'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो...', कौन है सपा का यह सपोर्टर, जिसे गोद में लेकर भाग गई यूपी पुलिस?
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सियासी गलियारों में उस वक्त भारी अफरा-तफरी और ड्रामा देखने को मिला जब समाजवादी पार्टी (सपा) के एक कद्दावर और उत्साहित कार्यकर्ता ने अचानक चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो...' के बुलंद और तीखे नारों के साथ मुख्य सड़क पर प्रदर्शन कर रहे इस कार्यकर्ता को रोकने के लिए जब पुलिस के तमाम प्रयास नाकाम हो गए, तो यूपी पुलिस के जवानों को एक ऐसा कदम उठाना पड़ा जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है और हर तरफ चर्चा का विषय बन गया है। पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा और यातायात व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारी कार्यकर्ता को दोनों हाथों से गोद में उठाया और दौड़ते हुए पुलिस जीप तक ले जाकर उसमें बैठा दिया।
इस नाटकीय और हैरान कर देने वाले घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल और सत्ता पक्ष के बीच चल रही सियासी जंग को और ज्यादा हवा दे दी है। घटना का वीडियो इंटरनेट पर वायरल होते ही समाजवादी पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भारी रोष व्याप्त हो गया है। हर कोई यह जानने के लिए उत्सुक है कि आखिर 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' के नारे लगाने वाला यह जांबाज और आक्रामक सपा समर्थक कौन है और उसने राजधानी के सबसे सख्त सुरक्षा वाले इलाके में ऐसा दुस्साहसिक कदम क्यों उठाया। इस पूरी घटना ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और पुलिस-प्रशासन के रवैये को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच अचानक बदला माहौल, सुरक्षाकर्मियों के फूले हाथ-पांव
सोमवार की सुबह जब राजधानी के प्रमुख वीआईपी मार्ग पर सामान्य यातायात चल रहा था, तभी समाजवादी पार्टी का यह समर्थक बैनर और तख्तियां लेकर सीधे सड़क के बीचों-बीच आ गया। चुनाव आयोग पर एकपक्षीय निर्णय लेने और निष्पक्षता से काम न करने का गंभीर आरोप लगाते हुए इस कार्यकर्ता ने सीधे तौर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना शुरू कर दिया। उसकी गूंजती आवाज और उग्र रुख को देखकर वहां आसपास गुजर रहे आम नागरिक और सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी चौंक गए।
शुरुआत में स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने वार्ता के जरिए कार्यकर्ता को समझा-बुझाकर सड़क से हटाने का प्रयास किया और उसे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने को कहा। लेकिन सपा कार्यकर्ता लगातार अपने तेवर सख्त किए हुए था और नारेबाज़ी बंद करने को तैयार नहीं था। वह सड़क पर ही बैठ गया और नारेबाजी तेज कर दी। जब इलाके में वाहनों का लंबा जाम लगने लगा और स्थिति नियंत्रण से बाहर होने की आशंका पैदा हुई, तो मौके पर मौजूद दरोगा और सिपाही हरकत में आए। जब कार्यकर्ता ने अपने पैर आगे नहीं बढ़ाए तो पुलिसकर्मियों ने तुरंत रणनीति बदली और दो जवानों ने उसे उठाकर पुलिस वैन की तरफ दौड़ लगा दी।
आखिर कौन हैं यह सपा समर्थक और क्यों कर रहे थे इस्तीफे की उग्र मांग?
इस हाई-वोल्टेज ड्रामे के केंद्र में मौजूद कार्यकर्ता की पहचान समाजवादी पार्टी के एक बेहद सक्रिय, समर्पित और जमीनी स्तर के युवा नेता के रूप में हुई है, जो लंबे समय से पार्टी के छात्र संगठन और युवा विंग से जुड़े रहे हैं। सपा कार्यकर्ता का आरोप है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के अपने संवैधानिक दायित्व का पूरी तरह से निर्वहन नहीं कर रहा है। उनका कहना था कि मतदाता सूची से वैध मतदाताओं के नाम काटने, विपक्षी दलों की जायज शिकायतों की अनदेखी करने और चुनाव प्रक्रिया के दौरान सत्ताधारी दल के दबाव में काम करने जैसे गंभीर मुद्दों पर चुनाव आयोग की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है।
सपा नेता का कहना है कि जब तक चुनाव आयोग में शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी निष्पक्ष होकर काम नहीं करेंगे, तब तक देश में लोकतंत्र की रक्षा संभव नहीं है। इसी वजह से उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार से तुरंत अपने पद से त्यागपत्र देने की मांग उठाई। कार्यकर्ता के करीबियों का कहना है कि यह कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं था, बल्कि उन लाखों मतदाताओं की आवाज थी जो चुनाव प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं। इस विरोध प्रदर्शन के जरिए उन्होंने सीधे तौर पर संदेश देने की कोशिश की कि समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता किसी भी दबाव या पुलिसिया कार्रवाई से डरने वाला नहीं है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो, विपक्ष ने पुलिस कार्रवाई को बताया बर्बरता
घटना के तुरंत बाद जब पुलिस द्वारा सपा समर्थक को गोद में उठाकर ले जाने की तस्वीरें और वीडियो क्लिप्स इंटरनेट पर सामने आईं, तो यह कुछ ही मिनटों में ट्रेंड करने लगा। राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता के बीच इस वीडियो को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां एक तरफ सत्ता पक्ष और पुलिस प्रशासन इसे सड़क पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और यातायात बहाल करने के लिए उठाया गया एक सामान्य कदम बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने इसे लोकतंत्र की हत्या और पुलिसिया तानाशाही करार दिया है।
समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना भी अपराध बन चुका है। अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाने वाले नागरिकों और युवा कार्यकर्ताओं के साथ जिस तरह का व्यवहार पुलिस द्वारा किया जा रहा है, वह पूरी तरह से असंवैधानिक है। विपक्षी नेताओं ने कहा कि जब पुलिस के पास किसी नागरिक को गिरफ्तार करने या हिरासत में लेने के वैधानिक नियम मौजूद हैं, तो इस प्रकार कार्यकर्ता को गोद में उठाकर भागना और उसके साथ दुर्व्यवहार करना सत्ता के घमंड को दर्शाता है।
राज्य में गर्माया सियासी पारा, चुनाव आयोग और सरकार के रुख पर सभी की नजरें
लखनऊ की इस इकलौती घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल को पूरी तरह से गरमा दिया है। समाजवादी पार्टी के विभिन्न छात्र संगठनों और युवा इकाइयों ने चेतावनी दी है कि यदि पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ इस तरह का उत्पीड़नात्मक रवैया बंद नहीं हुआ और चुनाव आयोग ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया, तो प्रदेश के हर जिले में इसी तरह के बड़े विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे पुलिसिया लाठी-डंडों या गिरफ्तारी के डर से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
वहीं दूसरी ओर, जिला पुलिस प्रशासन का कहना है कि बिना पूर्व अनुमति के धारा 144 से प्रभावित इलाकों में प्रदर्शन करने और मुख्य मार्ग पर यातायात बाधित करने के आरोप में संबंधित कार्यकर्ता के खिलाफ नियमानुसार निरोधात्मक कानूनी कार्रवाई की जा रही है। किसी भी व्यक्ति को कानून हाथ में लेने या आम जनता की आवाजाही को बाधित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। बहरहाल, 'ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दो' के नारों से शुरू हुई यह घटना अब केवल एक स्थानीय प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसने आगामी चुनावी समर से पहले राज्य के सियासी तापमान को उच्चतम स्तर पर पहुंचा दिया है।