दूसरे चरण में ग्रामीणों ने दिखाया उत्साह, अलवर-अजमेर में 82% से ज्यादा मतदान
राजस्थान के राजनीतिक और स्थानीय निकाय चुनावों के दूसरे चरण में एक बार फिर यह साबित हो गया है कि देश के ग्रामीण इलाकों में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी और मजबूत हैं। अलवर और अजमेर जिलों के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में हुए मतदान के दौरान सुबह से ही पोलिंग बूथों पर मतदाताओं की लंबी-लंबी कतारें देखने को मिलीं। ग्रामीण इलाकों की महिलाओं, बुजुर्गों और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं ने जिस जोश के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग किया, उसने सभी चुनावी अनुमानों को पीछे छोड़ दिया। निर्वाचन आयोग के अंतिम आंकड़ों के अनुसार, इन दोनों जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में कुल मिलाकर 82 प्रतिशत से अधिक का बंपर मतदान दर्ज किया गया है। रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग प्रतिशत इस बात का गवाह है कि ग्रामीण जनता अब अपने स्थानीय नेतृत्व और विकास कार्यों को लेकर कितनी जागरूक हो चुकी है।
सुबह की ठंड और लंबी कतारें: अलसुबह से ही पोलिंग बूथों पर उमड़ी ग्रामीणों की भीड़
मतदान के दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही अलवर और अजमेर के दूरदराज गांवों में पोलिंग स्टेशनों के बाहर मतदाताओं का तांता लगना शुरू हो गया था। कड़ाके की ठंड और सुबह के कोहरे की परवाह किए बिना बुजुर्ग हाथों में छड़ी थामे और महिलाएं अपने पारंपरिक परिधानों में मतदान केंद्रों की ओर बढ़ती नजर आईं। कई बूथों पर तो मतदान शुरू होने से एक घंटे पहले ही लोगों की लंबी कतारें लग चुकी थीं। ग्रामीणों में इस बात का गजब का उत्साह था कि वे अपने गांव के विकास और समस्याओं के समाधान के लिए सही नुमाइंदा चुनें। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, कई ग्रामीण अपने खेतों और पशुओं के काम को सुबह ही nipta कर सीधे मतदान केंद्र पहुंचे, जिससे यह साफ हो गया कि ग्रामीण जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकार को लेकर कितनी गंभीर और प्रतिबद्ध है।
महिलाओं और युवा मतदाताओं की ऐतिहासिक भागीदारी ने बदला चुनावी समीकरण
इस बार के दूसरे चरण के मतदान की सबसे बड़ी और खास विशेषता महिलाओं और युवा (First-time voters) मतदाताओं की भारी-भरकम भागीदारी रही। अलवर और अजमेर के ग्रामीण अंचलों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का मतदान प्रतिशत कई बूथों पर काफी आगे निकल गया। महिलाओं ने घर के कामकाज और चूल्हे-चौके की जिम्मेदारी से वक्त निकालकर बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया। उनका कहना था कि उन्हें एक ऐसा नेतृत्व चाहिए जो उनके गांवों में सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दे सके। वहीं, पहली बार वोट डालने वाले युवाओं में भी अलग ही क्रेज देखने को मिला। उन्होंने वोट डालने के बाद स्याही लगी उंगली के साथ सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर साझा करते हुए अन्य युवाओं से भी मतदान करने की अपील की।
अलवर और अजमेर के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था
रिकॉर्ड तोड़ मतदान को शांतिपूर्ण और निष्पक्ष ढंग से संपन्न कराने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और चुनाव आयोग ने पुख्ता इंतजाम किए थे। अलवर और अजमेर के संवेदनशील तथा अति-संवेदनशील मतदान केंद्रों पर अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई थी। जिला निर्वाचन अधिकारियों ने खुद मैदानी दौरों पर रहकर पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर बनाए रखी। ईवीएम (EVM) में किसी भी तकनीकी खराबी की सूचना मिलने पर तुरंत सेक्टर मजिस्ट्रेट की टीमों ने मौके पर पहुंचकर त्वरित कार्रवाई की, जिससे मतदान प्रक्रिया में कहीं भी कोई लंबा व्यवधान नहीं आया। सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाक-चौबंद थी कि किसी भी अप्रिय घटना की खबर के बिना पूरा चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गया, जिसकी सराहना स्थानीय नागरिकों ने भी खुलकर की।
बंपर वोटिंग के राजनीतिक मायने: प्रत्याशियों की धड़कनें तेज और कयासों का बाजार गर्म
अलवर और अजमेर के ग्रामीण इलाकों में 82% से अधिक के इस भारी मतदान ने राजनीतिक दलों और मैदान में डटे प्रत्याशियों की धड़कनों को तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बंपर वोटिंग का सीधा मतलब यह है कि सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) या फिर किसी बड़े स्थानीय मुद्दे को लेकर जनता के मन में गहरा बदलाव लाने का उबाल था। जब-जब ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत इस तरह आसमान छूता है, तब-तब पारंपरिक समीकरण उलट जाते हैं और चौकाने वाले परिणाम सामने आते हैं। अब सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की नजरें आगामी मतगणना पर टिकी हुई हैं, और हर कोई अपने-अपने पक्ष में भारी मतदान होने का दावा कर रहा है।
लोकतंत्र के इस महापर्व ने साबित की ग्रामीण भारत की राजनीतिक परिपक्वता
अलवर और अजमेर में दूसरे चरण के दौरान देखने को मिला यह मतदान प्रतिशत केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि भारत का आम ग्रामीण नागरिक अपने अधिकारों के प्रति कितना सजग हो चुका है। जाति, धर्म और तमाम अन्य बाधाओं से ऊपर उठकर गांवों के विकास के नाम पर वोट डालने की यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र के उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा करती है। जब देश के आम लोग अपनी एक-एक वोट की ताकत को समझकर बूथों तक पहुंचते हैं, तो शासन और प्रशासन दोनों को जनता के प्रति जवाबदेह होना ही पड़ता है। यह ऐतिहासिक मतदान देश के बाकी हिस्सों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल पेश करता है कि कैसे लोकतंत्र को उत्सव और कर्तव्य दोनों रूप में जिया जाता है।