US-Iran Tension: होर्मुज जलडमरूमध्य बना जंग का नया अखाड़ा, अमेरिका-ईरान का 60 दिनों वाला शांति समझौता खत्म; डोनाल्ड ट्रंप ने ओमान को दी बमबारी की धमकी, पश्चिम एशिया में भीषण संकट
पश्चिम एशिया में शांति बहाली की उम्मीदों को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MoU) 60 दिनों की तय समय-सीमा पूरी होने के साथ ही औपचारिक रूप से निष्प्रभावी हो गया। फ्रांस के वर्साय पैलेस में जून के मध्य में हस्ताक्षरित इस अंतरिम समझौते का मुख्य उद्देश्य सैन्य कार्रवाइयों पर विराम लगाना, स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करना और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल जलमार्ग 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को अंतरराष्ट्रीय पोतों के लिए सुरक्षित रूप से खोलना था।
हालांकि, दो महीने की समयावधि बीत जाने के बाद भी दोनों देशों के बीच मतभेद सुलझने के बजाय और अधिक गहरा गए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अधिकार, पोतों से चुंगी (टोल टैक्स) वसूलने के अधिकार और क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर ईरान और अमेरिका आमने-सामने आ चुके हैं, जिससे खाड़ी क्षेत्र में एक बार फिर पूर्ण युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं।
क्या था 14 सूत्रीय वर्साय समझौता और 60 दिनों की डेडलाइन?
जून 2026 में फ्रांस और पाकिस्तान की कूटनीतिक मध्यस्थता के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के प्रतिनिधियों के बीच एक 14 सूत्रीय अंतरिम समझौता हुआ था। इस समझौते में दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी रूप से सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई थी।
समझौते के तहत प्रमुख शर्तें निम्नलिखित थीं:
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अमेरिका को 30 दिनों के भीतर ईरान पर लगाई गई नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करनी थी, तेल निर्यात के लिए प्रतिबंधों में छूट देनी थी और विदेशों में जब्त ईरानी फंड तक पहुंच बहाल करनी थी।
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ईरान के युद्धोत्तर पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब डॉलर का एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पैकेज तैयार करने की बात कही गई थी।
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बदले में ईरान को होर्मुज जलडमरूमध्य से बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाना था और 60 दिनों तक वाणिज्यिक पोतों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित मार्ग देना था।
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तेहरान को अपने परमाणु कार्यक्रम को हथियार निर्माण की दिशा में आगे न बढ़ाने की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता दोहरानी थी।
लेकिन समझौते पर दस्तखत के महज कुछ हफ्तों के भीतर ही दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर शर्तों के उल्लंघन के आरोप लगाने शुरू कर दिए और विस्तृत परमाणु वार्ताएं शुरू ही नहीं हो सकीं।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान का नया नक्शा और ट्रंप की तीखी धमकी
समझौते के विफल होने के केंद्र में होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण रहा। ईरान ने हाल ही में एक नया नौवहन नक्शा जारी करते हुए दावा किया कि होर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों को ईरानी तट के करीब से ही गुजरना होगा, जबकि ओमान की ओर जाने वाले मार्ग को तेहरान ने प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने बयान दिया कि ईरान और ओमान के बीच होर्मुज से जहाजों की आवाजाही के लिए एक द्विपक्षीय समझौता अंतिम चरण में है। इसके तहत पोत ईरान के करीब से प्रवेश करेंगे और ओमान के तट से बाहर निकलेंगे।
ईरान के उप-विदेश मंत्री काजिम गरीबआबादी ने कड़े शब्दों में कहा कि "होर्मुज जलडमरूमध्य अतीत में भी ईरान का था, आज भी ईरान का है और भविष्य में भी ईरानी संप्रभुता के अधीन रहेगा। इसे किसी ट्वीट, एयरक्राफ्ट कैरियर या चुनावी भाषणों से छीना नहीं जा सकता। यह मार्ग केवल ईरान के आदेश पर ही खुलेगा।"
ईरान और ओमान के बीच इस संभावित तालमेल पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह भड़क उठे। फॉक्स न्यूज को दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने सीधी सैन्य धमकी देते हुए कहा कि अगर ओमान अमेरिका और ईरान के बीच किसी समझौते की राह में रोड़ा बनता है, तो अमेरिका ओमान पर भारी बमबारी करेगा। ट्रंप ने दावा किया कि होर्मुज पर अमेरिका का पूर्ण नियंत्रण है और ईरान को बिना शर्त आत्मसमर्पण कर देना चाहिए तथा युद्ध क्षतिपूर्ति की भरपाई करनी चाहिए।
