अंतरिक्ष से धरती की तरफ आ रहा नासा का 1100 किलो का टेलीस्कोप
अंतरिक्ष की अथाह गहराइयों में पिछले दो दशकों से ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों से पर्दा उठाने वाला नासा का प्रसिद्ध स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी टेलीस्कोप अब अपनी आखिरी यात्रा पर है और अनियंत्रित होकर सीधे धरती की तरफ खिंचा चला आ रहा है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और वैश्विक अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की चिंताओं को बढ़ाने वाली इस घटना ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। लगभग 22 वर्षों तक अंतरिक्ष में रहकर गामा किरण विस्फोटों और ब्लैक होल जैसी खगोलीय घटनाओं की सटीक जानकारी देने वाला यह लगभग 1,100 से 1,500 किलोग्राम वजनी टेलीस्कोप अब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने की तैयारी में है। स्पेस एक्सपर्ट्स के मुताबिक अंतरिक्ष का यह दिग्गज उपकरण अपनी तय कक्षा से लगातार नीचे खिसक रहा है और आने वाले दिनों में यह कभी भी धरती के वायुमंडल से टकरा सकता है। इस अनियोजित और खतरनाक री-एंट्री ने आम जनता से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान संगठनों की धड़कनें तेज कर दी हैं क्योंकि इस मलबे का कुछ हिस्सा जलने से बचकर धरती की सतह या समुद्र में गिर सकता है।
कैसे बिगड़ी अंतरिक्ष के इस वैज्ञानिक प्रहरी की स्थिति और क्यों नाकाम हुए बचाव अभियान
इस असाधारण टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में बनाए रखने और इसकी कक्षा को सुरक्षित रूप से ऊंचा करने के लिए नासा ने पिछले एक साल से कई बड़े प्रयास किए थे। अंतरिक्ष एजेंसी ने एक निजी स्पेस कंपनी को इस चुनौतीपूर्ण और अनोखे बचाव मिशन की जिम्मेदारी सौंपी थी जिसके तहत अंतरिक्ष में एक रोबोटिक यान भेजा गया था ताकि इस भारी-भरकम टेलीस्कोप को पकड़कर सुरक्षित ऑर्बिट में स्थापित किया जा सके। हालांकि यह अभियान अपनी तकनीकी जटिलताओं और अंतरिक्ष के अप्रत्याशित माहौल के कारण सफल नहीं हो सका। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में सूर्य की तीव्र सौर गतिविधियों और भयंकर सौर तूफानों के कारण धरती के वायुमंडल का ऊपरी हिस्सा अत्यधिक गर्म होकर फैल गया था। इस फैलाव की वजह से अंतरिक्ष में मौजूद इस टेलीस्कोप पर वायुमंडलीय खिंचाव या ड्रैग बहुत अधिक बढ़ गया जिसकी वजह से इसकी ऊंचाई सामान्य से कहीं ज्यादा तेजी से घटने लगी। अक्टूबर के आखिर तक स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि यह टेलीस्कोप वैज्ञानिक अवलोकन करने के लायक भी नहीं बचा जिसके बाद नासा ने इसके सभी आंतरिक तंत्रों को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
क्या भारत समेत दुनिया के कई देश आ चुके हैं इस खतरनाक मलबे के सीधे दायरे में
जैसे-जैसे यह भारी-भरकम टेलीस्कोप पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके संभावित प्रभाव वाले क्षेत्रों को लेकर अटकलों और चेतावनियों का दौर तेज हो गया है। अमेरिकी स्पेस फोर्स और दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों के ताजा ट्रैकिंग डेटा के अनुसार इस री-एंट्री का संभावित भौगोलिक दायरा काफी विस्तृत है जिसमें भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया तथा मध्य और दक्षिण अमेरिका के बड़े हिस्से शामिल हैं। हालांकि आम लोगों के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या यह सीधा किसी रिहायशी इलाके पर गिरेगा या कोई बड़ा नुकसान पहुंचाएगा। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस पर स्पष्ट किया है कि जब कोई भारी अंतरिक्षीय वस्तु वायुमंडल में प्रवेश करती है तो भीषण घर्षण और उच्च तापमान के कारण उसका अधिकांश हिस्सा जलकर राख हो जाता है। इसके बावजूद टंगस्टन जैसी बेहद मजबूत धातुओं से बने कुछ कॉम्पोनेंट और दर्पण के टुकड़े इस भयंकर गर्मी को झेलकर नीचे तक पहुंच सकते हैं। गनीमत यह है कि धरती का अधिकांश हिस्सा पानी से ढका हुआ है और इस बात की संभावना सबसे ज्यादा है कि बचा हुआ मलबा किसी सुनसान इलाके या महासागर में समा जाएगा।
अंतरिक्ष कचरे की बढ़ती विकराल समस्या और भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी
नासा के इस टेलीस्कोप का धरती की तरफ वापस लौटना केवल एक अकेली घटना नहीं है बल्कि यह अंतरिक्ष में लगातार फैल रहे खतरनाक स्पेस मलबे की भयावह तस्वीर को भी उजागर करता है। आज के समय में पृथ्वी की निचली कक्षा में हजारों की संख्या में बड़े निष्क्रिय उपग्रह और लाखों छोटे-छोटे मलबे के टुकड़े अनियंत्रित होकर चक्कर काट रहे हैं जो भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए भी एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। जब इस तरह के भारी उपग्रह या वेधशालाएं बिना किसी नियंत्रण के वायुमंडल में लौटती हैं तो उन्हें ट्रैक करना और उनके गिरने की सटीक जगह का अनुमान लगाना बेहद कठिन हो जाता है। हालांकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग Radar जैसी आधुनिक तकनीकें भी अब अंतरिक्षीय वस्तुओं की अंतिम कक्षाओं और उनके वायुमंडल में प्रवेश करने से पहले की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने में सक्षम हो चुकी हैं। वैज्ञानिक अब इस तरह की घटनाओं से सबक लेते हुए भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों में ऐसे डिजाइन तैयार कर रहे हैं जिन्हें आसानी से सुरक्षित तरीके से नष्ट किया जा सके या जिन्हें अंतरिक्ष में ही ईंधन भरकर दोबारा चालू रखा जा सके।