हॉरमुज जलडमरूमध्य में छिड़ी 'टोल वॉर': 20% टैक्स और नाकेबंदी की आहट से वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार, भारत-चीन पर मंडराया बड़ा संकट
वैश्विक अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन कहे जाने वाले 'स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज' (Strait of Hormuz) पर नियंत्रण को लेकर दुनिया की महाशक्तियों और क्षेत्रीय ताकतों के बीच एक बेहद खतरनाक होड़ शुरू हो चुकी है। फारस की खाड़ी से होने वाले वैश्विक तेल व्यापार के इस सबसे महत्वपूर्ण मुहाने पर 20 प्रतिशत का भारी-भरकम 'टोल टैक्स' वसूलने और संभावित नाकेबंदी की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सनसनी फैला दी है। इस रणनीतिक मार्ग पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में अचानक जोरदार उछाल देखने को मिल रहा है। तेल आपूर्ति बाधित होने के इस बड़े खतरे ने दुनिया के दो सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं—चीन और भारत—के नीति-निर्माताओं की धड़कनें तेज कर दी हैं।
क्यों पूरी दुनिया के लिए 'चोकपॉइंट' बना हॉरमुज?
ओमान और ईरान की सीमाओं के बीच स्थित हॉरमुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है। इसकी संकीर्ण भौगोलिक बनावट के कारण इसे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा 'चोकपॉइंट' कहा जाता है।
दुनिया भर में समुद्र के रास्ते होने वाले कुल कच्चे तेल के परिवहन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी बेहद संकरे मार्ग से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत और कतर जैसे प्रमुख उत्पादक देशों का कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इसी रास्ते से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचती है। यही वजह है कि इस रूट पर किसी भी प्रकार का टैक्स लगाना या आवाजाही रोकना पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट में धकेल सकता है।
20% टोल और नाकेबंदी के दावों से क्यों मची खलबली?
हालिया भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद इस रूट से गुजरने वाले कमर्शियल जहाजों और कार्गो पर 20% तक का अतिरिक्त टोल टैक्स लगाने की बात सामने आ रही है। इसके साथ ही तनाव चरम पर पहुंचने की स्थिति में इस रास्ते को पूरी तरह ब्लॉक करने यानी नाकेबंदी करने की धमकियां दी जा रही हैं।
यदि यह नाकेबंदी हकीकत में बदलती है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकती हैं। जहाजों के लिए नए और लंबे समुद्री रास्तों का उपयोग करने के कारण माल ढुलाई का खर्च (Freight Cost) और समुद्री बीमा प्रीमियम कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे दुनिया भर में मंदी और अभूतपूर्व महंगाई का खतरा पैदा हो गया है।
चीन की बढ़ती बेचैनी की असल वजह
चीन अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह से खाड़ी देशों से आने वाले तेल पर निर्भर है। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक होने के नाते चीन का लगभग 40 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल इसी हॉरमुज जलमार्ग से होकर गुजरता है।
इस रूट पर किसी भी तरह का व्यवधान चीन की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री और उसकी आर्थिक विकास दर को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। पहले से ही मलक्का जलडमरूमध्य के रणनीतिक संकट (Malacca Dilemma) का सामना कर रहा चीन, हॉरमुज में किसी भी नए मोर्चे या नाकेबंदी को बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वह इस क्षेत्र में अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाने में जुट गया है।
भारत के लिए क्यों खड़ी हो सकती है सबसे बड़ी मुश्किल?
भारत के लिए हॉरमुज जलडमरूमध्य में पैदा हुआ यह संकट किसी बड़े आर्थिक झटके से कम नहीं है। भारत पर इसके पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं:
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आयात बिल में भारी उछाल: भारत अपनी घरेलू जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। खाड़ी देशों से आने वाला तेल सीधे तौर पर इसी रूट का उपयोग करता है। तेल की कीमतें बढ़ने से देश का चालू खाता घाटा (CAD) तेजी से बढ़ेगा।
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घरेलू महंगाई का खतरा: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा होने से भारत में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ सकते हैं। इससे माल ढुलाई महंगी होगी, जिसके कारण दैनिक उपभोग की वस्तुएं, फल और सब्जियां आम आदमी की पहुंच से दूर हो सकती हैं।
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गैस और फर्टिलाइजर संकट: भारत अपनी कुल जरूरत की आधी से अधिक एलएनजी कतर से आयात करता है, जो इसी जलमार्ग से भारत पहुंचती है। नाकेबंदी होने पर बिजली घरों और खाद कारखानों के लिए गैस की भारी किल्लत हो सकती है।
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सामरिक और नौसैनिक चुनौतियां: इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर भारतीय व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारतीय नौसेना को अपने ऑपरेशन्स (जैसे ऑपरेशन संकल्प) का दायरा बढ़ाना होगा, जो सामरिक दृष्टिकोण से बेहद चुनौतीपूर्ण है।