क्या बांग्लादेश के साथ नई शर्तों पर रिश्ते तय करने की अपनी क्षमता खो रहा है भारत

क्या बांग्लादेश के साथ नई शर्तों पर रिश्ते तय करने की अपनी क्षमता खो रहा है भारत

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति (Geopolitics) और पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंधों के मोर्चे पर इन दिनों भारत के लिए एक बहुत बड़ी और विचारणीय बहस छिड़ गई है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के हालिया सत्र के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने भारत और बांग्लादेश के बीच आने वाले भविष्य के रिश्तों को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद से ही दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में जो उथल-पुथल मची हुई है, उसकी झलक इस वैश्विक महाकुंभ में साफ तौर पर देखने को मिली। रिपोर्ट्स के अनुसार, यूएनजीए के गलियारों में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और बांग्लादेश के नए राजनीतिक समीकरणों के बीच माने जाने वाले प्रमुख चेहरे तारिक रहमान (Tarique Rahman) या उनके प्रतिनिधिमंडल के बीच किसी भी प्रकार की सार्थक द्विपक्षीय मुलाकात या गर्मजोशी नहीं दिखाई दी, बल्कि दोनों नेताओं के बीच एक स्पष्ट और लंबी दूरी महसूस की गई। कूटनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि बांग्लादेश की बदलती आंतरिक राजनीति और वहां लगातार बढ़ रहे कट्टरपंथी या भारत विरोधी तेवरों के बीच अब भारत के लिए अपने पड़ोसी देश के साथ अपनी शर्तों पर रिश्ते तय करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। क्या भारत धीरे-धीरे इस मोर्चे पर अपनी पकड़ कमजोर कर रहा है या फिर आने वाले दिनों में कूटनीति का कोई नया अध्याय लिखा जाएगा, इसे लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि यूएनजीए के मंच पर घटी इस घटना के क्या मायने हैं और भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में आ रहे इस नए मोड़ के पीछे कौन-से भू-राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं।

भारत के लिए उसका पड़ोसी देश बांग्लादेश हमेशा से रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण रहा है। पिछले कुछ दशकों में दोनों देशों के बीच व्यापार, कनेक्टिविटी और सीमा सुरक्षा को लेकर कई ऐतिहासिक समझौते हुए थे, जिन्हें भारत के कूटनीतिक प्रभाव का परिणाम माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में हुए नाटकीय बदलावों और सत्ता के शीर्ष पर नए नेतृत्व के आने के बाद से कूटनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। नई सरकार और वहां के राजनीतिक दलों के तेवर यह संकेत दे रहे हैं कि वे अब पारंपरिक समझौतों से हटकर अपनी नई शर्तों पर विदेश नीति तय करना चाहते हैं। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे वैश्विक मंच पर जब भारत के शीर्ष राजनयिक और बांग्लादेशी प्रतिनिधिमंडल के बीच आमने-सामने की दूरी देखी गई, तो उसने इस बात पर मुहर लगा दी कि दोनों देशों के बीच सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है। आइए जानते हैं कि इस स्थिति के पीछे की असली वजहें क्या हैं और इसके भारत की विदेश नीति पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं।

यूएनजीए के मंच पर क्यों दिखी तारिक रहमान और एस. जयशंकर के बीच यह कूटनीतिक दूरी?

संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र केवल भाषण देने का मंच नहीं होता, बल्कि यह विश्व के नेताओं के बीच अनौपचारिक बैठकों (Side-lines Meetings) और कूटनीतिक संवाद का सबसे बड़ा केंद्र होता है। सामान्य परिस्थितियों में पड़ोसी देशों के विदेश मंत्रियों या प्रमुख नेताओं के बीच संक्षिप्त मुलाकात या शिष्टाचार भेंट होना एक सामान्य प्रोटोकॉल माना जाता है। लेकिन इस बार यूएनजीए के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और बांग्लादेशी पक्ष के बीच इस प्रकार के संवाद का पूरी तरह न होना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि कूटनीतिक स्तर पर अभी भी गहरा अविश्वास और संवादहीनता बनी हुई है। जानकारों का कहना है कि बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से वहां की अंतरिम या नई राजनीतिक व्यवस्था जिस तरह से आंतरिक दबाव और क्षेत्रीय ताकतों के प्रभाव में काम कर रही है, उससे भारत की सुरक्षा चिंताओं में इजाफा हुआ है। भारत हमेशा से यह चाहता रहा है कि पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न हो और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, लेकिन बांग्लादेश की तरफ से इन मुद्दों पर अपेक्षित नरमी न दिखाए जाने के कारण कूटनीतिक दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।

क्या भारत सचमुच अपनी शर्तों पर रिश्ते तय करने की क्षमता खो रहा है या यह एक सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति है?

इस सवाल पर अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के बीच अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां कुछ विश्लेषकों का यह मानना है कि भारत अपनी पारंपरिक 'बड़ा भाई' वाली भूमिका के तहत बांग्लादेश पर अपना कूटनीतिक दबाव बनाए रखने में कुछ हद तक असहज हो रहा है और वहां चीन जैसे अन्य देशों का बढ़ता दखल भारत की क्षेत्रीय बढ़त को चुनौती दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ रणनीतिकारों का यह भी कहना है कि भारत जल्दबाजी दिखाने के बजाय 'वाच एंड वेट' (Watch and Wait) की नीति पर काम कर रहा है। भारत यह अच्छी तरह समझता है कि बांग्लादेश के साथ भौगोलिक और सांस्कृतिक रिश्ते बहुत गहरे हैं, इसलिए किसी भी उतावलेपन के बजाय परिपक्व और नपे-तुले कदम उठाना ही फिलहाल सबसे बेहतर विकल्प है। हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में बांग्लादेश के साथ अपने पुराने और मजबूत संबंधों को पटरी पर लाने के लिए भारत को अपनी कूटनीति में कुछ नए और कड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। दक्षिण एशिया के इस सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक समीकरण पर पूरी दुनिया की पैनी नजर टिकी हुई है।