कार्तिक माह में स्नान-दान करने से मिटते हैं पाप, जानें पूरे महीने व्रत और पूजा के नियम
सनातन धर्म में कार्तिक मास को सभी महीनों में सबसे पवित्र, कल्याणकारी और पुण्यदायी माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन पूर्णिमा के समाप्त होते ही कार्तिक महीने का शुभारंभ हो जाता है, जो संपूर्ण हिंदू धर्मावलंबियों के लिए आध्यात्मिक चेतना और भक्ति का स्वर्णिम काल होता है। शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक मास में भगवान श्रीहरि विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की पूजा-आराधना करने से साधक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है तथा जन्म-जन्मांतर के पातक व पाप कट जाते हैं। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जिस प्रकार देवताओं में भगवान विष्णु, तीर्थों में बदरिकाश्रम और नदियों में गंगा श्रेष्ठ हैं, ठीक उसी प्रकार सभी महीनों में कार्तिक मास को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। यह महीना केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संयम, सत्य, सात्विकता और मानसिक शुद्धि का एक पावन साधन है।
कार्तिक मास के दौरान तड़के ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदियों, सरोवरों या कुंडों में स्नान करने का विशेष और अनूठा विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे महीने जल में भगवान विष्णु का निवास होता है, इसलिए सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में किसी पवित्र नदी जैसे गंगा, यमुना, गोदावरी या सरयू में डुबकी लगाने से पूरे वर्ष किए गए पापों से मुक्ति मिल जाती है। यदि किसी कारणवश आप पवित्र नदी तक जाने में असमर्थ हैं, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी उतना ही फलदायी माना गया है। स्नान के तुरंत बाद सूर्य देव को अर्घ्य देकर जरूरतमंदों, निर्धनों और ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़ और ऊनी कपड़ों का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कार्तिक में किया गया तिल और अन्न का दान सीधे अक्षय पुण्य की प्राप्ति कराता है, जिससे जीवन में कभी भी धन और अन्न की कमी नहीं होती।
इस पावन महीने में दीपदान और तुलसी पूजा का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और माता तुलसी से उनका विवाह संपन्न होता है। यही वजह है कि पूरे कार्तिक महीने में सुबह-शाम तुलसी के पौधे के सामने देशी घी का दीपक जलाना, उन्हें जल अर्पित करना और परिक्रमा करना हर श्रद्धालु के घर में समृद्धि लेकर आता है। इसके अतिरिक्त, शाम के समय घर के मुख्य द्वार, आंगन, तुलसी चौरा, मंदिरों तथा नदियों के घाटों पर दीपदान (Deepdan) करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि जो साधक कार्तिक मास में रोज शाम को नदियों या देवालयों में दीपदान करते हैं, उनके जीवन से अज्ञानता और दरिद्रता का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है और माता लक्ष्मी उनके घर में स्थायी रूप से वास करती हैं।
कार्तिक मास में व्रत रखने वाले साधकों को नियमों का कड़ाई से पालन करना पड़ता है। इस पूरे महीने भूमि पर शयन करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और सात्विक दिनचर्या अपनाना बेहद आवश्यक माना गया है। खान-पान के नियमों की बात करें तो कार्तिक के महीने में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा जैसे तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए। इसके साथ ही, दालों में उड़द, मसूर, चना, मटर और राई का सेवन करना वर्जित बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक महीने में बैंगन, करेला और बासी भोजन करने से बचना चाहिए तथा दिन में सोने के बजाय अपना ध्यान केवल भगवान विष्णु के नाम जप और विष्णु सहस्रनाम के पाठ में लगाना चाहिए। जो श्रद्धालु पूरे महीने इन कठोर नियमों और भक्ति भाव से कार्तिक स्नान व व्रत का अनुष्ठान पूरा करते हैं, वे अंतकाल में विष्णु लोक को प्राप्त करते हैं और उनका जीवन हर प्रकार के कष्टों व बाधाओं से मुक्त हो जाता है।