आर्थिक संकट के बीच तारिक रहमान ने ट्रेन के जरिए भारत से मंगवाया 2 लाख टन गेहूं
दक्षिण एशिया की राजनीति और आर्थिक गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी, चौंकाने वाली और भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण खबर सामने आ रही है। बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक बदलाव और सत्ता के नए समीकरणों के बीच वहां की जमीनी हकीकत का अहसास अब नई हुकूमत को बहुत जल्द होने लगा है। कभी भारत विरोधी बयानों और अपनी अकड़ के लिए सुर्खियां बटोरने वाले बांग्लादेश के नए राजनीतिक नेतृत्व, विशेषकर तारिक रहमान (Tarique Rahman) और वहां की व्यवस्था को आखिरकार आटे-दाल का भाव अच्छी तरह मालूम पड़ गया है। बढ़ती महंगाई, गंभीर खाद्य संकट और घरेलू बाजारों में गेहूं के आसमान छूते दामों से घबराहट में आई बांग्लादेश सरकार ने अपनी जिद को छोड़कर आखिरकार भारत के सामने हाथ फैला ही दिए हैं। प्राप्त रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश ने रेलवे के माध्यम से भारत से सीधे 2 लाख टन भारी मात्रा में गेहूं का आयात (Wheat Import) करने का बड़ा फैसला लिया है और ट्रेन के जरिए इस अनाज की आपूर्ति शुरू भी हो चुकी है। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि भारत जैसे विशाल और पड़ोसी देश की मदद के बिना दक्षिण एशिया के किसी भी राष्ट्र का चल पाना असंभव है। जब घरेलू स्तर पर खाद्यान्न की भयंकर किल्लत होने लगी और जनता का आक्रोश बढ़ने लगा, तब जाकर बांग्लादेशी हुक्मरानों को यह समझ आया कि कूटनीतिक बयानबाजी से पेट नहीं भरा जा सकता। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है, क्यों बांग्लादेश को अचानक भारत के सामने झुकना पड़ा और इस ट्रेन के जरिए होने वाले आयात से दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर क्या असर पड़ने वाला है।
बांग्लादेश में पिछले कुछ महीनों में जो राजनीतिक उथल-पुथल मची है, उसने वहां की अर्थव्यवस्था और कृषि आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। नई सरकार के गठन के बाद से ही व्यापारिक और कूटनीतिक दूरियां बढ़ाने की कोशिशें की जा रही थीं, लेकिन अर्थशास्त्र की भाषा राजनीति से बिल्कुल अलग होती है। देश के भीतर गेहूं और आटे की कीमतों में लगी आग ने आम जनता की कमर तोड़ दी थी। बेकरी उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और खुदरा बाजार खाद्यान्न की भारी कमी से जूझ रहे थे। ऐसे में दुनिया के अन्य देशों से महंगे दामों पर अनाज मंगवाना बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) के लिए एक बड़ा संकट बन चुका था। इन तमाम मजबूरियों को देखते हुए जब विकल्पों के दरवाजे बंद होने लगे, तब सबसे करीबी, भरोसेमंद और सबसे सस्ते लॉजिस्टिक रूट यानी भारत से मदद लेने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। आइए जानते हैं कि ट्रेन के माध्यम से हो रही इस खाद्यान्न आपूर्ति की क्या विशेषताएं हैं और इसके क्या भू-राजनीतिक मायने हैं।
ट्रेन के जरिए क्यों मंगवाया गया 2 लाख टन भारतीय गेहूं और क्या हैं इसके कारण?
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जब किसी देश को तुरंत और बड़े पैमाने पर खाद्यान्न की जरूरत होती है, तो समुद्री मार्ग या सड़क मार्ग के मुकाबले रेलवे सबसे तेज और किफायती माध्यम साबित होता है। बांग्लादेश द्वारा भारत से 2 लाख टन गेहूं मंगवाने के फैसले के पीछे मुख्य वजहें निम्नलिखित हैं:
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त्वरित आपूर्ति (Fast Delivery): समुद्री जहाजों के जरिए आने वाले माल में महीनों का समय लग सकता है, जबकि भारतीय रेलवे नेटवर्क के जरिए सीमावर्ती रेलमार्गों से गेहूं की खेप बहुत कम समय में सीधे बांग्लादेश के गोदामों तक पहुंच रही है।
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लागत में भारी कमी: भारत भौगोलिक रूप से इतना नजदीक है कि परिवहन लागत (Transportation Cost) न्यूनतम बैठती है, जिससे बांग्लादेशी सरकार और वहां के व्यापारियों को भारी आर्थिक राहत मिली है।
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भोजन की सुरक्षा (Food Security): देश में भुखमरी और आटे की किल्लत से त्रस्त जनता को शांत करने के लिए वहां की सरकार के पास भारत से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।
तारिक रहमान और नई सरकार की नीतियों पर उठता सवाल और कूटनीतिक संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि बांग्लादेश के नए राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह घटना एक बड़ा आत्ममंथन करने वाला सबक है। एक तरफ जहां कट्टरपंथी तत्व भारत के साथ हर रिश्ते को तोड़ने की वकालत करते रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी जरूरतों जैसे कि रोटी, कपड़ा और मकान के लिए उन्हें आखिरकार भारत के ही दरवाजे पर आना पड़ा है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि क्षेत्रीय स्थिरता और आजीविका के लिए भारत का साथ होना कितना अनिवार्य है। भारतीय कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता ने एक बार फिर वैश्विक स्तर पर यह साबित कर दिया है कि भारत केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि संकट के समय पूरी मानवता का सच्चा मददगार है। इस दो लाख टन गेहूं की आपूर्ति ने यह दिखा दिया है कि कूटनीतिक मंचों पर चाहे कितनी भी दूरियां दिखाने की कोशिश क्यों न की जाए, आर्थिक और भौगोलिक सच्चाई हमेशा भारत के पक्ष में ही खड़ी रहती है।