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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : क्या सरकारी अधिकारियों का काम जनता की सेवा करना है या सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' और 'फॉलोअर्स' बटोरना? राज्यसभा में यह सवाल गूंज उठा जब सांसद राजिंदर गुप्ता ने अफसरों द्वारा निजी सोशल मीडिया हैंडल के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई। सदन में मांग की गई कि केंद्र सरकार जल्द से जल्द एक ऐसी स्पष्ट नीति (Social Media Policy) लाए, जो सरकारी गोपनीयता और निजी प्रचार के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींच सके।

छापेमारी पर रील और बैकग्राउंड म्यूजिक: प्रोटोकॉल की उड़ रही धज्जियां

सांसद राजिंदर गुप्ता ने सदन का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वर्तमान में आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और यहां तक कि न्यायपालिका से जुड़े कुछ अधिकारी भी अपने आधिकारिक कार्यों को 'इवेंट' की तरह पेश कर रहे हैं।

प्रचार का जरिया: सरकारी कार्रवाई, निरीक्षण या छापेमारी के वीडियो निजी खातों पर विशेष प्रभाव (Special Effects) और फिल्मी संगीत के साथ साझा किए जा रहे हैं।

संवेदनशीलता का अभाव: कई बार गुप्त ऑपरेशन्स की जानकारी आधिकारिक माध्यमों से पहले ही अधिकारियों के निजी हैंडल पर 'लीक' हो जाती है, जो सुरक्षा और प्रशासनिक प्रोटोकॉल के लिहाज से खतरनाक है।

60 के दशक के नियम, 2026 का डिजिटल युग: बदलाव की मांग

सदन में यह तर्क दिया गया कि प्रशासनिक अधिकारियों पर लागू होने वाले मौजूदा नियम अब पुराने पड़ चुके हैं।

अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम 1968 और केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियम 1964 उस दौर के हैं जब इंटरनेट का नामोनिशान नहीं था।

डिजिटल युग की चुनौतियों को देखते हुए इन नियमों को 'अपडेट' करना अनिवार्य हो गया है ताकि संस्थागत मर्यादा बनी रहे।

न्यायिक प्रक्रिया और गोपनीयता पर बढ़ता खतरा

सांसद ने विशेष रूप से उन मामलों का उल्लेख किया जो अदालत में विचाराधीन (Sub-judice) हैं। जब अधिकारी ऐसे संवेदनशील मामलों से जुड़ी जानकारी निजी लाभ या छवि चमकाने के लिए सोशल मीडिया पर डालते हैं, तो इससे पूरी न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होने का डर रहता है। राजिंदर गुप्ता ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि:

आधिकारिक संचार और निजी पोस्ट के बीच स्पष्ट सीमा तय की जाए।

जवाबदेही तय हो: सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग डिजिटल मंचों पर क्या और कितना साझा कर सकते हैं, इसके कड़े दिशा-निर्देश हों।

गोपनीयता की सुरक्षा: संवेदनशील सूचनाओं के सार्वजनिक होने पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान हो।

पारदर्शिता बनाम व्यक्तिगत प्रचार

चर्चा का सार यह रहा कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता जरूरी है और जनता से संवाद होना चाहिए, लेकिन इसका माध्यम 'सरकारी चैनल' होने चाहिए न कि किसी अधिकारी का 'प्राइवेट हैंडल'। स्पष्ट नीति बनने से प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही आएगी और अफसरों का ध्यान 'रील' बनाने के बजाय 'रियल' ड्यूटी पर केंद्रित होगा।