आसमान में कौन खड़े करता है रोशनी के खंभे? न जादू, न चमत्कार, विज्ञान का है कमाल
अक्सर जब हम रात या कड़ाके की ठंड की सुबह में खुले आसमान की ओर निहारते हैं, तो कभी-कभी कुदरत का ऐसा अद्भुत और अलौकिक नजारा देखने को मिलता है जो इंसान को आश्चर्यचकित कर देता है। अंधेरे में जमीन से सीधे नीले, सुनहरे और बैंगनी रंग की चमकदार किरणों के सीधे खंभे आसमान की ओर उठते हुए दिखाई देते हैं। पहली नजर में ऐसा आभास होता है मानो किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का कोई दृश्य जीवंत हो उठा हो या फिर ईश्वर का कोई अनूठा चमत्कार घटित हो रहा हो। स्थानीय लोककथाओं और पुरानी मान्यताओं में इसे एलियंस की गतिविधि या फिर किसी अलौकिक शक्ति का इशारा तक मान लिया जाता है। लेकिन असलियत में इसके पीछे न तो कोई जादू छिपा है और न ही किसी रहस्यमयी दुनिया का कोई हाथ है। यह पूरी तरह से हमारे वायुमंडल में घटने वाली एक अत्यंत दुर्लभ और जटिल वैज्ञानिक परिघटना का नतीजा है, जिसे विज्ञान की भाषा में 'लाइट पिलर्स' (Light Pillars) यानी प्रकाश के स्तंभ कहा जाता है।
आखिर क्या हैं ये 'लाइट पिलर्स' और क्यों बनते हैं आसमान में रोशनी के खंभे
मौसम विज्ञान और भौतिकी के दृष्टिकोण से प्रकाश के स्तंभ या लाइट पिलर्स एक बहुत ही खास तरह का वायुमंडलीय ऑप्टिकल भ्रम (Optical Illusion) हैं। जब जमीन पर मौजूद विभिन्न स्रोतों, जैसे कि सड़कों की स्ट्रीट लाइट्स, गाड़ियों की हेडलाइट्स, गगनचुंबी इमारतों की रोशनी या फिर कुदरती सूर्य और चंद्रमा की किरणें ऊपर की ओर निकलती हैं, तो वे एक विशेष परिस्थिति में आसमान में ऊपर जाने के बजाय सीधे लंबवत (Vertical) स्तंभ के रूप में परावर्तित होने लगती हैं। यह परिघटना अमूमन अत्यधिक ठंडे इलाकों में या सर्दियों की उन रातों में देखने को मिलती है जब तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। जब तापमान इतना गिर जाता है कि हवा में नमी बर्फ की बारीक बूंदों या कणों में जम जाती है, तब वातावरण में लाखों-करोड़ों की संख्या में हेक्सागोनल यानी षट्कोणीय आकार के क्रिस्टल तैरने लगते हैं। ये बर्फ के बारीक क्रिस्टल वायुमंडल में किसी शीशे (Mirror) की तरह काम करते हैं और जब जमीन की रोशनी इनसे टकराती है, तो वह एक सीधी रेखा में परावर्तित होकर आसमान में रोशनी के खंभों जैसा नजारा पेश करती है।
बर्फ के क्रिस्टल और भौतिकी का अद्भुत खेल जो रचता है यह नजारा
इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए हमें हवा की संरचना और प्रकाश के परावर्तन (Reflection) के नियमों को जानना होगा। सामान्य परिस्थितियों में हवा में मौजूद नमी वाष्प के रूप में होती है, लेकिन जब तापमान हिमांक बिंदु से काफी नीचे गिर जाता है, तो हवा में बर्फ के क्रिस्टल बनने लगते हैं जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में 'आइस फॉग' (Ice Fog) या 'डायमंड डस्ट' (Diamond Dust) कहा जाता है। ये क्रिस्टल बेहद हल्के होने के कारण हवा में तैरते रहते हैं और जब ये सतह के समानांतर तैरते हैं, तो इनकी समतल सतह जमीन से आने वाले प्रकाश के लिए एक विशालकाय आईने का काम करने लगती है। जब धरातल से उठने वाली रोशनी इन तैरते हुए बर्फ के कणों से टकराती है, तो प्रकाश की किरणें ऊपर की ओर एक सीधी कतार में परावर्तित हो जाती हैं। हमारी आंखें इस सीधी रेखा में लौट रहे प्रकाश को एक लंबे चमकते हुए खंभे के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि यह रोशनी वास्तव में अंतरिक्ष तक नहीं जाती, बल्कि केवल एक ऑप्टिकल इल्यूजन यानी दृष्टि का भ्रम मात्र होती है जो दर्शक को जमीन से आसमान की तरफ खड़ी दिखती है।
कब और कहां देखने को मिलता है यह अलौकिक कुदरती नजारा
प्रकाश के ये जादुई खंभे हर जगह और हर मौसम में दिखाई नहीं देते। इसके लिए विशिष्ट भौगोलिक और वायुमंडलीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। मुख्य रूप से यह नजारा ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Regions) जैसे अलास्का, कनाडा, रूस के साइबेरिया, नॉर्वे, फिनलैंड और स्वीडन जैसे अत्यधिक ठंडे देशों में बहुतायत से देखने को मिलता है। हालांकि, कड़ाके की ठंड के दिनों में जब उत्तरी भारत, चीन या अमेरिका के ऊपरी मैदानी इलाकों में तापमान काफी गिर जाता है और हवा शांत रहती है, तब वहां भी इस तरह के लाइट पिलर्स देखने को मिल जाते हैं। इसके बनने के लिए सबसे आदर्श स्थिति वह होती है जब हवा में बिल्कुल भी तेजी या बवंडर न हो, क्योंकि तेज हवाओं के चलने से बर्फ के ये नाजुक हेक्सागोनल क्रिस्टल अपनी दिशा खो देते हैं और फिर रोशनी का इस तरह से सीधा परावर्तन संभव नहीं हो पाता। जब रात का सन्नाटा हो, हवा शांत हो और जमीन पर रंग-बिरंगी लाइटें जल रही हों, तब यह नजारा किसी का भी दिल मोह लेने के लिए काफी होता है।
अंधविश्वास बनाम वैज्ञानिक चेतना: इंसान को समझने होंगे कुदरत के नियम
इतिहास के अलग-अलग दौर में इंसानों ने अपनी समझ के हिसाब से प्राकृतिक घटनाओं को ढालने की कोशिश की है। जब तक विज्ञान का इतना विकास नहीं हुआ था, तब तक लोग इस प्रकार के प्रकाश स्तंभों को देखकर डर जाते थे या फिर इन्हें किसी बड़ी विपत्ति या देवी-देवताओं के आगमन का संकेत मानते थे। कई संस्कृतियों में इन्हें मोक्ष का द्वार या परियों की दुनिया से आने वाला प्रकाश भी कहा गया। लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक शोधों और उपग्रह प्रौद्योगिकी ने यह साबित कर दिया है कि प्रकृति का हर एक अद्भुत खेल विज्ञान के ठोस नियमों पर आधारित है। लाइट पिलर्स का बनना भी वातावरण के तापमान, आद्रता, बर्फ के कणों के आकार और प्रकाशिकी (Optics) के सुंदर तालमेल का नतीजा है। आज जब लोग इस तरह के नजारों को देखते हैं, तो वे डरने के बजाय अपने कैमरों में इसे कैद करते हैं और प्रकृति की इस अनूठी इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक प्रक्रिया की खुलकर तारीफ करते हैं।