डोनाल्ड ट्रंप के हारते पाकिस्तान ने उठाया कटोरा, सऊदी ने दिया खैरात तभी मिलेगी रोटी

डोनाल्ड ट्रंप के हारते पाकिस्तान ने उठाया कटोरा, सऊदी ने दिया खैरात तभी मिलेगी रोटी

आज की वैश्विक राजनीति में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है। एक समय पर दुनिया के ताकतवर देशों के सामने शर्तें रखने वाला इस्लामाबाद आज वित्तीय रूप से पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है। हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और अमेरिकी सत्ता के गलियारों से लेकर खाड़ी के देशों तक, कूटनीति के हर मोर्चे पर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था रसातल में जाती दिख रही है। जब भी वैश्विक महाशक्तियों के समीकरण बदलते हैं, तो पाकिस्तान जैसे कर्ज में डूबे देशों की मुश्किलें सबसे पहले बढ़ती हैं। वर्तमान परिदृश्य में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है, जहां अमेरिकी नीतियों और घरेलू आर्थिक बदहाली के चलते पाकिस्तान को एक बार फिर पारंपरिक सहयोगियों के सामने हाथ फैलाने पड़े हैं।

कटोरा लेकर सऊदी अरब की शरण में पहुंचा पाकिस्तान

पाकिस्तान की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था किसी से छिपी नहीं है। विदेशी मुद्रा भंडार के लगभग खाली होने और अंतरराष्ट्रीय कर्ज के बोझ तले दबे पाकिस्तान के हुक्मरानों के पास अपने ही देश को चलाना मुश्किल हो गया है। स्थिति यह है कि देश के प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्री तक दुनिया भर के मंचों पर यह स्वीकार कर चुके हैं कि उन्हें फंड मांगने के लिए किन जिल्दतों का सामना करना पड़ता है। इसी क्रम में एक बार फिर पाकिस्तान ने अपनी वित्तीय नैया पार लगाने के लिए सऊदी अरब के आगे कटोरा फैला दिया है। सऊदी सरकार द्वारा पाकिस्तान की वित्तीय मदद और डिपॉजिट्स को आगे बढ़ाने के बाद ही वहां के नागरिकों को दो वक्त की रोटी नसीब हो पा रही है। यदि रियाद का यह आर्थिक सुरक्षा कवच न मिले, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था एक हफ्ते भी टिक नहीं सकती।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तें और कर्ज का मकड़जाल

पाकिस्तान की रीढ़ पूरी तरह से विदेशी कर्जों और बेलआउट पैकेजों पर टिकी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से मिलने वाले बेलआउट पैकेज के लिए पाकिस्तान को कड़ी शर्तों का पालन करना पड़ रहा है। IMF ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिए हैं कि पाकिस्तान को अपने पुराने कर्ज चुकाने के लिए सऊदी अरब, चीन और अन्य मित्र देशों से मिले फंड को होल्ड रखना होगा या उन्हें री-शेड्यूल कराना होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान के वित्त मंत्री और अन्य आला अधिकारी लगातार रियाद और वॉशिंगटन के चक्कर काट रहे हैं। सऊदी अरब द्वारा बढ़ाई गई वित्तपोषण सुविधाएं और तीन अरब डॉलर की रीफाइनेंसिंग व्यवस्था दरअसल पाकिस्तान की डूबती हुई अर्थव्यवस्था को कृत्रिम सांस देने जैसी है। अगर यह मदद वक्त पर न मिले, तो पाकिस्तान डिफ़ॉल्ट होने की कगार पर पहुंच जाता है।

कूटनीति, रक्षा समझौते और कतर की एंट्री

अपनी आर्थिक और सामरिक विफलताओं को छिपाने के लिए पाकिस्तान हाल ही में क्षेत्रीय स्तर पर नए गठजोड़ बनाने की जुगत में भी लगा रहा है। हाल ही में सामने आए रक्षा समझौतों और खाड़ी देशों के साथ कूटनीतिक नजदीकियों को पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश करता है, लेकिन हकीकत यह है कि इन समझौतों के पीछे भी आर्थिक मदद हासिल करने की बड़ी मजबूरी छिपी होती है। यूएई और अन्य देशों के पुराने कर्जों को चुकाने और संभालने के लिए अब कतर और सऊदी अरब जैसे देश नया वित्तीय विकल्प बनकर उभर रहे हैं। पाकिस्तान की सेना और सरकार के नुमाइंदे भले ही दुनिया के सामने अपनी धमक दिखाने का प्रयास करें, परंतु कड़वी सच्चाई यही है कि बिना खाड़ी देशों की खैरात के पाकिस्तान का जनजीवन और प्रशासनिक मशीनरी ठप पड़ जाएगी।

निष्कर्ष: भविष्य के गर्भ में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था

आने वाले समय में पाकिस्तान के लिए यह राह और अधिक कठिन होने वाली है। वैश्विक स्तर पर बदलती राजनीतिक हवा और अमेरिकी नेतृत्व में होने वाले बदलावों का सीधा असर पाकिस्तान की अनुदान और सहायता नीतियों पर पड़ता है। जब तक पाकिस्तान अपनी आंतरिक व्यवस्था, कर सुधारों और अनुत्पादक खर्चों पर लगाम नहीं कसता, तब तक उसका यह 'कटोरा संस्कृति' वाला दौर समाप्त नहीं हो सकता। सऊदी अरब की खैरात और अस्थायी राहत पैकेज कुछ समय के लिए भले ही पाकिस्तान की सांसें चलाए रखें, लेकिन यह किसी भी देश के दीर्घकालिक और स्थायी विकास का मार्ग नहीं हो सकता।