जैसलमेर में गोडावण प्रोजेक्ट को बड़ा झटका! आजादी पर लगा कड़ा पहरा
भारत के सबसे बड़े मरुस्थल और थार के रेगिस्तान की गोद में बसे जैसलमेर से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बेहद निराशाजनक और चिंताजनक खबर सामने आई है। राजस्थान के राज्य पक्षी और दुनिया भर में गंभीर रूप से विलुप्त होने की कगार पर खड़े 'गोडावण' यानी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) के संरक्षण और संवर्धन के लिए चलाए जा रहे महत्वाकांक्षी पुनर्वास (Rewilding) प्रोजेक्ट को एक बड़ा झटका लगा है। कृत्रिम प्रजनन केंद्र से निकालकर इन दुर्लभ पक्षियों को प्रकृति के खुले आसमान और खुले जंगल में दोबारा भेजने की प्रक्रिया चल रही थी, ताकि वे प्राकृतिक माहौल में जीना सीख सकें। लेकिन जैसलमेर के प्रसिद्ध डेजर्ट नेशनल पार्क (Desert National Park) क्षेत्र में हुए एक दुर्भाग्यपूर्ण और अचानक हादसे ने इन संरक्षित पक्षियों की आगे की 'रिहाई' पर फिलहाल रोक लगा दी है। इस अप्रत्याशित घटना के सामने आने के बाद वन्यजीव वैज्ञानिकों और वन विभाग के अधिकारियों की नींद उड़ गई है, और पूरे प्रोजेक्ट के सुरक्षा प्रोटोकॉल की नए सिरे से समीक्षा की जा रही है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर इस प्रोजेक्ट के सामने अचानक कौन सी बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है और उस हादसे की पूरी सच्चाई क्या है।
डेजर्ट नेशनल पार्क में छोड़े गए दुर्लभ गोडावण के साथ हुआ दर्दनाक हादसा और सामने आया सच
प्राप्त विस्तृत जानकारी के अनुसार, वन्यजीव संस्थान और वन विभाग के साझा प्रयासों के तहत रेवाइल्डिंग प्रोग्राम के अंतर्गत कुछ समय पहले ही कुछ छह महीने के कैपेटिव-ब्रेड (कैद में पाले गए) नर गोडावण पक्षी को जैसलमेर के खुले बियाबान जंगलों में छोड़ा गया था। उद्देश्य यह था कि ये पक्षी धीरे-धीरे प्राकृतिक परिवेश के अनुकूल ढल जाएं और अपनी प्रजाति की संख्या बढ़ाने में मददगार साबित हों। लेकिन कुछ दिन पहले ही इस प्रोजेक्ट को तब तगड़ा झटका लगा जब इनमें से एक दुर्लभ पक्षी मृत अवस्था में पाया गया। जब वन विभाग की विशेष ट्रैकिंग टीम और शोधकर्ताओं ने मौके पर पहुंचकर मुआयना किया, तो पता चला कि मरुस्थल में पाई जाने वाली एक चालाक रेगिस्तानी लोमड़ी (Desert Fox) ने इस खुले में छोड़े गए युवा गोडावण को अपना शिकार बना लिया। घटनास्थल से पक्षी के क्षत-विक्षत अवशेष, पंख और उसके शरीर पर लगाया गया वह सैटेलाइट ट्रैकिंग उपकरण भी बरामद कर लिया गया जिसके जरिए वैज्ञानिक उसकी हर एक गतिविधि पर नजर रख रहे थे। इस प्राकृतिक लेकिन झकझोर देने वाली घटना ने यह साबित कर दिया कि कृत्रिम माहौल से निकलकर पूरी तरह से जंगली और खुले परिवेश में उतरने वाले इन नाजुक पक्षियों के सामने प्रकृति के शिकारी जीवों का खतरा कितना बड़ा है।
बाकी बचे 7 दुर्लभ गोडावणों की रिहाई पर लगा पहरा, अब नए सिरे से तय होंगे सुरक्षा के कड़े नियम
इस अप्रत्याशित हादसे के बाद वन्यजीव वैज्ञानिकों और डेजर्ट नेशनल पार्क के प्रबंधन ने तुरंत आपातकालीन बैठक बुलाई और यह गंभीर निर्णय लिया कि जब तक सुरक्षा के सभी मानकों की दोबारा कड़ी समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक बाकी बचे अन्य दुर्लभ गोडावणों को खुले में छोड़ने के कार्यक्रम को अनिश्चितकाल के लिए रोक दिया जाए। योजना के मुताबिक आने वाले दिनों में लगभग सात और कैपेटिव-ब्रेड गोडावणों को प्राकृतिक वातावरण में रिलीज किया जाना था, लेकिन इस एक हादसे ने अधिकारियों को अत्यधिक सतर्क कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि खुले जंगल में छोड़ने से पहले पक्षियों की सेल्फ-डिफेंस (आत्मरक्षा) क्षमताओं, स्थानीय शिकारियों से बचने की ट्रेनिंग और उस विशेष क्षेत्र की भौगोलिक सुरक्षा का बारीकी से आकलन करना बेहद आवश्यक होता है। वन्यजीव संस्थान (WII) की विशेष टीमें अब इस बात पर मंथन कर रही हैं कि भविष्य में ऐसे हादसों को पूरी तरह से कैसे रोका जाए ताकि देश में अंतिम सांसें गिन रहे इन दुर्लभ पक्षियों के जीवन को किसी भी प्रकार का अनावश्यक जोखिम न उठाना पड़े।
गोडावण संरक्षण की राह में आने वाली चुनौतियां और देश भर के वन्यजीव प्रेमियों की उम्मीदें
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण केवल राजस्थान का ही नहीं बल्कि पूरे देश की पारिस्थितिकी विरासत का एक अनमोल रत्न है, जिनकी कुल संख्या अब दुनिया भर में बमुश्किल कुछ सौ ही बची है। इनके संरक्षण के लिए पिछले कई वर्षों से भारत सरकार और वन्यजीव संस्थान द्वाराकरोड़ों रुपये की लागत से कृत्रिम प्रजनन और संरक्षण केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। एक तरफ जहां पहले से ही बिजली के हाईटेंशन तारों की चपेट में आने से लगातार गोडावणों की मौत का सिलसिला चिंता का विषय बना हुआ था, वहीं अब खुले जंगलों में जंगली जीवों (शिकारियों) के हमले का यह नया खतरा सामने आ गया है। हालांकि पर्यावरणविदों का यह भी मानना है कि प्रकृति के नियमों के तहत जंगलों में इस तरह की घटनाएं कभी-कभार होना स्वाभाविक हैं, लेकिन संकटग्रस्त प्रजातियों के मामले में एक-एक पक्षी का जीवन बहुत अधिक मायने रखता है। देश भर के वन्यजीव प्रेमियों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि वन विभाग इस समीक्षा के बाद क्या नए सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू करता है, ताकि थार के रेगिस्तान में एक बार फिर ये भारी-भरकम पक्षी पूरी शान और सुरक्षा के साथ खुले आसमान में खुलकर उड़ान भर सकें।