Prabhat Vaibhav,Digital Desk : इस बार की ठंड केवल मौसम का हिस्सा नहीं है, बल्कि कृषि पर सीधे असर डालने वाला कारक बनकर सामने आई है। वैश्विक स्तर पर सक्रिय ला-नीना के प्रभाव से प्रशांत महासागर का ठंडा पानी मौसम के चक्र को नियंत्रित कर रहा है। इसका असर भागलपुर और पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
ठंडी हवाओं का लगातार असर
पश्चिमी विक्षोभ की लगातार सक्रियता के कारण ठंडी और हिमप्रभावित हवाएं मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार ठंड का सिलसिला टूटने की बजाय और लंबा खिंच सकता है। जनवरी भर गंभीर ठंड बनी रहने और फरवरी तक सर्दी से राहत न मिलने की संभावना जताई जा रही है।
मौसम का बदला मिजाज
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि कर रहे हैं। पहले ठंड और गर्मी के बीच लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिलता था, लेकिन इस बार लगातार कोल्ड डे की स्थिति बनी हुई है। आमतौर पर 15 जनवरी के बाद ठंड कमजोर पड़ने लगती थी, लेकिन मौजूदा कारकों के अध्ययन से संकेत मिल रहे हैं कि इस बार ठंड ज्यादा समय तक बनी रह सकती है।
कृषि पर असर – गेहूं मुस्कुराया, सब्जियां मुरझाई
कृषि की दृष्टि से यह मौसम दोहरी तस्वीर पेश कर रहा है। सब्जी उत्पादक किसानों के लिए ठंड चिंता का कारण बन रही है। पाला और नमी के कारण पत्तेदार सब्जियां मुरझा रही हैं, वहीं आलू और टमाटर में झुलसा रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है।
सरसों की फसल भी सुरक्षित नहीं है। फूल आने के समय लाही कीट सक्रिय होने से सरसों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। वहीं, गेहूं की फसल इस ठंड से अपेक्षाकृत लाभान्वित दिख रही है।
इस तरह, यह मौसम किसानों के लिए सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के संकेत लेकर आया है।
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