Prabhat Vaibhav,Digital Desk : रंगों का त्योहार होली इस बार केवल उल्लास ही नहीं, बल्कि खगोलीय और ज्योतिषीय कौतूहल का केंद्र बन गया है। लगभग 122 वर्ष बाद एक ऐसा दुर्लभ संयोग बना है, जिसने विद्वानों और ज्योतिषियों के बीच मंथन छेड़ दिया है। साल 1904 के बाद यह पहली बार है जब होली के पर्व पर चंद्रग्रहण का साया पड़ रहा है। इस विशेष स्थिति के कारण होलिका दहन की सही तिथि को लेकर संशय बना हुआ है कि दहन 2 मार्च को हो या 3 मार्च को।
तिथि, भद्रा और ग्रहण का पेचीदा गणित
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 की शाम 5:55 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की शाम 5:07 बजे तक रहेगी। इस बीच 3 मार्च को दोपहर 3:20 बजे से शाम 6:47 बजे तक चंद्रग्रहण लगेगा। भारत में ग्रहण दृश्य होने के कारण इसका सूतक काल सुबह 9:19 बजे से ही प्रभावी हो जाएगा। भद्रा और ग्रहण के इसी 'त्रिकोण' ने मुहूर्त के निर्णय को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
2 मार्च के पक्ष में तर्क: प्रदोष काल और भद्रा पुच्छ
विद्वानों का एक वर्ग 2 मार्च को होलिका दहन के पक्ष में है। उनका तर्क है कि शास्त्रानुसार होलिका दहन के लिए पूर्णिमा का प्रदोष काल (शाम का समय) में होना अनिवार्य है, जो 2 मार्च को मिल रहा है। हालांकि, इस दिन शाम 5:55 बजे से भद्रा भी लग रही है। जानकारों का कहना है कि भद्रा के 'मुख काल' को त्यागकर 'भद्रा पुच्छ' काल में दहन किया जा सकता है। इस मत के अनुसार, 2 मार्च की शाम 6:22 बजे से रात 8:53 बजे के बीच दहन का संभावित मुहूर्त बन रहा है।
3 मार्च के समर्थन में मत: ग्रहण मोक्ष के बाद शुद्धिकरण
दूसरी ओर, भागलपुर के प्रसिद्ध बूढ़ानाथ मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित भूपेश मिश्रा सहित कई अन्य विद्वान 3 मार्च को प्राथमिकता दे रहे हैं। उनका तर्क है कि 3 मार्च को शाम 6:47 बजे ग्रहण समाप्त (मोक्ष) होने के बाद भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा। ग्रहण के सूतक और प्रभाव के बीच दहन करना शुभ नहीं माना जाता, इसलिए ग्रहण मोक्ष के बाद स्नान-दान कर शुद्ध मन से होलिका दहन करना अधिक शास्त्रसम्मत होगा। महिलाओं के लिए सलाह है कि वे सूतक लगने से पहले यानी सुबह ही होलिका पूजन संपन्न कर लें।
4 मार्च को मनेगी धुलेंडी (रंगों की होली)
भले ही होलिका दहन की तिथि पर विमर्श जारी हो, लेकिन रंगों वाली होली यानी धुलेंडी पूरे देश में 4 मार्च को ही हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि दहन चाहे 2 को हो या 3 को, होली का मूल संदेश 'अधर्म पर धर्म की विजय' और 'आपसी सौहार्द' ही है। ग्रहण का यह दुर्लभ संयोग हमें आत्ममंथन और संयम बरतने का आध्यात्मिक संदेश भी देता है।




