गंग नहर 18 दिनों के लिए बंद, दिल्ली-NCR से लेकर यूपी तक गहराएगा जल संकट, हरकी पैड़ी पर नहीं आएगा पानी
उत्तर भारत के करोड़ों लोगों और खासकर शहरी आबादी के लिए एक बहुत बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है, जो आने वाले दिनों में आपके घरों के नल से लेकर खेतों की सिंचाई तक पर सीधा असर डालने वाली है। उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित पवित्र और ऐतिहासिक हरकी पैड़ी से निकलने वाली ऊपरी गंग नहर को वार्षिक मरम्मत, साफ-सफाई और गाद निकालने के रखरखाव के कार्यों के चलते आगामी 18 दिनों के लिए पूरी तरह से बंद रखने का कड़ा निर्णय लिया गया है। गंग नहर के बंद होने से उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी दिल्ली-एनसीआर तक के बड़े भू-भाग में जल संकट के गहराने की आशंका बढ़ गई है। इस ऐतिहासिक नहर के बंद रहने की अवधि के दौरान न केवल पीने के पानी के प्लांटों को कम जलापूर्ति मिल पाएगी, बल्कि औद्योगिक इकाइयों और कृषि कार्यों के लिए भी पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है, जिससे प्रशासन और आम जनता दोनों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
वार्षिक मरम्मत और मेंटेनेंस के लिए लिया गया गंग नहर को बंद करने का बड़ा फैसला
हर साल सर्दियों या विशेष अवधियों में ऊपरी गंग नहर के विशाल तंत्र की देखरेख और नहर की दीवारों व पटरियों के सुदृढ़ीकरण के लिए पानी के प्रवाह को कुछ हफ्तों के लिए रोका जाता है, जिसे तकनीकी भाषा में नहर की बंदी कहा जाता है। उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और संबंधित अधिकारियों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस बार यह बंदी पूरे 18 दिनों तक प्रभावी रहेगी, जिसके दौरान भीमगोड़ा बैराज से गंग नहर में छोड़े जाने वाले पानी को पूरी तरह से रोक दिया जाएगा। इस मेंटेनेंस के दौरान नहर के अंदर जमी हुई सिल्ट यानी गाद की सफाई की जाएगी, टूटे हुए घाटों और किनारों की मरम्मत की जाएगी तथा आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करके जल वितरण प्रणाली को दुरुस्त किया जाएगा ताकि भविष्य में पानी की बर्बादी को रोका जा सके। हालांकि यह तकनीकी और प्रशासनिक कार्य नहर के लंबे जीवन और सुचारू संचालन के लिए बेहद आवश्यक है, लेकिन इस लंबी अवधि की बंदी के कारण निचले इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों के दैनिक जीवन पर इसका बहुत बड़ा और प्रतिकूल असर पड़ने वाला है।
हरकी पैड़ी पर थमेगा जल प्रवाह, धार्मिक मान्यताओं और आस्था पर पड़ेगा गहरा असर
हरिद्वार की पावन नगरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध हरकी पैड़ी वह पवित्र स्थल है जहां गंगा नदी का जल गंग नहर के माध्यम से प्रवाहित होता है और जहां रोजाना देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु मां गंगा की पावन धारा में डुबकी लगाकर पुण्य लाभ कमाते हैं। जब गंग नहर को 18 दिनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा, तो हरकी पैड़ी और उससे जुड़े ब्रह्मकुंड क्षेत्र में गंगा के प्राकृतिक जल प्रवाह में भारी कमी आ जाएगी या पानी का स्तर बहुत अधिक नीचे चला जाएगा। हालांकि प्रशासन द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि श्रद्धालुओं की आस्था और धार्मिक अनुष्ठानों में किसी प्रकार की बड़ी बाधा न आए, इसलिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं के तहत कुछ मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, फिर भी नहर के मुख्य बंद रहने के दौरान वह अलौकिक और तेज प्रवाह देखने को नहीं मिलता है। स्थानीय तीर्थ पुरोहितों और व्यापारियों का भी यह मानना है कि इस बंदी के दौरान हरिद्वार आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं की संख्या में कुछ हद तक गिरावट दर्ज की जा सकती है, जिससे स्थानीय व्यापार पर भी असर पड़ेगा।
