नीम करोली बाबा के कैंची धाम आश्रम से क्यों गायब हो रहीं गौरैया
उत्तराखंड की हसीन वादियों में स्थित आध्यात्मिक संत बाबा नीम करोली महाराज के विश्व प्रसिद्ध कैंची धाम आश्रम (Kainchi Dham Ashram) में आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। कभी पक्षी प्रेमियों (Bird Watchers) और प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग मानी जाने वाली कैंची धाम और पंगोट की पहाड़ियां अब धीरे-धीरे अपने प्राकृतिक आकर्षण को खोती जा रही हैं। स्थानीय जानकारों और पर्यावरणविदों की रिपोर्ट के मुताबिक, घरों के आसपास फुदकने वाली आम गौरैया (Sparrow) और कई अन्य दुर्लभ पक्षी प्रजातियां अब इस पावन परिसर व आसपास के इलाकों से लगभग गायब हो चुकी हैं। आस्था के इस महान केंद्र पर लगातार बढ़ते मानवीय दबाव और अनियंत्रित पर्यटन के कारण जैव विविधता (Biodiversity) को भारी नुकसान पहुंच रहा है, जिससे पक्षियों का यह नैसर्गिक ठिकाना अब उनके अनुकूल नहीं रह गया है।
पर्यटकों की भारी भीड़ और वाहनों का बेकाबू शोर बना पक्षियों के पलायन की मुख्य वजह
कैंची धाम आश्रम और इसके आसपास के क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या में विस्फोटक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्थिति यह हो चुकी है कि सप्ताहांत (Weekends) और विशेष अवसरों पर यहां हजारों की संख्या में निजी वाहन और टैक्सियां पहुंचती हैं, जिसके कारण दिन-रात वाहनों के हॉर्न और इंजन का शोर गूंजता रहता है। वरिष्ठ बर्ड वॉचर और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक हद तक बढ़ गया है। पक्षी बेहद संवेदनशील जीव होते हैं और अत्यधिक शोर तथा मानवीय हलचल के कारण वे शांत एवं सुरक्षित ठिकानों की तलाश में इन इलाकों से अन्य सुरक्षित जंगलों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
कभी पक्षियों के कलरव से गूंजती थीं पहाड़ियां, अब शांत वातावरण के लिए तरस रहा कुमाऊं का यह क्षेत्र
उत्तराखंड के इस कुमाऊं क्षेत्र को हमेशा से ही समृद्ध वनस्पति, प्राकृतिक जल स्रोतों और रंग-बिरंगे पक्षियों के बसेरे के रूप में जाना जाता रहा है। ब्रिटिशकाल से ही यह पूरा भूभाग बर्ड वॉचिंग के शौकीनों के बीच खासा लोकप्रिय रहा है। कैंची धाम के आसपास के पेड़ों पर लाफिंग थ्रश और गौरैया जैसे पक्षियों की चहचहाहट सुबह-शाम सुनाई देती थी। लेकिन हालिया पर्यावरणीय अनुसंधानों से यह खुलासा हुआ है कि पहाड़ों की 'कैरिंग कैपेसिटी' (Caring Capacity) यानी सहने की क्षमता से अधिक भीड़ पहुंचने के कारण यहां का इकोसिस्टम चरमरा गया है। पेड़ों की कटाई, कंक्रीट के आधुनिक निर्माण और प्लास्टिक कचरे के अंबार ने इन पक्षियों के प्राकृतिक आवास और घोंसला बनाने की जगहों को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
प्रकृति और अध्यात्म का संतुलन बचाने के लिए फौरी कदम उठाने की सख्त जरूरत
बाबा नीम करोली महाराज के अनुयायी और पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में कैंची धाम और उसके आसपास की यह खूबसूरत जैव विविधता इतिहास बनकर रह जाएगी। प्रशासन और वन विभाग को चाहिए कि वे इस संवेदनशील क्षेत्र में पक्षियों और वनस्पतियों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार करें। धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा करना भी हर नागरिक का नैतिक कर्तव्य है, तभी हम बाबा के इस पवित्र धाम की असली प्राकृतिक खूबसूरती को सुरक्षित रख सकेंगे।