'गलत सहानुभूति…' इलाहाबाद हाईकोर्ट के किस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा, दिया ये आदेश

'गलत सहानुभूति…' इलाहाबाद हाईकोर्ट के किस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा, दिया ये आदेश

देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने न्याय प्रक्रिया और आपराधिक मुकदमों में सजा तय करने के सिद्धांतों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक पुराने आपराधिक मामले के फैसले की तीखी आलोचना करते हुए साफ कहा कि अपराध की भयावहता और पीड़ित के दर्द को दरकिनार कर दोषियों के प्रति दिखाई गई 'गलत सहानुभूति' न्याय का गला घोंटने जैसा है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून की बड़ी-बड़ी और क्लिष्ट व्याख्याओं के आधार पर ऐसे अपराधियों को राहत दे दी गई, जिन्होंने गंभीर जुर्म किया था और वे बिना एक दिन भी जेल की सजा काटे पूरी तरह साफ बच निकले। शीर्ष अदालत की इस सख्त टिप्पणी ने अधीनस्थ न्यायालयों और उच्च न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले ऐसे फैसलों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां मुकदमे में हो रही देरी या लंबे ट्रायल का हवाला देकर गंभीर अपराध के दोषियों को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत छोड़ दिया जाता है।

यह पूरा सनसनीखेज मामला उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले का है, जो साल 2003 में घटी एक हिंसक वारदात से जुड़ा हुआ है। बहराइच में पीड़ित ने आरोपियों की दुकान के ठीक पास अपनी एक नई दुकान खोली थी, जिसे लेकर दोनों पक्षों के बीच व्यावसायिक रंजिश पनप गई थी। इसी रंजिश के चलते आरोपियों ने योजनाबद्ध तरीके से पीड़ित पर हमला कर दिया। हमले के दौरान एक आरोपी के पास धारदार हथियार था तो दूसरे के पास बंदूक मौजूद थी। उन्होंने पीड़ित पर इतने बर्बर तरीके से हमला किया कि वह खून से लथपथ होकर बेहोश हो गया और उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। इस बर्बर हमले के कारण पीड़ित के दोनों हाथों की कार्यक्षमता हमेशा के लिए बहुत हद तक खत्म हो गई और वह आज भी इस शारीरिक अपंगता तथा मानसिक आघात का इलाज कराने को मजबूर है।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों की गंभीरता को देखते हुए उन्हें पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। लेकिन जब यह मामला अपील के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958' की धारा 4 का सहारा लेते हुए दोनों दोषियों को अच्छे आचरण की शर्त पर परिवीक्षा यानी प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दे दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह तर्क दिया था कि मुकदमे को चलते हुए 22 साल का लंबा वक्त बीत चुका है और आरोपी पहली बार अपराध करने वाले हैं। हालांकि, इस फैसले के कारण स्थिति यह बनी कि जानलेवा हमला करने वाले दोनों आरोपी बिना एक भी दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारे आजाद घूमते रहे। पीड़ित के भाई ने जब इस अन्याय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की, तब जाकर इस पूरी न्यायिक ढिलाई की परतें उधड़नी शुरू हुईं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भारी हैरानी व्यक्त की कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक चरित्र की प्रतिकूल रिपोर्ट होने के बावजूद उन्हें राहत कैसे दे दी गई। पीठ ने तल्ख लहजे में कहा कि यह तर्क पूरी तरह गलत है कि आरोपी 22 वर्षों से मुकदमे का कष्ट झेल रहे थे, क्योंकि वे तो इस पूरी अवधि में जमानत पर बाहर थे और मजे से अन्य आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त थे। अदालत ने कहा कि पहली बार अपराध करने की आड़ में इतने वीभत्स अपराध के दोषियों को प्रोबेशन पर नहीं छोड़ा जा सकता, खासकर तब जब पीड़ित की जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो गई हो। सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिहाई संबंधी आदेश को पूरी तरह रद्द करते हुए दोनों दोषियों को दो सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करने का सख्त निर्देश दिया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अपीलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के समक्ष पुनः बहाल करते हुए कहा है कि हाईकोर्ट अब आरोपियों को हिरासत में लेने के बाद ही इस मामले की नए सिरे से निष्पक्ष सुनवाई करे।