष भविष्य को एक नई दिशा देने वाला विजन दस्तावेज है। अंतरिक्ष से कचरा हटाने जैसे अत्याधुनिक विषय पर नीतिगत रूप से ध्यान केंद्रित करना यह दर्शाता है कि भारत केवल उपग्रह प्रक्षेपण में ही नहीं, बल्कि अंतरिक्ष सुरक्षा और सतत विकास में भी विश्व का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है। यदि इस नीति के प्रावधानों को धरातल पर समयबद्ध तरीके से लागू किया जाता है, तो कर्नाटक बहुत जल्द दुनिया भर की प्रमुख स्पेस टेक कंपनियों, निवेशकों और वैज्ञानिकों के लिए सबसे आकर्षक वैश्विक केंद्र बनकर उभरेगा।