Prabhat Vaibhav,Digital Desk : ज्योतिर्मठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती इन दिनों माघ मेले और गौ संरक्षण जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा में हैं। ऐसे में आम लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि सनातन धर्म में सर्वोच्च माने जाने वाले 'शंकराचार्य' पद को आखिर कैसे प्राप्त किया जा सकता है? क्या कोई आम व्यक्ति इस पद को ग्रहण कर सकता है? दरअसल, यह प्रक्रिया कोई चुनाव नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और ज्ञान की एक अत्यंत कठिन परीक्षा है। शंकराचार्य देश के चार प्रमुख मठों के प्रमुख होते हैं और संत समुदाय में उनका स्थान सर्वोपरि है।
शंकराचार्य बनने के लिए आवश्यक योग्यताएँ
शंकराचार्य बनने के लिए केवल इच्छा रखना ही पर्याप्त नहीं है; इसके लिए शास्त्रों में वर्णित योग्यताओं का होना अत्यंत आवश्यक है।
संन्यासी जीवन: उम्मीदवार ब्राह्मण होना चाहिए और जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया होना चाहिए। उसे गृहस्थ जीवन का पूर्ण त्याग कर, मोहभंग से मुक्त होकर, अपने पिंडदान द्वारा दंड संन्यास ग्रहण किया होना चाहिए।
वेदों का ज्ञान: उम्मीदवार को चारों वेदों, वेदांत, पुराणों, उपनिषदों और महाकाव्यों का गहन ज्ञान होना चाहिए। उसे संस्कृत भाषा पर असाधारण पकड़ होनी चाहिए।
जितेंद्रिय: सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि व्यक्ति 'जितेंद्रिय' हो, यानी उसने अपनी सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो।
यह निर्णय कौन लेता है?
इस पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति का चयन मनमाने ढंग से नहीं किया जाता है। शंकराचार्य की नियुक्ति के लिए काशी विद्वत परिषद, वर्तमान शंकराचार्यों, आचार्य महामंडलेश्वरों और प्रसिद्ध संतों की बैठक आयोजित की जाती है। इस बैठक में उम्मीदवार के ज्ञान और चरित्र की जांच के बाद ही स्वीकृति दी जाती है।
परंपरा का इतिहास और 4 मठ
इस परंपरा की शुरुआत हिंदू धर्म के पुनरुत्थानकर्ता आदि शंकराचार्य ने की थी। उन्होंने सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और संरक्षण के लिए भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की।
पूर्व: गोवर्धन मठ, पुरी (ओडिशा)
पश्चिम: शारदा मठ, द्वारका (गुजरात)
उत्तर: ज्योतिर्मठ, बद्रीनाथ (उत्तराखंड)
दक्षिण: श्रृंगेरी मठ, रामेश्वरम (कर्नाटक)
ये मठ ऐसे संस्थान हैं जहाँ धर्म, आध्यात्मिकता और वेदों की शिक्षा दी जाती है। इसलिए, शंकराचार्य बनना शक्ति का मामला नहीं है, बल्कि धर्म के प्रति पूर्ण समर्पण और संरक्षण का सबसे बड़ा दायित्व है।



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