दिल्ली-NCR से लेकर उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पीने के पानी का गहरा सकता है संकट
गंग नहर के 18 दिनों तक बंद रहने का सबसे गंभीर और व्यापक प्रभाव गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कई हिस्सों की जलापूर्ति पर पड़ने की पूरी आशंका है। इन तमाम शहरी क्षेत्रों में बने जल निगम और जल बोर्ड के वाटर ट्रीटमेंट प्लांटों को अपनी दैनिक पेयजल आपूर्ति के लिए मुख्य रूप से इसी गंग नहर के कच्चे पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। जब नहर में पानी आना बंद हो जाएगा या इसकी मात्रा बेहद कम हो जाएगी, तो इन वाटर ट्रीटमेंट प्लांटों की उत्पादन क्षमता आधी से भी कम रह जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप लोगों के घरों में आने वाले नलों की रफ्तार धीमी हो जाएगी या पानी आना बिल्कुल बंद हो जाएगा। प्रशासन ने अभी से चेतावनी जारी करते हुए नागरिकों से पानी का संयम और किफायत के साथ उपयोग करने की अपील की है ताकि इस आगामी जल संकट के दौर से किसी तरह निपटा जा सके और आपातकालीन स्थितियों के लिए टैंकरों की व्यवस्था की जा सके।
किसानों की फसलों की सिंचाई पर संकट के बादल, कृषि अर्थव्यवस्था को भी होगा नुकसान
पेयजल संकट के अलावा गंग नहर के बंद होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसानों के सामने एक बहुत बड़ी कृषि समस्या खड़ी हो गई है क्योंकि इस समय रबी की फसलों की बुवाई और सिंचाई का सबसे महत्वपूर्ण दौर चल रहा है। किसानों को अपने खेतों में गेहूं, सरसों और अन्य फसलों की समय पर पलेवा और सिंचाई करने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन नहरों के सूख जाने से उन्हें ट्यूबवेल और अन्य महंगे वैकल्पिक माध्यमों पर निर्भर होना पड़ेगा। बिजली की लगातार किल्लत और डीजल के बढ़ते दामों के बीच किसानों के लिए अपनी फसलों को बचाए रखना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। यदि समय पर बारिश नहीं होती है, तो इस 18 दिन की नहर बंदी के कारण कृषि उत्पादन पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है, जिससे अन्नदाताओं की मुश्किलें और अधिक बढ़ जाएंगी।
प्रशासन द्वारा उठाए जा रहे वैकल्पिक कदम और नागरिकों के लिए जरूरी दिशा-निर्देश
इस संभावित और विकट जल संकट से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार, स्थानीय जिला प्रशासन और जल संभरण विभागों ने आपस में समन्वय स्थापित करके एक आपातकालीन कार्ययोजना तैयार करना शुरू कर दिया है। जिन क्षेत्रों में पेयजल की सबसे अधिक किल्लत होने की आशंका है, वहां पानी के टैंकरों को आरक्षित रखने और गंग नहर के अलावा अन्य जल स्रोतों जैसे कि गंगा-यमुना दोआब की अन्य शाखाओं या भूजल का संतुलित उपयोग करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रशासन लगातार मीडिया और सार्वजनिक घोषणाओं के माध्यम से आम जनता को यह जागरूक कर रहा है कि वे इन 18 दिनों के दौरान पानी का बिल्कुल भी अपव्यय न करें और गाड़ी धोने, पौधों में अत्यधिक पानी डालने जैसे कामों से बचें। यदि हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझते हुए पानी की एक-एक बूंद को सहेजने का प्रयास करेगा, तो इस बड़े जल संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकेगा और इस 18 दिन की चुनौतीपूर्ण अवधि को आसानी से पार किया जा सकेगा।