टुकड़े-टुकड़े होने से बच गया पाकिस्तान, कब तक आसिम मुनीर को रोक पाएंगे शहबाज शरीफ?
पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर और जटिल दौर से गुजर रहा है। देश की अर्थव्यवस्था कगार पर है और राजनीतिक अस्थिरता ने आम जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर दिया है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ देश की डूबती हुई नैया को पार लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक हथकंडे अपना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ देश की वास्तविक ताकत माने जाने वाले फील्ड मार्शल और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की नीतियों ने पाकिस्तान के आंतरिक ढांचे को अंदर से खोखला कर दिया है। पाकिस्तान एक बार फिर टुकड़े-टुकड़े होने से किसी तरह बाल-बाल बचा है, लेकिन यह राहत कितने दिनों की होगी, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। विश्लेषकों का मानना है कि शहबाज शरीफ चाहकर भी आसिम मुनीर के बढ़ते सैन्य हस्तक्षेप और तानाशाही रवैये पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं, क्योंकि सरकार का वजूद खुद सेना के समर्थन पर ही टिका हुआ है।
आर्थिक बदहाली और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बीच पिसता मुल्क
पाकिस्तान की माली हालत इस हद तक खराब हो चुकी है कि उसे अपनी हर जरूरत के लिए विदेशी कर्जदाताओं और मित्र देशों के सामने हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर दोनों ही देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए वैश्विक मंचों पर समझौते की कोशिशें कर रहे हैं, परंतु घरेलू स्तर पर सुधरने के बजाय हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। अमेरिका, चीन और खाड़ी के देशों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान खुद सामरिक और आर्थिक जाल में फंसता जा रहा है। चीन की तरफ से मिल रहे भारी-भरकम कर्जों और ड्रैगन की नीतियों के आगे पाकिस्तान की संप्रभुता लगभग गिरवी जैसी स्थिति में पहुंच चुकी है। शहबाज शरीफ प्रशासन देश की जनता को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन हकीकत यह है कि देश का खजाना खाली हो चुका है और महंगाई आसमान छू रही है।
शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के बीच गुप्त खींचतान
पाकिस्तान की हुकूमत भले ही कागजों पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के नेतृत्व में चलती दिखती हो, लेकिन सत्ता के असली गलियारों में हुक्म सिर्फ और सिर्फ सेना प्रमुख आसिम मुनीर का ही चलता है। दोनों के बीच पर्दे के पीछे वर्चस्व की एक लंबी और गहरी जंग छिड़ी हुई है। जब कभी देश को अंतरराष्ट्रीय मंच पर नरमी दिखाने या बातचीत की पहल करने की जरूरत होती है, तो प्रधानमंत्री आगे आते हैं, लेकिन सेना प्रमुख की कट्टर और आक्रामक नीतियां उन सभी diplomatic प्रयासों पर पानी फेर देती हैं। इमरान खान की पार्टी और उनके समर्थकों का मजबूत जनआधार भी सेना के लिए एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। जनता के गुस्से और रोष को दबाने के लिए आपातकालीन उपाय और सख्त प्रशासनिक कदम उठाए जा रहे हैं, जो अक्सर उल्टा पड़ जाते हैं। ऐसे में शहबाज शरीफ के लिए यह तय करना बेहद कठिन होता जा रहा है कि वे जनता के असंतोष को सुनें या सेना प्रमुख के फैसलों के आगे घुटने टेक दें।
बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सुलगती बगावत की आग
पाकिस्तान के भीतर भूगोलीय और प्रांतीय तनाव इस समय अपने चरम पर पहुंच चुका है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे प्रांतों में सुरक्षा बलों और स्थानीय विद्रोहियों के बीच संघर्ष लगातार खूनी रूप लेता जा रहा है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और अन्य विद्रोही संगठन पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीतियों के खिलाफ लगातार घातक हमले कर रहे हैं। सरकार द्वारा घोषित आपातकालीन और दमनकारी कदम भी इन इलाकों में शांति स्थापित करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। स्थानीय जनता अब खुलकर सेना और मौजूदा हुक्मरानों के खिलाफ सड़कों पर उतर रही है। पाकिस्तान का भौगोलिक ताना-बाना बिखरने की कगार पर है और क्षेत्रीय असंतोष इस बात की गवाही दे रहा है कि आने वाले दिनों में देश के भीतर बड़े भू-राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिल सकते हैं।
क्या शहबाज शरीफ रोक पाएंगे आसिम मुनीर के बढ़ते कदम?
यह सवाल आज के समय में पाकिस्तानी राजनीति का सबसे अहम केंद्र बन गया है कि क्या शहबाज शरीफ कभी इतनी राजनीतिक ताकत जुटा पाएंगे कि वे आसिम मुनीर के फैसलों को चुनौती दे सकें? इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान में जब-जब प्रधानमंत्री ने सेना के प्रभुत्व को ललकारने की कोशिश की है, तब-तब तख्तापलट हुआ है या सरकार को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा है। शहबाज शरीफ की अपनी राजनीतिक मजबूरियां हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि जिस दिन सेना का साया उनके सिर से हटा, उसी दिन उनकी कुर्सी भी चली जाएगी। यही वजह है कि वे सब कुछ जानते हुए भी खामोश रहने को मजबूर हैं। पाकिस्तान का यह संकट केवल दो व्यक्तियों की कुर्सी की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह एक पूरे राष्ट्र के अस्तित्व और भविष्य का संकट है, जहां लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं बची है और देश पूरी तरह से सैन्य तंत्र के शिकंजे में कसता चला जा रहा है।