त्योहारों से पहले अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? जानिए एथेनॉल पर सरकार की सफाई और महंगाई रोकने के नए उपाय
त्योहारों के ठीक पहले देश में आम जनता की रसोई का बजट बिगाड़ने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है. पिछले कुछ हफ्तों के भीतर ही देश में चीनी की कीमतों में जोरदार उछाल देखने को मिला है, जिससे लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आखिर सब कुछ सामान्य रहने के बावजूद मिठास इतनी महंगी क्यों हो रही है. एक तरफ जहां बाजार में यह चर्चा आम थी कि गन्ने के रस और शीरे से बड़े पैमाने पर एथेनॉल बनाए जाने के कारण चीनी की कमी हुई है, वहीं दूसरी तरफ सरकार ने इस थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया है. सरकार और खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, चीनी के महंगे होने के पीछे एथेनॉल नहीं बल्कि कुछ अन्य अंदरूनी और बाहरी कारण जिम्मेदार हैं. इस बीच बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, जिससे आने वाले दिनों में उपभोक्ताओं को राहत मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है. आइए विस्तार से समझते हैं कि इस पूरी उठापटक के पीछे की असली वजह क्या है और सरकार के फैसलों से कीमतों पर कितना असर पड़ेगा.
क्या वाकई एथेनॉल की वजह से कम हुई चीनी? जानिए सरकारी आंकड़े
आम तौर पर यह माना जा रहा था कि भारत सरकार के ग्रीन एनर्जी प्रोग्राम के तहत गन्ने के जूस और बी-हैवी मोलासेज (शीरे) को एथेनॉल उत्पादन में डायवर्ट किए जाने के कारण चीनी की पैदावार प्रभावित हुई है. लेकिन सरकार ने इन सभी अटकलों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए आंकड़े पेश किए हैं. आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, एथेनॉल के लिए चीनी के डायवर्जन की हिस्सेदारी साल 2022-23 के लगभग 12 प्रतिशत से घटकर साल 2025-26 में मात्र 9 प्रतिशत के आसपास रह गई है. इसके अलावा, देश में कुल उत्पादित होने वाले एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अब गन्ने के बजाय मुख्य रूप से अनाजों विशेषकर मक्के (Maize) से तैयार किया जा रहा है. ऐसे में यह साबित होता है कि मौजूदा समय में चीनी की कीमतों में आ रही तेजी के लिए एथेनॉल कार्यक्रम को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराना बिल्कुल भी सही नहीं है.
फिर कहां हुई चूक? जानिए चीनी के दाम बढ़ने के 5 मुख्य कारण
सरकार और बाजार के जानकारों के अनुसार, इस बार चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे कई मिले-जुले कारण काम कर रहे हैं:
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उत्पादन का अनुमान से कम रहना: इस सीजन में शुरुआती दौर में गन्ने का बंपर उत्पादन होने की उम्मीद जताई गई थी और शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख मीट्रिक टन (LMT) का था, जो घटकर अंततः लगभग 306 लाख मीट्रिक टन पर सिमट गया.
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फसल में बीमारियां और मौसम की मार: प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में अत्यधिक बारिश और जलभराव के साथ-साथ गन्ने की फसल में 'रेड रॉट' (Red Rot) और 'टॉप बोरर' (Top Borer) जैसी खतरनाक बीमारियों व कीटों के प्रकोप ने पैदावार को भारी नुकसान पहुंचाया है.
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त्योहारी सीजन की मांग: रक्षाबंधन, गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों का सीजन नजदीक आते ही देश में कन्फेक्शनरी, बेकरी, और मिष्ठान निर्माताओं द्वारा चीनी की मांग में अचानक बहुत तेजी आ जाती है.
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ग्लोबल मार्केट में सप्लाई का टाइट होना: चीनी की किल्लत और महंगाई सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक समस्या बन चुकी है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी कमी के चलते वैश्विक कीमतें काफी तेजी से ऊपर गई हैं.
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जमाखोरी और सट्टेबाजी: बाजार के कुछ हिस्सों में मुनाफाखोरों और कारोबारियों द्वारा की गई जमाखोरी (Hoarding) ने भी कृत्रिम कमी पैदा करके कीमतों को कृत्रिम रूप से ऊपर धकेलने का काम किया है.
क्या सरकार के नए फैसलों से कम होंगी कीमतें?
बढ़ती महंगाई पर नियंत्रण पाने और त्योहारी सीजन के दौरान आम आदमी को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने बेहद कड़े और समय पर कदम उठाए हैं:
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स्टॉक लिमिट का हंटर: सरकार ने देश भर के चीनी डीलरों और थोक विक्रेताओं पर सख्त स्टॉक सीमा लागू कर दी है. 1 अगस्त से 30 नवंबर तक डीलरों के लिए अधिकतम 400 टन की लिमिट तय की गई है, साथ ही बड़े व थोक उपभोक्ताओं को भी सीमित स्टॉक रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि कोई भी कालाबाजारी न कर सके.
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ड्यूटी-फ्री आयात को मंजूरी: घरेलू बाजार में तुरंत आपूर्ति बढ़ाने और संतुलन कायम करने के लिए सरकार ने लगभग 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दे दी है. लगभग एक दशक बाद इस तरह का बड़ा कदम उठाया गया है.
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अक्टूबर से क्रशिंग सीजन की शुरुआत: चीनी मिलों को आगामी 15 अक्टूबर से ही गन्ने की पिराई (Crushing) जल्द शुरू करने की सलाह दी गई है. इससे त्योहारी सीजन के पीक पर बाजार में चीनी की आवक सामान्य से कई गुना अधिक बढ़कर 10 लाख टन से ज्यादा हो जाएगी.
इन तमाम प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों के बाद यह उम्मीद की जा रही है कि जमाखोरों पर लगाम कसेगी और आने वाले दिनों में खुदरा बाजार में चीनी के तेवर नरम पड़ेंगे तथा कीमतें नियंत्रित हो सकेंगी.