शहबाज-मुनीर कान खोलकर सुन लें अपने जनरल की बात, ईरान-अमेरिका छोड़ो, भारत से विवाद सुलझाओ

शहबाज-मुनीर कान खोलकर सुन लें अपने जनरल की बात, ईरान-अमेरिका छोड़ो, भारत से विवाद सुलझाओ

पड़ोसी देश पाकिस्तान में इन दिनों सियासी गलियारों से लेकर सैन्य मुख्यालयों तक एक ऐसी जोरदार बहस छिड़ गई है, जिसने वहां की हुकूमत और सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों की नींद उड़ाकर रख दी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को अब उनके अपने ही देश के एक वरिष्ठ और प्रभावशाली सैन्य अधिकारी ने बेहद दो टूक और आईना दिखाने वाली सलाह दे डाली है। इस बयान के सामने आने के बाद से ही इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी तक हड़कंप मचा हुआ है। पाकिस्तानी जनरल ने अपनी सरकार को यह साफ चेतावनी दी है कि वे दुनिया भर के देशों खासकर अमेरिका और ईरान के साथ अपनी रणनीतिक चालें चलने और बेवजह के कूटनीतिक हथकंडे अपनाने से बाज आएं। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा है कि अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को रसातल में जाने से बचाने और देश को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग होने से रोकने का एकमात्र रास्ता यही है कि पाकिस्तान फौरन भारत के साथ अपने दशकों पुराने और अटके हुए सभी विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाए।

पाकिस्तानी जनरल की इस दो टूक सलाह के पीछे की असली और गहरी वजह

किसी भी देश की सेना या हुकूमत के भीतर से जब इस तरह की आवाज उठती है, तो उसके पीछे जमीनी हकीकत और लाचारी बहुत गहरी होती है। पाकिस्तान पिछले कई सालों से जिस तरह के भयंकर आर्थिक संकट, कर्ज के दलदल और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, उससे वहां का हर एक समझदार नागरिक वाकिफ है। पाकिस्तानी जनरल द्वारा शहबाज शरीफ और असीम मुनीर को दी गई यह नसीहत इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि देश के भीतर अब यह अहसास तेजी से बढ़ने लगा है कि भारत के साथ दुश्मनी मोल लेकर और सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देकर पाकिस्तान का भला होने वाला नहीं है। वर्षों से भारत विरोधी राग अलापने और कश्मीर समेत अन्य मुद्दों पर अड़ियल रवैया अपनाने के कारण पाकिस्तान की अपनी अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है। देश की जनता दो वक्त की रोटी, पेट्रोल, बिजली और बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रही है, जबकि हुक्मरान अपनी जिद छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

अमेरिका और ईरान के मोर्चे पर पाकिस्तान की विफल कूटनीति

पाकिस्तान की विदेश नीति हमेशा से दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर चलाने वाली रही है। कभी अमेरिका की छत्रछाया में रहकर डॉलर बटोरना और कभी पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक समीकरणों में ईरान के साथ अपनी चालें चलना पाकिस्तान की पुरानी आदत रही है। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका का झुकाव भारत की ओर और मजबूत हो चुका है, और अमेरिका अब आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को पहले की तरह खुली छूट देने के मूड में बिल्कुल नहीं है। वहीं दूसरी ओर, ईरान के साथ भी सीमाई इलाकों और सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान के रिश्ते अक्सर तनावपूर्ण बने रहते हैं। इन दोनों देशों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में पाकिस्तान खुद अपनी ही बनाई हुई कूटनीतिक चालों में उलझ कर रह गया है। पाकिस्तानी जनरल का यही दर्द छलक कर बाहर आया है कि जब देश का घर ही अंदर से खोखला हो रहा हो, तब अमेरिका और ईरान जैसे देशों के पीछे भागने से पाकिस्तान को कुछ हासिल नहीं होने वाला है, बल्कि उसे अपनी प्राथमिकताओं को दुरुस्त करना होगा।

भारत के साथ शांति और संवाद ही क्यों है पाकिस्तान के लिए एकमात्र विकल्प

भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। एक तरफ जहां भारत ने अपनी आर्थिक ताकत, तकनीकी विकास, अंतरिक्ष विज्ञान और वैश्विक कूटनीति के दम पर दुनिया भर में अपना एक अलग मुकाम बना लिया है और दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान कंगाली के कगार पर खड़ा होकर दुनिया के सामने कटोरा लेकर घूमने को मजबूर है। ऐसे में किसी भी समझदार सैन्य रणनीतिकार का यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक है कि भारत के साथ व्यापारिक रास्ते बंद रखने और हमेशा युद्ध का माहौल बनाए रखने से नुकसान सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान का ही हो रहा है। भारत ने हमेशा से बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं, बशर्ते आतंकवाद का रास्ता पूरी तरह से छोड़ा जाए। अब पाकिस्तान के अंदर से ही यह आवाज उठने लगी है कि बिना किसी झूठी शान और अहंकार के, शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर को अपनी जिद छोड़कर भारत के साथ द्विपक्षीय बातचीत की मेज पर आना चाहिए ताकि अटके हुए मसलों का कोई शांतिपूर्ण हल निकल सके और दोनों देशों के बीच व्यापार एवं अमन-चैन की बहाली हो सके।

पाकिस्तानी अवाम की उम्मीदें और हुक्मरानों की जिद के बीच की खाई

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या शहबाज शरीफ और जनरल असीम मुनीर अपनी जिद छोड़कर इस समझदारी भरे सुझाव पर अमल करेंगे? पाकिस्तान की आम जनता अब युद्ध, नफरत और आतंकवाद के साए में नहीं जीना चाहती। वहां के लोग भी अब यह अच्छी तरह समझने लगे हैं कि भारत के साथ मुकाबला करने या उससे उलझने से उनके घरों के चूल्हे नहीं जलने वाले। जनता चाहती है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और रोजगार पर ध्यान दिया जाए, जो कि केवल तभी संभव है जब देश में शांति हो और पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध हों। लेकिन पाकिस्तान का सैन्य और राजनीतिक तंत्र अपनी आंतरिक राजनीति और भारत विरोध के एजेंडे से बाहर निकलने में असमर्थ दिखता है। इसके बावजूद, अपने ही जनरल द्वारा इस प्रकार की खुली चेतावनी दिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पाकिस्तान के भीतर अब बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है।

क्या भारत के साथ संबंधों में पिघल पाएगी कूटनीतिक बर्फ

आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि शहबाज सरकार और सेना प्रमुख जनरल मुनीर इस सलाह को किस रूप में लेते हैं। क्या वे अपनी पुरानी और असफल नीतियों पर ही चलते रहेंगे या फिर देश हित को सर्वोपरि रखते हुए भारत के साथ बातचीत की पहल करने का साहस जुटाएंगे? भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। यदि पाकिस्तान सचमुच अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना चाहता है और अपने वजूद को बनाए रखना चाहता है, तो उसे आतंकवाद का समर्थन हमेशा के लिए बंद करना होगा। तब तक, अपने ही जनरल के इन कड़े शब्दों ने पाकिस्तान की हुकूमत को कटघरे में खड़ा कर दिया है और जनता के बीच एक नई बहस छेड़ दी है, जो आने वाले दिनों में पाकिस्तान की राजनीति की दिशा तय करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है।