Prabhat Vaibhav,Digital Desk : भारतीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी और कड़े कानूनों के बीच की रस्साकशी अब देश की दहलीज से निकलकर अदालत के गलियारों में पहुंच गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय में 'गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' यानी UAPA की संवैधानिकता को लेकर एक ऐसी याचिका पर सुनवाई शुरू हुई है, जिसके नतीजे देश में पत्रकारिता और असहमति की आवाज का भविष्य तय कर सकते हैं। गुरुवार को हुई इस हाई-प्रोफाइल सुनवाई में सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि क्या सत्ता की नीतियों से इत्तेफाक न रखना 'राजद्रोह' की श्रेणी में आता है?
मीडिया फाउंडेशन की याचिका: लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सर्वोपरि
मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के सामने 'मीडिया फाउंडेशन' द्वारा दायर इस याचिका पर तीखी बहस हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने पुरजोर तरीके से तर्क दिया कि सरकार की आलोचना करना किसी भी जागरूक नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत में कहा गया कि जब तक कोई व्यक्ति हिंसा नहीं भड़काता या हथियारों का सहारा नहीं लेता, तब तक उसकी बातों या लेखों को राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को बोलने की आजादी देता है, लेकिन UAPA की कुछ धाराएं इस पर 'अघोषित पहरा' बैठा रही हैं।
कानून की 'अस्पष्ट परिभाषा' और पत्रकारों में खौफ का माहौल
सुनवाई के दौरान अदालत का ध्यान इस बात पर खींचा गया कि UAPA में 'असहमति' और 'राष्ट्रविरोधी गतिविधि' जैसी शब्दावलियों की परिभाषा बेहद धुंधली है। वकीलों ने तर्क दिया कि इसी अस्पष्टता का फायदा उठाकर प्रशासन अक्सर कानून का दुरुपयोग करता है। विशेष रूप से पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच इस बात का डर बैठ गया है कि उनकी एक रिपोर्ट या सोशल मीडिया पोस्ट उन्हें सालों तक जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा सकती है। अदालत को बताया गया कि कई मामलों में केवल नीतियों का विरोध करने भर से लोगों को लंबी हिरासत झेलनी पड़ी है, जो कि लोकतंत्र की सेहत के लिए चिंताजनक है।
UAPA की वे धाराएं जिन पर मचा है असली घमासान
याचिका में मुख्य रूप से धारा 2(1)(ओ)(iii) को निशाना बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह प्रावधान इतना लचीला है कि प्रशासन जिसे चाहे उसे अपनी सुविधानुसार 'देशद्रोही' करार दे सकता है। इस कानून की तीन सबसे विवादास्पद बातें जो अदालत के सामने रखी गईं:
जमानत के कड़े नियम: इस एक्ट के तहत अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है और नियमित जमानत मिलना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
आतंकवादी का ठप्पा: सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति को सुनवाई से पहले ही 'आतंकवादी' घोषित कर उसकी संपत्ति जब्त कर ले।
लंबी हिरासत: कड़े प्रावधानों के चलते आरोपी को सालों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रहना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई, 17 मार्च पर टिकी नजरें
बता दें कि इस संवेदनशील मुद्दे की गूंज सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में सुनाई दी थी। मामले की गहराई और कानूनी पेचीदगियों को देखते हुए सर्वोच्च अदालत ने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर दिया था। अब पूरे देश की नजरें 17 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस केस का फैसला भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और आम आदमी के बोलने के अधिकार की नई दिशा तय करेगा। क्या अदालत सरकार को इन धाराओं में संशोधन का निर्देश देगी? यह आने वाला वक्त ही बताएगा।




