दिवाली में किस दिन निकलेगा यम का दीपक? अकाल मृत्यु का भय होगा दूर, जानें तारीख और शुभ मुहूर्त
प्रकाश के पावन पर्व दीपावली की शुरुआत होते ही देश भर में उत्साह, उमंग और रोशनी का माहौल छा जाता है। धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक चलने वाले इस पांच दिवसीय महाउत्सव में कई तरह के पारंपरिक और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जिनका सनातन संस्कृति में विशेष स्थान है। इन्हीं परंपराओं में से एक बेहद महत्वपूर्ण और गहरी आस्था से जुड़ा विधान है 'यम का दीपक' जलाने का। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली के दौरान मृत्यु के देवता कहे जाने वाले यमराज की उपासना करने और उनके निमित्त दीपदान करने से परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है। सनातन परंपरा में यह माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से यमराज के नाम का दीपक जलाता है, उसके घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश नहीं होता और जीवन में सुख-शांति व दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
यम के दीपक को लेकर अक्सर लोगों के मन में संशय रहता है कि इसे किस दिन प्रज्वलित करना चाहिए। पंचांग और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मुख्य रूप से यमराज के नाम का यह दीपदान नरक चतुर्दशी यानी छोटी दिवाली के दिन प्रदोष काल में किया जाता है। हालांकि, देश के कई हिस्सों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार कुछ लोग इसे धनतेरस की शाम को भी जलाते हैं। इस साल नरक चतुर्दशी और प्रदोष काल के संयोग के अनुसार, शाम के समय जब सूर्य ढल रहा हो और चारों तरफ गोधूलि बेला का माहौल हो, तब यम के नाम का दीपक जलाना सबसे ज्यादा उत्तम और फलदायी माना गया है। जानकारों का कहना है कि यह परंपरा मुख्य रूप से घर के पुरुष सदस्यों द्वारा विधि-विधान से निभाई जाती है ताकि पूरे परिवार की रक्षा हो सके।
यमराज को समर्पित इस विशेष दीपक को जलाने के लिए कुछ खास नियमों और समय का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। प्रदोष काल के समय यानी शाम के वक्त जब सूरज ढल जाए, तब आटे या पुरानी मिट्टी का एक चौमुखी (चार मुख वाला) दीपक तैयार किया जाता है। इस दीपक में शुद्ध सरसों का तेल भरा जाता है और चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाने के लिए चार अलग-अलग रुई की बातियां लगाई जाती हैं। दीपक जलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि उसका मुख हमेशा दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि ज्योतिष और शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। दीपक प्रज्वलित करने के बाद उसमें कुछ काले तिल के दाने भी डाले जाते हैं, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखते हैं।
यम का दीपक जलाने के बाद उसे घर के मुख्य द्वार के बाहर बाईं तरफ या कचरे के ढेर के पास दक्षिण दिशा की ओर रख दिया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार यमराज से जुड़ी कथा में राजा हिमा के 16 वर्षीय पुत्र की अकाल मृत्यु का योग था, जिसे उसकी चतुर पत्नी ने सोने-चांदी के आभूषणों के ढेर और मुख्य द्वार पर चारों तरफ जल रहे दीपकों की रोशनी से यमराज की दृष्टि को भ्रमित करके टाल दिया था। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि जो परिवार नरक चतुर्दशी की शाम यमराज के निमित्त दीपदान करता है, उनके घर पर कभी कोई असमय संकट या अकाल मृत्यु की छाया नहीं मंडराती। इस प्रकार, विधि-विधान और सच्चे भाव से जलाया गया यह एक छोटा सा दीपक आपके पूरे परिवार के जीवन में सुरक्षा, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का एक मजबूत कवच प्रदान करता है।