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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों और समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मचे कोहराम के बीच भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने गुरुवार की देर रात एक बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोर्चा संभाला। जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री के साथ फोन पर लंबी बातचीत की, जिसे वैश्विक राजनीति के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। यह बातचीत उस समय हुई है जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील समुद्री मार्ग को आंशिक रूप से बाधित कर दिया है। भारत के लिए यह चिंता का विषय है क्योंकि इसी मार्ग से भारत की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है।

होर्मुज की घेराबंदी और भारत की चिंता: आखिर फोन पर क्या हुई बात?

ईरानी विदेश मंत्री के साथ हुई इस चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु होर्मुज जलडमरूमध्य में उपजा तनाव रहा। डॉ. जयशंकर ने भारत की चिंताओं को प्रमुखता से रखते हुए समुद्री सुरक्षा और जहाजों की निर्बाध आवाजाही पर जोर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मार्ग पूरी तरह ठप होता है, तो भारत समेत पूरी दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में आग लग सकती है। भारतीय विदेश मंत्री ने बातचीत के दौरान क्षेत्र में शांति बहाली और तनाव को कम करने की अपील की। भारत ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती साबित होगा।

रणनीतिक समुद्री मार्ग पर ईरान की सख्ती से बढ़ी मुश्किलें

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का वह संकरा समुद्री रास्ता है जहां से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। ईरान द्वारा यहां की गई आंशिक घेराबंदी ने न केवल व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा पैदा कर दिया है, बल्कि बीमा और शिपिंग लागत में भी भारी इजाफा कर दिया है। जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री के बीच इस मुद्दे पर गहन मंथन हुआ कि कैसे आपसी बातचीत के जरिए इस गतिरोध को सुलझाया जा सकता है। भारत, जिसके ईरान के साथ ऐतिहासिक और मधुर संबंध रहे हैं, इस समय मध्यस्थ की भूमिका में नजर आ रहा है ताकि क्षेत्र में युद्ध की स्थिति को टाला जा सके।

कूटनीति के जरिए समाधान की तलाश में भारत

डॉ. एस जयशंकर की यह 'मिडनाइट डिप्लोमेसी' दिखाती है कि भारत वैश्विक संकटों में मूकदर्शक बनने के बजाय सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है। बातचीत के दौरान केवल समुद्री सुरक्षा ही नहीं, बल्कि क्षेत्र में फंसे भारतीय नागरिकों और व्यापारिक हितों की सुरक्षा पर भी चर्चा की गई। हालांकि, ईरान की ओर से इस मामले में क्या आश्वासन मिला है, इसका विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत ने अपनी स्थिति मजबूती से रख दी है। आने वाले कुछ दिन इस जलमार्ग और भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद निर्णायक होने वाले हैं।