img

Prabhat Vaibhav,Digital Desk : बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं, लेकिन इस बार के आंकड़े राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं। विधानसभा में विधायकों की कम संख्या और एनडीए (NDA) की मजबूत किलेबंदी के कारण राजद के लिए अपनी दोनों राज्यसभा सीटों को बचा पाना लगभग नामुमकिन लग रहा है। अप्रैल में खाली हो रही पांच सीटों के लिए 16 मार्च 2026 को मतदान होना है, जिसमें एनडीए सभी पांचों सीटों पर जीत का परचम लहराने की तैयारी में है।

इन 5 दिग्गजों का कार्यकाल हो रहा है समाप्त

बिहार से राज्यसभा की जिन पांच सीटों पर चुनाव होना है, उनमें राजद के दो बड़े नाम शामिल हैं:

राजद: अमरेंद्र धारी सिंह (एडी सिंह) और प्रेमचंद गुप्ता।

जदयू: हरिवंश नारायण सिंह (उपसभापति) और रामनाथ ठाकुर।

रालोमो: उपेंद्र कुशवाहा।

इन पांचों सीटों के खाली होने के बाद राजद के पास दोबारा अपनी जगह बनाने के लिए पर्याप्त विधायक नहीं हैं।

आंकड़ों का खेल: राजद के पास सिर्फ 25, चाहिए 41

राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए बिहार विधानसभा में कम से कम 41 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट की आवश्यकता है। वर्तमान में महागठबंधन की स्थिति कुछ इस प्रकार है:

राजद: 25 विधायक (तेजस्वी यादव समेत)।

कांग्रेस: 06 विधायक।

वामदल: 03 विधायक।

आईआईपी: 01 विधायक।

कुल संख्या: 35

महाबंधन को एक सीट के लिए भी 6 अतिरिक्त वोटों की दरकार है, जिसे जुटाना तेजस्वी यादव के लिए 'टेढ़ी खीर' साबित हो रहा है।

AIMIM और बसपा से समर्थन की उम्मीद कम क्यों?

एनडीए और महागठबंधन से इतर विधानसभा में 6 विधायक (5 एआईएमआईएम और 1 बसपा) हैं, लेकिन इनसे मदद मिलना मुश्किल है:

AIMIM का कड़वा अनुभव: पिछली बार राजद ने ओवैसी की पार्टी के 4 विधायकों को तोड़ लिया था। इसके अलावा, महागठबंधन ने उन्हें अपने गठबंधन का हिस्सा भी नहीं बनाया। ऐसे में बिना शर्त समर्थन की उम्मीद धुंधली है।

बसपा का रुख: रामगढ़ सीट पर बसपा ने राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे को हराया है। हितों के टकराव और पूर्व के रिकॉर्ड को देखते हुए बसपा का वोट सत्ताधारी गठबंधन की ओर जाने की संभावना अधिक है।

एनडीए के लिए 'क्लीन स्वीप' का मौका

एनडीए की तगड़ी उपस्थिति को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि सभी 5 सीटों पर सत्ताधारी गठबंधन की जीत तय है। हालांकि, एनडीए के भीतर भी भाजपा, जदयू और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के बीच सीटों के तालमेल और घटक दलों की अपेक्षाओं को संतुलित करना एक बड़ी चुनौती होगी। राजद के लिए यह चुनाव राज्यसभा में अपनी ताकत कम होने का संकेत दे रहा है।