डोनाल्ड ट्रंप के कथित 'G-2' फॉर्मूले पर मुहर लगने के बाद अंतरराष्ट्रीय गलियारों में उठी आंधी
वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज से इस वक्त दुनिया भर के रणनीतिकारों को हिला देने वाली सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमरीका और चीन के बीच लंबे समय से चल रही शीत युद्ध जैसी तनातनी के बीच एक ऐसा भू-राजनीतिक भूचाल आया है, जिसने एशिया से लेकर पश्चिमी देशों तक हलचल मचा दी है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति और मौजूदा राजनीतिक गलियारों में किंगमेकर की भूमिका निभा रहे डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के उस कथित 'G-2' यानी अमेरिका और चीन के बीच दुनिया की महाशक्ति साझा करने वाले फॉर्मूले पर एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय चर्चाएं तेज हो गई हैं। रिपोर्ट्स और कूटनीतिक गलियारों में यह दावा किया जा रहा है कि बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति के सामने वाशिंगटन का रवैया कुछ ऐसा रहा है जिससे यह प्रतीत होता है कि अमेरिका दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के बीच ग्लोबल मामलों को कंट्रोल करने के एक नए समझौते की तरफ बढ़ रहा है। इस पूरी घटना के सामने आने के बाद भारतीय कूटनीतिक और सामरिक हलकों में यह सवाल बहुत तेजी से उठने लगा है कि क्या इस नए समीकरण के बाद वैश्विक मंच पर भारत अकेला पड़ गया है? भारत की स्वतंत्र विदेश नीति, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक मंच पर उसके बढ़ते दबदबे के बीच क्या 'G-2' का यह समीकरण भारत के लिए किसी खतरे की घंटी है या फिर यह सिर्फ अमरीकी राजनीति का एक शिगूफा मात्र है? आइए देश और दुनिया के शीर्ष रक्षा एवं कूटनीतिक एक्सपर्ट्स की राय से विस्तार से समझते हैं कि इस पूरी खबर की सच्चाई क्या है और भारत की स्थिति पर इसका क्या असर पड़ने वाला है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के इतिहास में 'G-2' की अवधारणा कोई नई नहीं है, लेकिन जब-जब अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच परदे के पीछे या मंच पर किसी बड़े समझौते की सुगबुगाहट होती है, तब-तब पूरी दुनिया के समीकरण बदलने लगते हैं। वर्तमान समय में जब बहुध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) की बात की जा रही है और भारत, क्वाड (Quad) तथा ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करते हुए एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में उभर रहा है, ऐसे में अमेरिका द्वारा चीन के साथ किसी भी प्रकार के विशेष द्विपक्षीय प्रभाव क्षेत्र को बांटने की खबर ने भू-राजनीतिक विश्लेषकों को गहरी चिंता में डाल दिया है। क्या अमेरिका वाकई अपनी वैश्विक महाशक्ति की कुर्सी चीन के साथ साझा करने को तैयार हो गया है और क्या इससे भारत के रणनीतिक हितों को कोई बड़ा झटका लग सकता है? आइए जानते हैं कि इस पूरे मामले पर कूटनीतिक विशेषज्ञों का क्या नफा-नुकसान का आंकलन है।
क्या है 'G-2' प्लान और क्यों चीनी राष्ट्रपति के सामने इसके झुकने की हो रही है चर्चा?
'G-2' यानी ग्रुप ऑफ टू का यह सिद्धांत मूल रूप से इस विचार पर आधारित है कि दुनिया के दो सबसे बड़े आर्थिक और सैन्य महाशक्तियां—संयुक्त राज्य अमेरिका और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना—मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और व्यापार के सभी बड़े फैसले तय करें। हाल ही में सामने आए कुछ कूटनीतिक घटनाक्रमों के बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि अमरीकी प्रशासन या ट्रंप समर्थित नीतियां चीन के साथ एक ऐसा अनौपचारिक समझौता चाहती हैं जिसमें दुनिया को दो हिस्सों में बांटकर राज किया जाए। जानकारों का कहना है कि यदि ऐसा होता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं जैसे संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता पर बड़ा असर पड़ सकता है। हालांकि, कई विशेषज्ञ इसे जमीनी हकीकत से कोसों दूर एक राजनीतिक बयानबाजी या कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी मानते हैं, क्योंकि अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक और सामरिक अविश्वास इतना गहरा है कि वे कभी भी पूरी तरह एक मंच पर सहज नहीं हो सकते।
क्या भारत ग्लोबल मंच पर सचमुच अकेला पड़ गया है? एक्सपर्ट्स की राय जानिए
जब भी अमेरिका और चीन के बीच नजदीकी की कोई खबर आती है, तो भारत की विदेश नीति को लेकर यह सवाल जरूर उठाया जाता है कि क्या भारत अपने पारंपरिक रणनीतिक सहयोगियों के बीच अकेला छूट जाएगा। इस विषय पर देश के प्रमुख सामरिक और कूटनीतिक एक्सपर्ट्स का यह स्पष्ट और दो टूक मानना है कि भारत को घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
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रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): भारत ने हमेशा से किसी भी महाशक्ति के खेमे में बंधे बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन किया है। रूस, यूरोप और अमेरिका के साथ भारत के संबंध पूरी तरह संतुलित हैं।
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क्वाड (Quad) और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अनिवार्यता: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के आक्रामक रुख को रोकने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों को भारत की जरूरत है। भारत के बिना इस क्षेत्र में कोई भी सुरक्षा ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता।
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ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत आज विकासशील देशों का नेतृत्व कर रहा है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी हैसियत और मोल किसी भी अन्य देश से कम नहीं है।
निष्कर्ष: भारत के लिए चुनौतियां और आगे की राह
संक्षेप में कहें तो, चीनी राष्ट्रपति के सामने अमेरिका के झुकने या 'G-2' प्लान की चर्चाएं भले ही मीडिया की सुर्खियां बटोर रही हों, लेकिन धरातल पर भारत की स्थिति बेहद मजबूत और अडिग है। भारत अपनी बढ़ती हुई आर्थिक ताकत, मजबूत सैन्य क्षमताओं और कूटनीतिक परिपक्वता के दम पर किसी भी वैश्विक बदलाव का सामना करने के लिए पूरी तरह सक्षम है। आने वाले समय में दुनिया चाहे किसी भी दिशा में मुड़े, भारत का राष्ट्रीय हित और उसका वैश्विक कद लगातार बढ़ता ही रहेगा।