जज साहब के नाबालिग बेटा ने मर्सिडीज से स्कूटर सवार को कुचला; मिलॉर्ड पर थाने में हेकड़ी दिखाने का आरोप

जज साहब के नाबालिग बेटा ने मर्सिडीज से स्कूटर सवार को कुचला; मिलॉर्ड पर थाने में हेकड़ी दिखाने का आरोप

देश की न्याय व्यवस्था और कानून के रखवाले जब खुद ही कानून की धज्जियां उड़ाने लगें, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश या देश के किसी अन्य हिस्से से हाल ही में एक ऐसा ही झकझोर देने वाला और बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। एक तरफ जहां देश की अदालतें नाबालिगों द्वारा गाड़ी चलाने और सड़क सुरक्षा को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी करती हैं, वहीं दूसरी तरफ कानून के एक बड़े संरक्षक यानी जज साहब के नाबालिग बेटे ने अपनी तेज रफ्तार मर्सिडीज कार से एक बेकसूर स्कूटर सवार को बुरी तरह कुचल दिया। इस दर्दनाक हादसे में स्कूटर सवार गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे डरावना और शर्मनाक पहलू यह रहा कि जब मामला पुलिस थाने तक पहुंचा, तो आरोप है कि खुद 'मिलॉर्ड' यानी जज साहब ने थाने पहुंचकर अपनी खाकी के सामने जबरदस्त हेकड़ी दिखाई और कानून को ताक पर रखते हुए अपने नाबालिग बेटे को बचाने के लिए रसूख का इस्तेमाल किया। सड़क पर हुए इस हादसे और उसके बाद थाने में चले रसूख के खेल ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या देश में कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही बना है और क्या वीआईपी कल्चर के सामने न्याय की देवी की आंखें भी मूंद ली जाती हैं। आइए इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं कि इस पूरे हादसे की शुरुआत कैसे हुई और थाने के भीतर उस रात क्या कुछ देखने को मिला।

सड़क पर मौत बनकर दौड़ी मर्सिडीज: स्कूटर सवार को मारी जोरदार टक्कर

यह दिल दहला देने वाली घटना उस समय घटी जब सड़क पर आम दिनों की तरह आम लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त थे। पीड़ित स्कूटर सवार अपनी सामान्य गति से स्कूटर चलाकर अपने गंतव्य की ओर जा रहा था, उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पलों में उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाने वाली है। सड़क पर फर्राटा भर रही एक बेशकीमती और तेज रफ्तार मर्सिडीज कार, जिसे कोई और नहीं बल्कि एक नाबालिग लड़का चला रहा था, अचानक नियंत्रण से बाहर हो गई या उसकी तेज रफ्तार ने कहर बरपाया और उसने सीधे स्कूटर को अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि स्कूटर के परखच्चे उड़ गए और चालक हवा में उछलकर सड़क पर जा गिरा। उसके शरीर पर गंभीर चोटें आईं और वह खून से लथपथ होकर दर्द से छटपटाने लगा। आसपास मौजूद राहगीरों ने जब इस भयानक हादसे को देखा, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए। लोगों ने तुरंत दौड़कर घायल को संभाला और पुलिस को सूचना दी। लेकिन इस बीच सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस गाड़ी से यह हादसा हुआ था, उसका चालक कोई सामान्य युवक नहीं बल्कि एक नाबालिग था, जिसके पास ड्राइविंग लाइसेंस होना तो दूर, गाड़ी चलाने की कानूनी उम्र भी पूरी नहीं थी। सड़क सुरक्षा के नियमों की इस सरेआम धज्जियां उड़ते देख वहां मौजूद जनता का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने मौके पर ही मर्सिडीज और उसके नाबालिग चालक को घेर लिया।

जब मामला पहुंचा थाने: मिलॉर्ड पर लगे पुलिस के सामने हेकड़ी दिखाने और दबाव बनाने के आरोप

हादसे के बाद जब पुलिस ने मर्सिडीज कार और उसके नाबालिग चालक को हिरासत में लेकर थाने लाई, तो असली ड्रामे की शुरुआत वहीं से हुई। आम तौर पर जब कोई आम नागरिक इस तरह के गंभीर सड़क हादसे को अंजाम देता है, तो पुलिस तुरंत कानूनी कार्रवाई करते हुए उसे सलाखों के पीछे भेज देती है और मोटर व्हीकल एक्ट के तहत कड़ी धाराएं लगाई जाती हैं। लेकिन इस मामले में आरोपी कोई आम शख्स नहीं, बल्कि एक रसूखदार न्यायिक अधिकारी (जज) का बेटा था। सूत्रों और चश्मदीदों के हवाले से जो जानकारी सामने आई है, वह बेहद चौंकाने वाली है। आरोप है कि घटना की सूचना मिलते ही 'मिलॉर्ड' खुद थाने पहुंच गए। थाने के भीतर पहुंचने के बाद उन्होंने कानून के रखवालों यानी पुलिस अधिकारियों पर अपना रौब झाड़ना शुरू कर दिया। थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों पर कथित तौर पर यह दबाव बनाया जाने लगा कि उनके नाबालिग बेटे के खिलाफ कोई भी सख्त कानूनी कार्रवाई न की जाए और मामले को तुरंत प्रभाव से दबा दिया जाए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि थाने के अंदर जज साहब की उस हेकड़ी और रुतबे के आगे पुलिसकर्मी भी असहज नजर आए, क्योंकि उनके सामने खाकी की ताकत और न्याय के एक बड़े ओहदे के बीच कशमकश चल रही थी। एक बेकसूर नागरिक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था, और थाने के भीतर पुलिस स्टेशन की चारदीवारी के अंदर रसूख बचाने का खेल चल रहा था।

