कच्चातीवू द्वीप पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से क्यों गदगद हुआ श्रीलंका

कच्चातीवू द्वीप पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से क्यों गदगद हुआ श्रीलंका

भारत और श्रीलंका के बीच दशकों से संवेदनशील बने रहे ऐतिहासिक कच्चातीवू द्वीप (Katchatheevu Island) विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट से एक ऐसा महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पड़ोसी देश श्रीलंका में खुशी की लहर दौड़ा दी है। सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार को यह सख्त निर्देश दिया है कि वे भारतीय मछुआरों को लगातार समझाइश दें कि वे अपनी सीमा लांघकर श्रीलंकाई जलक्षेत्र में प्रवेश न करें। अदालत की इस टिप्पणी और निर्देश के बाद जहाँ एक तरफ श्रीलंका सरकार और वहां के समुद्री सुरक्षा बलों ने राहत की सांस ली है, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक रूप से इस द्वीप की वापसी की मांग कर रहे भारतीय मछुआरों और स्थानीय राजनीतिक दलों के लिए इसे एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है कच्चातीवू द्वीप का पूरा विवाद और क्यों दोनों देशों के बीच यह हमेशा रहता है चर्चा का केंद्र?

भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में स्थित कच्चातीवू एक छोटा सा निर्जन द्वीप है, जिसका सामरिक और मछली पकड़ने के लिहाज से बहुत बड़ा महत्व है। वर्ष 1974 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक समझौते के तहत इस द्वीप को औपचारिक रूप से श्रीलंका को सौंप दिया था, जिसके बाद से ही दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु की राजनीति में यह एक ज्वलंत मुद्दा बन गया है। तमिलनाडु के मछुआरे पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में मछली पकड़ते रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (IMBL) तय होने के बाद जब भारतीय मछुआरे उस सीमा को पार करके कच्चातीवू के आसपास पहुंचते हैं, तो श्रीलंकाई नौसेना द्वारा उन्हें आए दिन गिरफ्तार कर लिया जाता है और उनकी नौकाएं जब्त कर ली जाती हैं। इसी ऐतिहासिक समझौते और लगातार हो रही गिरफ्तारियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर इन दिनों देश की शीर्ष अदालत में सुनवाई चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी: 'मछुआरे सीमा पार न करें, केंद्र और राज्य सरकारें चलाएं जागरूकता अभियान'

ताजा सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय मछुआरों द्वारा बार-बार अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके श्रीलंकाई क्षेत्र में प्रवेश करना और वहां अवैध तरीके से मछली पकड़ना गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने केंद्र सरकार और तमिलनाडु प्रशासन को दो टूक निर्देश दिया कि वे मछुआरों को इस बात के लिए जागरूक और संवेदनशील बनाएं कि वे अपनी तय सीमा के भीतर ही रहें। अदालत ने मौखिक रूप से यह भी रेखांकित किया कि समुद्र में प्रदूषण और अनधिकृत घुसपैठ दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई फरवरी 2027 तक के लिए टाल दी है और फिलहाल 1974 व 1976 के समझौतों की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम आदेश या रोक नहीं लगाई है।

श्रीलंका सरकार ने किया सुप्रीम कोर्ट के रुख का स्वागत, कहा- इससे समुद्री संसाधनों की होगी रक्षा

भारतीय सर्वोच्च अदालत के इस रुख के सामने आते ही कोलंबो स्थित श्रीलंका सरकार और वहां के मत्स्य पालन मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से इसका स्वागत किया है। श्रीलंकाई मंत्रियों और अधिकारियों का कहना है कि भारतीय अदालत की यह टिप्पणी उनके उस रुख को मजबूत करती है जिसके तहत श्रीलंका लंबे समय से यह कहता आ रहा है कि विदेशी जहाजों और विशेषकर बॉटम ट्रॉवलिंग (Bottom Trawling) जैसी तकनीकों से उनकी समुद्री जैव-विविधता और स्थानीय मछुआरों की आजीविका को भारी नुकसान पहुंच रहा है। श्रीलंका का मानना है कि यदि भारतीय पक्ष अपने मछुआरों को सीमा पार करने से रोकता है, तो इससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध और अधिक मजबूत होंगे तथा अनावश्यक तनाव पर लगाम लगेगी।