15000 फीट पर 8 लोग लापता, 72 घंटे बाद भी नहीं चला पता, भारी स्नोफॉल से बढ़ी मुश्किलें

15000 फीट पर 8 लोग लापता, 72 घंटे बाद भी नहीं चला पता, भारी स्नोफॉल से बढ़ी मुश्किलें

हिमालय की बर्फीली वादियों से इस वक्त एक बेहद डरावनी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। समुद्र तल से करीब 15,000 फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर एक ट्रैकिंग अभियान के दौरान 8 लोग अचानक लापता हो गए हैं। घटना को बीते हुए 72 घंटे से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अत्यधिक खराब मौसम और भारी बर्फबारी के कारण अभी तक उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है। इस विकट स्थिति ने लापता लोगों के परिवारों के साथ-साथ प्रशासन की भी नींद उड़ा दी है। आइए जानते हैं कि इस भीषण प्राकृतिक आपदा के बीच वहां क्या हालात बने हुए हैं और बचाव दल किस तरह से अपनी जान जोखिम में डालकर तलाशी अभियान चला रहा है।

15000 फीट की ऊंचाई पर क्या हुआ था?

यह पूरा हादसा देश के एक बेहद दुर्गम और ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाके में उस समय हुआ जब ट्रेकर्स का यह दल मौसम की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ गया। पर्वतारोहण और ट्रैकिंग से जुड़े जानकारों के मुताबिक, इस रूट पर अचानक मौसम का मिजाज बदल गया और कुछ ही घंटों में भारी बर्फबारी शुरू हो गई। इस भारी स्नोफॉल की वजह से तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे लुढ़क गया और चारों तरफ बर्फ की सफेद चादर बिछ गई। विजिबिलिटी शून्य के करीब पहुंच जाने के कारण ट्रेकर्स अपना रास्ता भटक गए और अपने बेस कैंप से संपर्क टूटने के बाद से उनका कोई अता-पता नहीं चल पा रहा है।

72 घंटे बीतने के बाद भी नहीं चला लापता ट्रेकर्स का कोई पता

घटना को घटित हुए 72 घंटे यानी तीन पूरे दिन बीत चुके हैं। आमतौर पर पर्वतीय आपदाओं में शुरुआती 48 से 72 घंटे का समय जीवन बचाने के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे 'गोल्डन ऑवर्स' कहा जाता है। इतने लंबे समय तक माइनस तापमान और अत्यधिक ठंड में खुले आसमान के नीचे या बर्फ के बीच जीवित रहना बेहद मुश्किल माना जाता है। परिजनों की धड़कनें तेज होती जा रही हैं और वे प्रशासन से लगातार गुहार लगा रहे हैं कि किसी भी तरह उनके अपनों को सुरक्षित ढूंढ निकाला जाए। स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमें दिन-रात एक करके इस रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देने में जुटी हैं।

भारी स्नोफॉल और खराब मौसम से रेस्क्यू ऑपरेशन में आ रही भारी मुश्किलें

इस बचाव अभियान में सबसे बड़ी बाधा मौसम का भयंकर रूप बना हुआ है। लगातार हो रही भारी बर्फबारी और बर्फीली हवाओं के थपेड़ों के कारण हेलिकॉप्टरों की आवाजाही पूरी तरह से ठप हो चुकी है। एरियल सर्वे यानी हवा से तलाश करने का विकल्प मौसम खराब होने के कारण काम नहीं आ रहा है। इसके अलावा, जिन रास्तों से होकर बचाव दल को ऊपर चढ़ना है, वहां कई फीट तक बर्फ जम चुकी है और एवलॉन्च यानी हिमस्खलन का खतरा भी लगातार बना हुआ है। इस दुर्गम इलाके में ऑक्सीजन की कमी और ठंड के कारण रेस्क्यू वर्कर्स को भी आगे बढ़ने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

स्थानीय प्रशासन और आईटीबीपी की टीमें मैदान में उतरीं

परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) के विशेष रूप से प्रशिक्षित पर्वतारोही कमांडोज को इस मिशन में लगाया गया है। स्थानीय गाइड और पोर्टर्स की मदद ली जा रही है जो उस भौगोलिक इलाके की चप्पे-चप्पे की जानकारी रखते हैं। अत्याधुनिक उपकरणों, सैटेलाइट कम्युनिकेटर और ड्रोन कैमरों की मदद से उन संभावित ठिकानों को खंगाला जा रहा है जहां ट्रेकर्स के फंसे होने की सबसे ज्यादा संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों और गाइडों की चेतावनी: रोमांच के चक्कर में न लें जोखिम

इस दर्दनाक घटना के बाद पर्यावरणविदों, पर्वतारोहियों और स्थानीय प्रशासन ने पर्यटकों और ट्रैकिंग प्रेमियों के लिए एक बार फिर सख्त निर्देश जारी किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों के मौसम में या जब मौसम विभाग द्वारा भारी बर्फबारी का अलर्ट जारी किया गया हो, तब 15,000 फीट से अधिक ऊंचाई वाले ट्रैकिंग रूट्स पर जाने से पूरी तरह बचना चाहिए। जरा सी लापरवाही और रोमांच का शौक इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ सकता है। फिलहाल, पूरा देश और लापता लोगों के परिवार यही प्रार्थना कर रहे हैं कि रेस्क्यू टीम जल्द से जल्द उन 8 लोगों तक सुरक्षित पहुंच सके।