नाबालिगों द्वारा गाड़ी चलाने का बढ़ता चलन और कानून के दोहरे मापदंड पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से देश में नाबालिगों द्वारा लग्जरी गाड़ियां चलाने और सड़क पर बरपाए जा रहे कहर के गंभीर मुद्दे को राष्ट्रीय पटल पर ला खड़ा किया है। पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग महानगरों से ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां रसूखदार परिवारों के नाबालिग बच्चों ने तेज रफ्तार स्पोर्ट्स कारों या एसयूवी से मासूम लोगों की जान ले ली है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के स्पष्ट आदेश हैं कि अगर कोई नाबालिग वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता है या दुर्घटना को अंजाम देता है, तो वाहन मालिक और अभिभावक दोनों के खिलाफ सख्त से सख्त आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाने चाहिए। लेकिन जब देश के कानून की रक्षा करने वाले न्यायिक पदों पर बैठे लोग ही अपने बच्चों को कानून के दायरे से बाहर निकालने के लिए अपनी कुर्सी और रसूख का इस्तेमाल करने लगें, तो आम जनता का न्याय प्रणाली से विश्वास उठना स्वाभाविक है। लोग सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति के लिए कानून के मायने बदल जाते हैं? क्या एक आम आदमी का बेटा गलती करे तो उसे उम्रकैद या सुधार गृह भेजा जाए, और जज साहब का बेटा गलती करे तो उसे थाने से ही वीआईपी ट्रीटमेंट देकर घर भेज दिया जाए? यह दोहरा मापदंड हमारे लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है।

घायल पीड़ित की दयनीय स्थिति और न्याय की आस में भटकता परिवार

इस भीषण हादसे में जो शख्स सबसे ज्यादा प्रताड़ित हुआ है, वह है वह गरीब या मध्यमवर्गीय स्कूटर सवार, जिसका इस हादसे में कोई कसूर नहीं था। वह शख्स अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला हो सकता है, जो दिन-रात मेहनत करके अपने बाल-बच्चों का पेट पालता है। एक झटके में उस रसूखदार मर्सिडीज ने उसकी हड्डियों को चकनाचूर कर दिया और उसे अस्पताल के आईसीयू बेड पर ला खड़ा किया। आज वह परिवार अस्पताल के चक्कर काट रहा है, बिल चुकाने के लिए दर-दर भटक रहा है, और इस बात से डरा हुआ है कि क्या उसे इस देश में न्याय मिल पाएगा या नहीं। एक तरफ आरोपी का परिवार अपने रसूख और ताकत के बल पर मामले को रफा-दफा करने की जुगत में लगा है, तो दूसरी तरफ पीड़ित परिवार के पास आंसू बहाने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। अस्पताल के बिस्तर पर दर्द से कराहता वह घायल व्यक्ति बस यही सोच रहा होगा कि क्या इस देश में कानून सच में अंधा है या फिर वह ताकतवरों और रसूखदारों के आगे झुक जाता है।

क्या देश की न्याय व्यवस्था इस मामले में लेगी स्वतः संज्ञान?

इस सनसनीखेज घटना के मीडिया और सोशल मीडिया पर तूल पकड़ने के बाद अब देश भर के प्रबुद्ध नागरिकों और कानूनविदों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले में कोई उच्चस्तरीय जांच बैठाई जाएगी या नहीं। क्या उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय इस घटना का स्वतः संज्ञान लेते हुए उस रसूखदार जज और उनके नाबालिग बेटे के खिलाफ निष्पक्ष जांच के आदेश देगा? जनता यह देखना चाहती है कि क्या खाकी और न्यायपालिका मिलकर इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर पाएंगे या फिर हमेशा की तरह फाइलों को दबाकर इस हादसे को भी कागजों में दफन कर दिया जाएगा। देश की साख और न्याय व्यवस्था की गरिमा को बचाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि कानून अपना काम करे और पद या रसूख की परवाह किए बिना दोषी को उसकी सजा मिले। जब तक इस देश में हर नागरिक के लिए कानून एक समान नहीं होगा, तब तक 'सत्यमेव जयते' का नारा महज कागजी और बेमानी साबित होता रहेगा। इस दर्दनाक हादसे ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वाकई एक सभ्य और न्यायप्रिय समाज में जी रहे हैं जहाँ न्याय सबके लिए बराबर है।