ओलंपिक की ऐतिहासिक सफलता के बाद मेडल के बिना लौटने पर उठे बड़े सवाल
पेरिस ओलंपिक के महान मंच पर दो ऐतिहासिक पदक जीतकर पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा करने वाली स्टार शूटर मनु भाकर का एशियाई खेलों में इस बार का सफर उम्मीदों के बिल्कुल विपरीत रहा है और वे बिना किसी पदक के स्वदेश लौटने को मजबूर हो गई हैं। खेल प्रेमियों के जेहन में अभी भी उस जांबाज खिलाड़ी की तस्वीरें ताजा थीं जिसने भारत के लिए ओलंपिक इतिहास में एक साथ दो मेडल जीतकर नया आयाम गढ़ा था, लेकिन निशानेबाजी की इस प्रतिष्ठित महाद्वीपीय प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में ईशा सिंह के साथ घटी प्रतिस्पर्धा और अप्रत्याशित प्रदर्शन में आई गिरावट ने हर किसी को हैरान कर दिया है। खेल जगत के गलियारों में इस बात की गहन चर्चा छिड़ गई है कि आखिर ओलंपिक के आसमान पर चमकने वाली यह स्टार निशानेबाज एशियाई खेलों के इस बड़े मंच पर अपने उस जादुई फॉर्म को क्यों नहीं बरकरार रख पाई और किस तरह से मामूली अंतर ने उनसे मेडल का हक छीन लिया।
पेरिस ओलंपिक की ऐतिहासिक चमक से लेकर एशियाई खेलों की इस अप्रत्याशित चूक तक का सफर
जब किसी खिलाड़ी के गले में ओलंपिक के दो-दो तमगे लटक जाते हैं, तो देश और दुनिया की उम्मीदें आसमान छूने लगती हैं और हर कोई यही मानकर चलता है कि अब वह खिलाड़ी हर प्रतियोगिता में सोने पर कब्जा जमाएगा। मनु भाकर ने भी ओलंपिक में अपनी अचूक निशानेबाजी से जो कीर्तिमान स्थापित किया था, उसने भारतीय शूटिंग के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया, लेकिन खेल का मैदान अपनी अनिश्चितताओं के लिए जाना जाता है जहाँ अतीत के रिकॉर्ड भविष्य की गारंटी नहीं बन सकते। एशियाई खेलों के इस कड़े मुकाबले में जब वे उतरीं, तो उनके कंधों पर उम्मीदों का बहुत भारी बोझ था, जिसे संभालना दुनिया के बड़े-बड़े एथलीटों के लिए भी आसान नहीं होता। शूटिंग जैसी एकाग्रता और सूक्ष्मता वाले खेल में मानसिक दबाव और पलभर की ध्यान भटकने की चूक बड़े से बड़े चैंपियन को भी पोडियम से बाहर कर देती है, और इस बार मनु भाकर के साथ भी कुछ ऐसा ही दुर्भाग्यपूर्ण वाकया देखने को मिला।
फाइनल मुकाबले में ईशा सिंह की शानदार चुनौती और भारतीय खेमे की मिली-जुली प्रतिक्रिया
एशियाई खेलों के इस रोमांचक फाइनल मुकाबले में एक तरफ जहां मनु भाकर पर नजरें टिकी हुई थीं, वहीं दूसरी तरफ युवा और प्रतिभाशाली निशानेबाज ईशा सिंह ने भी अपनी अचूक निशानेबाजी से मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया था। शूटिंग रेंज पर जब भारत की ये दोनों धुरंधर खिलाड़ी अपने देश के लिए मेडल की जंग लड़ रही थीं, तब हर एक शॉट के साथ दर्शकों की सांसे थमी हुई थीं। हालांकि, खिताबी दौड़ के अंतिम क्षणों में जिस तरह से स्कोरबोर्ड के आंकड़े बदले और मार्जिन का खेल तय हुआ, उसमें मनु भाकर मेडल की रेस से पिछड़ गईं, जिससे पूरे भारतीय खेल जगत में एक गहरी खामोशी छा गई। इसके बावजूद, यह मुकाबला इस बात का गवाह बना कि भारत में महिला निशानेबाजी का स्तर कितना ऊंचा उठ चुका है और हमारे पास एक से बढ़कर एक ऐसी विश्वस्तरीय प्रतिभाएं मौजूद हैं जो किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर कड़ा मुकाबला पेश करने का माद्दा रखती हैं।
पदक के बिना खाली हाथ लौटने की टीस और इस नाकामी के पीछे के तकनीकी व मानसिक पहलू
किसी भी शीर्ष स्तर के एथलीट के लिए पदक जीते बिना किसी बड़े टूर्नामेंट से वापस लौटना एक बेहद कठिन और आत्ममंथन करने वाला अनुभव होता है, और मनु भाकर के लिए भी यह दौर किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि ओलंपिक जैसी महा-सफलता के तुरंत बाद मानसिक और शारीरिक थकान से उबरना और उसी तीव्रता के साथ नई प्रतियोगिताओं में उतरना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। लगातार बने रहने वाले मीडिया के दबाव, उम्मीदों के भारी पहाड़ और ट्रेनिंग के शेड्यूल में आए बदलावों का असर कई बार खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ ही जाता है। इस पूरी प्रतियोगिता के दौरान शूटिंग रेंज पर मनु की लय में वह पुरानी धार और गजब का आत्मविश्वास नजर नहीं आया जिसके लिए वे जानी जाती हैं, और यही वह मुख्य वजह रही जो उन्हें पोडियम फिनिश तक पहुंचने से रोक गई।
आने वाले बड़े टूर्नामेंट्स और ओलंपिक चक्र के लिए मनु भाकर का पुनर्विचार और नई रणनीति
हार और जीत खेल के दो ऐसे पहलू हैं जो किसी भी खिलाड़ी को और अधिक मजबूत तथा परिपक्व बनाते हैं, और मनु भाकर जैसी चैंपियन खिलाड़ी इस बात को भली-भांति जानती हैं कि एक नाकामी उनके पूरे करियर की दिशा तय नहीं कर सकती। एशियाई खेलों के इस अनुभव से सीख लेते हुए अब उनके निजी कोच, राष्ट्रीय निशानेबाजी फेडरेशन और खुद मनु अपने इस प्रदर्शन की गहराई से समीक्षा करने में जुट गए हैं ताकि भविष्य की प्रतियोगिताओं में इन कमियों को पूरी तरह से दूर किया जा सके। शूटिंग जैसे मानसिक खेल में एक बार फिर से अपनी खोई हुई लय को वापस पाना और मानसिक दृढ़ता को मजबूत करना ही एकमात्र विकल्प होता है। देश के करोड़ों खेल प्रेमियों की दुआएं और उम्मीदें आज भी अपनी इस लाड़ली स्टार शूटर के साथ मजबूती से खड़ी हैं, और पूरा विश्वास है कि वे इस झटके को पीछे छोड़कर और अधिक ताकत के साथ अंतरराष्ट्रीय शूटिंग रेंज पर वापसी करेंगी।