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Prabhat Vaibhav,Digital Desk : पंजाब की शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और जवाबदेह बनाने की दिशा में मान सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है। शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने गुरुवार को ‘मिशन समर्थ-4’ को आधिकारिक तौर पर लॉन्च कर दिया। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य सरकारी स्कूलों में छात्रों की अनियमित उपस्थिति को रोकना और 'ड्रॉपआउट' दर (बीच में पढ़ाई छोड़ना) को शून्य पर लाना है। अब स्कूल से बिना बताए गायब रहने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों पर विभाग की सीधी नजर रहेगी।

डिजिटल अटेंडेंस: रियल टाइम डेटा से होगी निगरानी

मिशन समर्थ-4 के तहत अब सरकारी स्कूलों में पुरानी कागजी हाजिरी के बजाय डिजिटल अटेंडेंस सिस्टम को अनिवार्य कर दिया गया है।

ऑनलाइन ट्रैकिंग: हर छात्र की रोजाना उपस्थिति का रिकॉर्ड सीधे शिक्षा विभाग के पोर्टल पर दर्ज होगा।

तुरंत एक्शन: अगर कोई बच्चा स्कूल नहीं पहुंचता है, तो उसका डेटा 'रियल टाइम' में अधिकारियों के पास उपलब्ध होगा, जिससे देरी से होने वाली कार्रवाई की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।

3-5-7 का कड़ा नियम: अनुपस्थिति पर ऐसे होगी कार्रवाई

सरकार ने अनुपस्थित रहने वाले छात्रों के लिए एक सख्त प्रोटोकॉल तैयार किया है:

लगातार 3 दिन: यदि छात्र 3 दिन तक गायब रहता है, तो क्लास टीचर तुरंत अभिभावकों से फोन पर संपर्क करेंगे।

5 दिन की अनुपस्थिति: अगर सुधार नहीं होता, तो मामला जिला स्तर (DEO कार्यालय) तक पहुंचेगा और स्कूल प्रबंधन समिति (SMC) बच्चे के घर का दौरा करेगी।

उच्च स्तरीय मॉनिटरिंग: इसके बाद भी छात्र स्कूल नहीं लौटता, तो मुख्यालय स्तर पर इसकी निगरानी की जाएगी ताकि शिक्षा से कोई भी बच्चा वंचित न रहे।

"सिर्फ इमारतें नहीं, अब पढ़ाई पर फोकस": हरजोत बैंस

शिक्षा मंत्री ने मिशन लॉन्च करते हुए स्पष्ट किया कि सरकार ने अब तक बुनियादी ढांचे और सुविधाओं पर ध्यान दिया है, लेकिन अब फोकस निरंतरता (Consistency) पर है।

"हमे पता चला है कि कई बच्चे अलग-अलग कारणों से लंबे समय तक स्कूल से दूर रहते हैं और बाद में पढ़ाई छोड़ देते हैं। 'मिशन समर्थ-4' से हम ऐसे बच्चों की पहचान कर उन्हें वापस स्कूल की मुख्यधारा से जोड़ेंगे।" - हरजोत सिंह बैंस

अभिभावकों की बढ़ेगी जवाबदेही

इस सिस्टम के लागू होने से न केवल शिक्षकों बल्कि अभिभावकों की भी जिम्मेदारी तय होगी। उन्हें अब समय पर पता चलेगा कि उनका बच्चा स्कूल पहुंच रहा है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणामों में भी सुधार होगा, क्योंकि नियमित उपस्थिति से ही बच्चों की नींव मजबूत होगी।