लेबनान युद्धविराम और हूती हमलों ने बढ़ाया बारूदी तनाव
समझौता टूटने का एक अन्य प्रमुख कारण लेबनान का मोर्चा रहा। एमओयू के पहले अनुच्छेद में लेबनान की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करने की बात कही गई थी, लेकिन इजरायल ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेनाएं हटाने और हवाई हमले रोकने से साफ इनकार कर दिया। तेहरान का आरोप था कि वाशिंगटन ने इजरायल पर दबाव नहीं बनाया, जिससे समझौते की मूल भावना खत्म हो गई।
दूसरी ओर, यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर (Red Sea) और बाब अल-मंदेब में सऊदी अरब और पश्चिमी देशों के तेल टैंकरों पर ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइल हमले तेज कर दिए। इससे होर्मुज बंद होने के बाद वैकल्पिक मार्ग के रूप में इस्तेमाल हो रहा लाल सागर कॉरिडोर भी गंभीर खतरे में पड़ गया। जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके प्रतिशोध में ईरान ने बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर रॉकेट दागे।
वैश्विक ऊर्जा संकट: कच्चे तेल की कीमतों में 20% उछाल का खतरा
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील तेल चोकपॉइंट (Chokepoint) है। वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले कुल समुद्री कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकीर्ण समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। 60 दिनों की समय-सीमा खत्म होने के बाद जहाजों का आवागमन युद्ध-पूर्व स्तर के मात्र 10 से 15 प्रतिशत पर सिमट गया है।
ऊर्जा विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह गतिरोध सैन्य टकराव में बदलता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। भारत अपनी कुल तेल खपत का 80% से अधिक हिस्सा आयात करता है और उसका एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से होर्मुज के रास्ते आता है। हालांकि भारत ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को सक्रिय कर रखा है, लेकिन लंबा गतिरोध देश के आयात बिल और महंगाई दर को बढ़ा सकता है।
मध्यस्थ पाकिस्तान और कतर की कूटनीतिक कोशिशें बेअसर
जून के समझौते को आकार देने में इस्लामाबाद और दोहा ने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई थी। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा कि पाकिस्तान दोनों पक्षों को पुनः वार्ता की मेज पर लाने का प्रयास कर रहा है और कूटनीतिक संदेशों का आदान-प्रदान जारी है।
हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अमेरिका के साथ कोई सीधी बातचीत नहीं कर रहे हैं और जब तक वाशिंगटन अपनी आर्थिक नाकेबंदी नहीं हटाता, तब तक कोई औपचारिक बैठक संभव नहीं है। उधर, ट्रंप प्रशासन आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले सख्त रुख दिखाकर घरेलू वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति पर काम कर रहा है और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान को वित्तीय रूप से घुटनों पर लाने की नीति अपना रहा है।
आगे क्या? क्या पश्चिम एशिया में छिड़ेगा एक और बड़ा युद्ध?
समझौता ज्ञापन की 60 दिनों की वैधता खत्म होने के बाद अब दोनों पक्ष रणनीतिक इंतजार की मुद्रा में हैं। ईरान का मानना है कि वह अमेरिकी दबाव को झेलते हुए लंबे समय तक गतिरोध जारी रख सकता है और होर्मुज की नाकेबंदी को नए सामान्य (New Normal) के रूप में स्थापित कर सकता है। वहीं अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की अनिश्चितकालीन नौसैनिक नाकेबंदी बनाए रखने और प्रतिबंधों से कोई छूट न देने का फैसला किया है।
सैन्य विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि दोनों पक्षों में से किसी ने भी होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों पर बड़ा हमला किया या नौसैनिक टकराव की नौबत आई, तो यह संकट केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समूचा खाड़ी क्षेत्र एक भयावह क्षेत्रीय युद्ध की चपेट में आ सकता है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि कूटनीति इस संकट का कोई शांतिपूर्ण समाधान निकाल पाती है या होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा विनाशकारी मोर्चा साबित होगा।