खुद मांगकर खाता, फिर भी किया दान; दिव्यांग भिखारी की दरियादिली देख भावुक हुए बौद्ध भिक्षु

खुद मांगकर खाता, फिर भी किया दान; दिव्यांग भिखारी की दरियादिली देख भावुक हुए बौद्ध भिक्षु

दुनिया में जब भी इंसानियत, त्याग और परोपकार की बात होती है, तो अक्सर बड़े-बड़े अमीर उद्योगपति या नामचीन हस्तियों के नाम सामने आते हैं। लेकिन कई बार समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग ऐसी मिसाल पेश कर जाते हैं, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े रईसों का अहंकार भी चकनाचूर हो जाता है। आज हम आपको एक ऐसे ही साधारण से दिखने वाले लेकिन दिल से बेहद अमीर दिव्यांग भिखारी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने अपनी खुद की दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाए, लेकिन जब देश और समाज के किसी पवित्र कार्य या जरूरतमंदों की मदद की बात आई, तो उसने अपनी जीवनभर की पाई-पाई जोड़कर दान कर दी। इस अनोखी दरियादिली को देखकर वहां मौजूद बौद्ध भिक्षु भी अपने आंसू नहीं रोक पाए और उनका सिर श्रद्धा से झुक गया।

रेलवे स्टेशन और मंदिरों के बाहर भीख मांगकर जीवन गुजारने वाले दिव्यांग की कहानी

यह मार्मिक घटना देश के एक व्यस्त इलाके की है, जहां हर रोज हजारों लोग अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में व्यस्त रहते हैं। इसी भीड़भाड़ के बीच एक दिव्यांग व्यक्ति रोज सुबह अपनी बैसाखियों के सहारे या घसीटते हुए लोगों से दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगता था। बारिश हो, कड़ाके की ठंड हो या चिलचिलाती धूप हो, इस शख्स का रोजमर्रा का संघर्ष एक जैसा ही रहता था। लोग उसे या तो अनदेखा कर देते थे या फिर अपनी दया दिखाते हुए कुछ सिक्के उसकी झोली में डाल देते थे। उस दिव्यांग के लिए हर एक सिक्का उसके अगले दिन के भोजन का इंतजाम होता था। उसने कभी आलीशान महल में रहने का सपना नहीं देखा और न ही कभी महंगे कपड़े पहनने की ख्वाहिश रखी। उसका संसार बस इतना था कि किसी तरह शाम को पेट भर जाए और रात गुजारने के लिए कोई सुरक्षित कोना मिल जाए।

जब बौद्ध भिक्षुओं के सामने खोली अपनी पोटली और हैरान रह गए सभी लोग

घटना वाले दिन जब कुछ बौद्ध भिक्षु अपने सेवा कार्य और आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उस शहर से गुजर रहे थे, तब उनकी नजर इस दिव्यांग भिखारी पर पड़ी। भिक्षुओं ने सोचा कि क्यों न इस असहाय व्यक्ति को कुछ भोजन और फल दिए जाएं। जब वे उसके पास पहुंचे और उसे खाने की वस्तुएं देने लगे, तो उस दिव्यांग के चेहरे पर जो संतोष और खुशी आई, वह देखने लायक थी। इसके बाद जो हुआ, उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उस दिव्यांग ने अपने मैले-कुचले कपड़ों की पोटली से एक पुरानी और फटी हुई थैली निकाली और उसे बौद्ध भिक्षुओं के चरणों में रख दिया। जब भिक्षुओं ने उस थैली को खोलकर देखा, तो उनके होश उड़ गए। उस थैली में सिक्के और छोटे नोटों के रूप में वह पूरी जमापूंजी थी, जो उस बेचारे ने पाई-पाई करके लंबे समय से जोड़ी थी।

अपनी भूख मिटाने के बजाय दूसरों के कल्याण के लिए सब कुछ कर दिया समर्पित

बौद्ध भिक्षुओं ने जब उससे पूछा कि यह क्या है और उसने इसे क्यों बचाया है, तो उस दिव्यांग ने जो जवाब दिया, उसने वहां मौजूद हर एक व्यक्ति को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। उस शख्स ने बड़े ही सरल और पवित्र भाव से कहा कि वह तो भीख मांगकर किसी तरह अपना पेट पाल ही लेता है, लेकिन दुनिया में ऐसे कई लोग और धार्मिक कार्य हैं जिन्हें मदद की जरूरत होती है। उसने कहा कि उसके पास शरीर से भले ही दिव्यांगता है, लेकिन उसका दिल और नियत साफ है। उसने अपनी उस जीवनभर की कमाई को समाज के कल्याण और भिक्षुओं के धार्मिक कार्यों के लिए स्वेच्छा से दान कर दिया। उसने एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा कि अगर वह यह पैसे दे देगा, तो कल सुबह के खाने का इंतजाम कैसे होगा। उसका यह त्याग और निस्वार्थ भाव देखकर वहां मौजूद बौद्ध भिक्षु भावुक हो गए और उसकी आंखों से आंसू छलक आए।

भौतिकवादी दुनिया में इंसानियत और परोपकार का सबसे बड़ा संदेश

आज की इस आधुनिक और भौतिकवादी दुनिया में जहां हर कोई सिर्फ अपने लिए जीने और ज्यादा से ज्यादा दौलत इकट्ठा करने की होड़ में लगा हुआ है, वहीं एक सड़क किनारे भीख मांगने वाले दिव्यांग का यह कृत्य हमें यह सिखाता है कि दान करने के लिए बैंक बैलेंस की नहीं, बल्कि एक बड़े और उदार दिल की जरूरत होती है। जिसके पास खुद खाने के लाले पड़े हों, वह अगर अपनी थाली का एक टुकड़ा भी किसी दूसरे को दे दे, तो वह भगवान से कम नहीं है। इस घटना ने सोशल मीडिया पर आते ही तहलका मचा दिया और लाखों लोगों की आंखें नम कर दीं। इंटरनेट पर लोग इस दिव्यांग की दरियादिली को सलाम कर रहे हैं और कह रहे हैं कि असली फकीर वही है जो सब कुछ लुटाकर भी दूसरों के चेहरों पर मुस्कान ले आए।

समाज के लिए प्रेरणा बनी इस दिव्यांग की असाधारण और मार्मिक गाथा

यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं है, बल्कि यह इंसानी संवेदनाओं का वह आईना है जिसमें हम अपनी स्वार्थी प्रवृत्ति को साफ-साफ देख सकते हैं। हम अक्सर छोटी-छोटी चीजों के लिए परेशान रहते हैं और भगवान से शिकायत करते हैं कि हमारे पास क्या नहीं है। लेकिन इस दिव्यांग भिखारी ने यह साबित कर दिया कि जिसके पास संतोष का धन है, दुनिया का सबसे अमीर इंसान वही है। बौद्ध भिक्षुओं ने भी इस महान आत्मा को आशीर्वाद दिया और उसके इस परोपकारी कदम को हमेशा के लिए अमर बना दिया। यह गाथा सदियों तक लोगों को यह याद दिलाती रहेगी कि इंसानियत का असली धर्म केवल एक-दूसरे की मदद करना और प्रेम बांटना है, और इसके लिए किसी विशेष पद या पैसे की कोई आवश्यकता नहीं होती।