आइजनकोट सरकार बनाने में फेल हुए तो क्या होगा? क्या बेंजामिन नेतन्याहू की होगी वापसी
इजराइल की राजनीति इस समय एक बेहद रोमांचक और निर्णायक मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां देश के राष्ट्रपति इसाक हजोर्ग ने विपक्षी नेता और पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजनकोट को नई सरकार बनाने का औपचारिक दायित्व सौंप दिया है। इस राजनीतिक घटनाक्रम को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लंबे राजनीतिक सफर के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि चुनाव के बाद किसी भी धड़े को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। हालांकि, आइजनकोट को 67 सांसदों का समर्थन प्राप्त होने के बाद यह जिम्मेदारी मिली है, लेकिन गठबंधन की यह राह इतनी आसान नहीं है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि यदि आइजनकोट बहुमत साबित करने या गठबंधन सरकार का गठन करने में विफल रहते हैं, तो इजराइल के राजनीतिक भविष्य और बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की क्या संभावनाएं बचेंगी।
इजराइल में राजनीतिक गतिरोध और राष्ट्रपति का बड़ा फैसला
इजराइल के हालिया चुनावों ने यह साबित कर दिया है कि देश की जनता बंटी हुई है और किसी भी एक दल को स्पष्ट जनादेश नहीं मिला है। चुनाव परिणामों के आने के बाद से ही राजनीतिक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था, जिसे दूर करने के लिए राष्ट्रपति इसाक हजोर्ग ने विभिन्न दलों के नेताओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया। राष्ट्रपति के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना था कि संसद यानी नेसेट में सरकार बनाने की क्षमता किसके पास है। अंततः, विभिन्न विपक्षी दलों और कुछ अन्य गुटों के समर्थन के आधार पर गादी आइजनकोट को सरकार गठन का न्यौता मिला। इस कदम ने देश के राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है, क्योंकि यह पहली बार है जब नेतन्याहू के प्रभुत्व को इतने कड़े और संगठित तरीके से चुनौती दी गई है।
गादी आइजनकोट के सामने गठबंधन सरकार बनाने की कठिन चुनौतियां
गादी आइजनकोट को राष्ट्रपति की ओर से सरकार बनाने के लिए 28 दिनों का समय मिला है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर दो सप्ताह के लिए और बढ़ाया जा सकता है। हालांकि उन्हें 67 सांसदों का समर्थन जरूर मिला है, लेकिन वैचारिक रूप से भिन्न दलों को एक मंच पर लाना एक लोहे के चने चबाने जैसा है। आइजनकोट के इस ब्लॉक में सेंटर-लेफ्ट पार्टियां, अरब दल और कुछ अन्य राजनीतिक समूह शामिल हैं, जिनके आपसी हित कई मुद्दों पर एक-दूसरे से टकराते हैं। इसके अलावा, देश के रक्षा मामलों, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों की मिलिट्री सर्विस से छूट जैसे संवेदनशील विषयों पर दलों के बीच गंभीर मतभेद हैं। यदि आइजनकोट इन सभी अंतर्विरोधों को सुलझाने में असफल रहते हैं, तो उनके नेतृत्व में गठबंधन सरकार का सपना बीच में ही दम तोड़ सकता है।
यदि आइजनकोट सरकार बनाने में फेल हुए तो अगला संवैधानिक कदम क्या होगा?
इजराइल के संविधान और चुनावी कानूनों के अनुसार, यदि गादी आइजनकोट निर्धारित समय सीमा के भीतर गठबंधन सरकार बनाने में पूरी तरह विफल रहते हैं, तो राजनीतिक प्रक्रिया का अगला चरण शुरू होता है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति के पास यह अधिकार होता है कि वे जनादेश या तो संसद के किसी अन्य वरिष्ठ नेता को सौंपें या फिर प्रक्रिया को वापस संसद के पाले में डाल दें। इस परिदृश्य में बेंजामिन नेतन्याहू को एक बार फिर से सरकार बनाने का मौका मिलने की प्रबल संभावना बन जाती है। नेतन्याहू के पास दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों का एक मजबूत पारंपरिक आधार है, जो संकट के समय उनके साथ एकजुट रहता है। यदि विपक्षी खेमा आंतरिक कलह के कारण बिखर जाता है, तो नेतन्याहू इस राजनीतिक शून्यता का पूरा फायदा उठाकर सत्ता की रेस में दोबारा सबसे आगे निकल सकते हैं।
क्या बेंजामिन नेतन्याहू की हो सकती है जोरदार वापसी?
बेंजामिन नेतन्याहू इजराइल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं, और उनकी राजनीतिक कूटनीति के कायल उनके धुर विरोधी भी हैं। भले ही हालिया चुनाव में उनके दक्षिणपंथी गठबंधन ने अपना बहुमत खो दिया हो, लेकिन नेतन्याहू को राजनीति से पूरी तरह बाहर मानना एक बड़ी भूल होगी। यदि आइजनकोट की सरकार बनाने की कोशिशें विफल होती हैं और संसद के भीतर कोई अन्य विकल्प नहीं बचता है, तो नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में अपने पद पर बने रहने के साथ-साथ एक नई राजनीतिक लकीर खींच सकते हैं। वे अपनी पुरानी पार्टियों और दक्षिणपंथी सहयोगियों को एकजुट कर फिर से सत्ता हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इजराइल के राजनीतिक इतिहास गवाह हैं कि नेतन्याहू ने कई बार मुश्किलों से घिरने के बाद भी शानदार वापसी की है।
राजनीतिक अस्थिरता और नए चुनावों की मंडराती अनिश्चितता
अगर गादी आइजनकोट भी सरकार बनाने में नाकामयाब रहते हैं और इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू या अन्य कोई भी नेता संसद में बहुमत जुटाने में असफल साबित होता है, तो इजराइल के पास देश को एक बार फिर नए चुनावों की आग में झोंकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। बार-बार होने वाले चुनाव देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और अंतरराष्ट्रीय छवि पर भारी असर डालते हैं। जनता भी अब इस लगातार जारी राजनीतिक अनिश्चितता से थक चुकी है। हालांकि, देश के राजनीतिक दल और नेता इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि नए चुनाव किसी भी समस्या का स्थाई समाधान नहीं हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए देश एक बार फिर से मध्यावधि चुनाव की तरफ बढ़ सकता है, जिससे राजनीतिक भविष्य पूरी तरह अनिश्चित हो गया है।