पाकिस्तान के साथ गलबहियां कर रहा मालदीव, 20 समझौते किए, भारत के लिए नई चुनौती तो नहीं?

पाकिस्तान के साथ गलबहियां कर रहा मालदीव, 20 समझौते किए, भारत के लिए नई चुनौती तो नहीं?

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक पटल पर एक बार फिर से समीकरण तेजी से बदलते हुए नजर आ रहे हैं, जो भारतीय कूटनीति और रक्षा गलियारों के लिए गहरी चिंता का विषय बन सकते हैं। हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण द्वीप देश मालदीव ने अब भारत के पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ बहुत ही गहरे और व्यापक कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। हाल ही में दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बैठकों का दौर चला है, जिसमें व्यापार, रक्षा, शिक्षा, समुद्री सुरक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लगभग 20 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। कभी भारत 'फर्स्ट' की नीति पर चलने वाला मालदीव अब पाकिस्तान के साथ इस तरह की गलबहियां क्यों कर रहा है और क्या यह बदलाव आने वाले समय में भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और आधिपत्य के लिए कोई बड़ा रणनीतिक खतरा पैदा कर सकता है, इस पर वैश्विक विशेषज्ञों की पैनी नजर बनी हुई है।

मालदीव और पाकिस्तान के बीच अचानक से प्रगाढ़ हुए रिश्तों के पीछे का भू-राजनीतिक सच

मालदीव की राजनीति में पिछले कुछ समय से हुए नेतृत्व परिवर्तन के बाद से ही देश के विदेश और रक्षा दृष्टिकोण में एक स्पष्ट और नाटकीय बदलाव देखने को मिल रहा है। वहां की सरकार लगातार 'इंडिया आउट' जैसी नीतियों और बयानों के जरिए अपनी घरेलू राजनीति को साधने का प्रयास करती रही है, और इसी कड़ी में अब वह पाकिस्तान के साथ अपने सामरिक रिश्तों को मजबूत करने में जुट गई है। पाकिस्तान जैसे देश के साथ एक साथ 20 बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर करना यह साफ संकेत देता है कि मालदीव अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को बदल रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बाहरी ताकतों का सहारा ले रहा है। रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर होने वाले इन करारों के तहत दोनों देशों की सेनाओं के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और नौसैनिक सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है, जो भारत के दक्षिण तटीय सुरक्षा चक्र के लिए एक नया सिरदर्द साबित हो सकता है।

भारत के लिए यह नया गठजोड़ क्यों है चिंता का विषय, क्या है समुद्री सुरक्षा की चुनौती

भारत की सुरक्षा रणनीति हमेशा से अपने पड़ोसी देशों के साथ मजबूत और भरोसेमंद रिश्तों पर टिकी रही है, क्योंकि हिंद महासागर को भारत का प्राकृतिक सुरक्षा दायरा माना जाता है। ऐसे में मालदीव जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील समुद्री रास्ते पर स्थित देश का पाकिस्तान के साथ इस स्तर पर हाथ मिलाना भारत के समुद्री हितों के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और उसकी सेना की इस क्षेत्र में दखलंदाजी बढ़ने से भारत के दक्षिणी तटों, लक्षद्वीप और अरब सागर की निगरानी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। हालांकि मालदीव की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन और विदेशी सहायता पर निर्भर करती है, जिसके लिए वह भारत और पश्चिमी देशों की मदद के बिना लंबे समय तक नहीं टिक सकता, फिर भी इस प्रकार के कूटनीतिक समझौते क्षेत्रीय स्थिरता को बिगाड़ने का पूरा माद्दा रखते हैं।

क्या मालदीव की जनता और वहां की अर्थव्यवस्था इस राजनीतिक बदलाव को झेल पाएगी

कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मालदीव के वर्तमान नेतृत्व द्वारा उठाए जा रहे ये कदम भले ही तात्कालिक राजनीतिक लाभ या चीन-पाकिस्तान की धुरी को खुश करने के लिए उठाए जा रहे हों, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह देश के हित में नहीं हैं। भारत ने हमेशा संकट के समय मालदीव को सबसे पहले मदद पहुंचाई है, चाहे वह पानी की किल्लत हो, आर्थिक संकट हो या कोविड महामारी का दौर हो, और वहां की आम जनता इस बात को भली-भांति जानती है। पाकिस्तान के साथ व्यापारिक और सैन्य समझौते करने से मालदीव की अर्थव्यवस्था को कोई बहुत बड़ा लाभ मिलने की संभावना न के बराबर है, क्योंकि पाकिस्तान खुद अपने सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा है। ऐसे में केवल भारत विरोध की राजनीति के चलते अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को दांव पर लगाना मालदीव के लिए एक बड़ा रणनीतिक जुआ साबित हो सकता है, जिसका खामियाजा उसे भविष्य में भुगतना पड़ सकता है।

भारतीय कूटनीति की पैनी नजर और भविष्य के क्षेत्रीय समीकरणों का आकलन

इस पूरे घटनाक्रम पर नई दिल्ली में बैठे रणनीतिकार और विदेश मंत्रालय के अधिकारी बहुत ही बारीकी से नजर बनाए हुए हैं और हर एक गतिविधि का गहराई से आकलन कर रहे हैं। भारत भली-भांति जानता है कि हिंद महासागर में अपनी सुरक्षा और प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए उसे किस तरह से संतुलित और कड़े कदम उठाने हैं। आने वाले समय में भारत अपनी सामरिक कूटनीति के जरिए मालदीव के साथ रिश्तों को संभालने के साथ-साथ क्षेत्र में अपने प्रभाव को और अधिक मजबूत करने के लिए नए विकल्प तलाश सकता है। अंततः यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या मालदीव अपनी इस नई पाकिस्तानपरस्त नीति पर अडिग रहता है या फिर क्षेत्रीय वास्तविकताओं को समझते हुए अपने पुराने और भरोसेमंद साथी भारत के साथ संबंधों को फिर से सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाता है।