Haridwar News : हरिद्वार में दशहरे से दीपावली तक उत्तरी खंड गंगनहर बंद, दिल्ली NCR से कानपुर तक होगा जल संकट?
उत्तराखंड के धर्मनगरी हरिद्वार से एक बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक खबर सामने आ रही है जो उत्तर भारत के कई बड़े राज्यों के करोड़ों नागरिकों की दैनिक जीवनचर्या को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाली है। प्रतिवर्ष की भांति इस बार भी गंगनहर की विशेष साफ-सफाई, मरम्मत और आधुनिकीकरण के कार्यों को अमलीजामा पहनाने के लिए हरिद्वार में उत्तरी खंड गंगनहर को दशहरे के पावन पर्व से लेकर दीपावली के आसपास के दिनों तक पूरी तरह से बंद रखने का आधिकारिक ऐलान कर दिया गया है। गंगनहर के बंद होने का मतलब है कि उत्तराखंड से निकलने वाला यह जीवनदायी जल स्रोत अपनी मुख्य धाराओं में कुछ हफ्तों के लिए थम जाएगा। हर साल होने वाली इस वार्षिक बंदी (Annual Closure) का मुख्य उद्देश्य नहर की सिल्ट सफाई, पटरियों की मजबूती और जल संरचनाओं का रख-रखाव करना होता है ताकि आने वाले महीनों में बिना किसी तकनीकी बाधा के सुचारू रूप से पानी की आपूर्ति की जा सके। हालांकि, इस प्रशासनिक प्रक्रिया के चलते उत्तर भारत के कई प्रमुख औद्योगिक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जल संकट की आहट साफ सुनाई देने लगी है।
हरिद्वार से निकलने वाली यह ऐतिहासिक गंगनहर केवल उत्तराखंड के लिए ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के कई जिलों के लिए पानी का मुख्य और एकमात्र जरिया मानी जाती है। जब हरिद्वार में गंगनहर के गेट बंद किए जाते हैं, तो उसका सीधा असर रुड़की, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़ से लेकर राजधानी दिल्ली और सुदूर कानपुर तक के इलाकों पर पड़ता है। इन क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए जल शोधन संयंत्रों (Water Treatment Plants) की फीडिंग इसी नहर के पानी पर निर्भर करती है। नहर की बंदी के दौरान गंगा जल की उपलब्धता ठप हो जाने के कारण जल संस्थानों को वैकल्पिक स्रोतों जैसे कि गंगाजल की जगह भूमिगत जल (Groundwater) या अन्य जलाशयों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में यदि समय रहते एहतियाती कदम नहीं उठाए गए, तो दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों के बीच नलों से पानी गायब होने से आम जनता को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
पेयजल संकट के अलावा इस वार्षिक बंदी का सबसे गंभीर और गहरा प्रभाव कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। वर्तमान समय में धान की फसल के पकने और कटाई का दौर चल रहा है, तथा इसके तुरंत बाद रबी की मुख्य फसलों जैसे कि गेहूं की बुवाई और पलेवा के लिए पानी की अत्यधिक आवश्यकता होती है। गंगनहर से जुड़ी हजारों छोटी-बड़ी नहरें और रजवाड़े बंद होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसानों के खेतों तक पानी पहुंचना बंद हो जाता है। किसान संघों और स्थानीय कृषकों ने चिंता जताई है कि यदि गंगनहर की बंदी की अवधि लंबी खींचती है या वैकल्पिक सिंचाई के साधन समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो उनकी फसलों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि सिंचाई विभाग ने किसानों को आश्वस्त किया है कि बंदी का शेड्यूल पहले से तय होता है और किसान उसी हिसाब से अपने खेतों की सिंचाई का प्रबंधन कर रहे हैं, फिर भी ऐन त्योहारों के दिनों में पानी की कमी किसानों की नींद उड़ाने के लिए काफी है।
इस संभावित विकट स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली जल बोर्ड, उत्तर प्रदेश जल निगम और संबंधित जिला प्रशासनों ने युद्धस्तर पर अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि भले ही मुख्य गंगनहर बंद रहेगी, लेकिन विभिन्न जल शोधन संयंत्रों के लिए गंगा नहर के ऊपरी हिस्सों से पानी का स्टोरेज पहले ही सुरक्षित कर लिया गया है ताकि कम से कम शुरुआती दिनों में जलापूर्ति बाधित न हो। इसके अलावा, आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए ट्यूबवेलों और डीप बोरिंग के जरिए भूजल दोहन की क्षमता को बढ़ाने के निर्देश दे दिए गए हैं ताकि शहरों में पेयजल की सुचारू बहाली बनी रहे। प्रशासन ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि वे इस त्योहारी सीजन के दौरान पानी की एक-एक बूंद का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करें और व्यर्थ बहने से रोकें। यदि हर नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझ ले, तो इस प्रशासनिक बंदी के दौर को भी बिना किसी बड़ी कठिनाई के आसानी से पार किया जा सकता है।