चंडीगढ़ में 227 करोड़ के पुराने एजेंडे का नहीं दिया विस्तृत विवरण, बैकडोर से मंजूरी पर भड़की आप; वाटर कैनन के बीच राजभवन कूच

चंडीगढ़ में 227 करोड़ के पुराने एजेंडे का नहीं दिया विस्तृत विवरण, बैकडोर से मंजूरी पर भड़की आप; वाटर कैनन के बीच राजभवन कूच

चंडीगढ़ नगर निगम की कार्यप्रणाली, वित्तीय पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर एक बार फिर सियासत का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले कजौली वाटर वर्क्स से सेक्टर-39 तक पानी की मुख्य पाइपलाइन बदलने से जुड़े 227.7 करोड़ रुपये के विशालकाय प्रोजेक्ट को सदन में बिना किसी पूर्व सूचना, बिना वित्तीय ब्योरे और बिना विस्तृत चर्चा के 'टेबल एजेंडे' के रूप में पास कराने की कोशिश ने भारी विवाद का रूप ले लिया है। इस वित्तीय वर्ष में नगर निगम को मिलने वाले कुल सहायता अनुदान (Grant-in-Aid) के लगभग एक-तिहाई हिस्से के बराबर इस भारी-भरकम राशि के प्रस्ताव को बैकडोर से हरी झंडी दिए जाने के प्रयास पर आम आदमी पार्टी (AAP) ने कड़ा एतराज जताते हुए इसे 'टेबल एजेंडा घोटाला' करार दिया है। इस कथित अनियमितता के खिलाफ आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और पार्षदों ने सेक्टर-17 स्थित नगर निगम मुख्यालय से लेकर पंजाब राजभवन तक जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया, जहां पुलिस द्वारा बैरिकेडिंग और वाटर कैनन का इस्तेमाल किए जाने के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

कजौली वाटर वर्क्स की 227 करोड़ की पाइपलाइन और टेबल एजेंडे का खेल

चंडीगढ़ को प्रतिदिन 40 मिलियन गैलन (MGD) कच्चा पानी सप्लाई करने वाली कजौली वाटर वर्क्स के फेज-3 और फेज-4 की लगभग 28 किलोमीटर लंबी कंक्रीट की मुख्य पाइपलाइनें दशकों पुरानी हो चुकी हैं। इंजीनियरिंग विंग के पब्लिक हेल्थ विभाग के अनुसार, पाइपलाइन के रबर-रिंग जोड़ों के खराब होने, दबाव के उतार-चढ़ाव और वाटर हैमर इफेक्ट के कारण आए दिन गंभीर लीकेज हो रही है, जिससे करोड़ों लीटर पानी बर्बाद हो रहा है और मरम्मत की लागत लगातार बढ़ रही है।

इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए नगर निगम ने 1200 एमएम व्यास वाली पुरानी प्रीस्ट्रेस्ड कंक्रीट (PSC) पाइपलाइन को हटाकर उसकी जगह उच्च गुणवत्ता वाली माइल्ड स्टील (MS) पाइपलाइन बिछाने की योजना तैयार की, जिसकी कुल अनुमानित लागत 227.7 करोड़ रुपये आंकी गई। ईपीसी (EPC) मॉडल पर आधारित इस परियोजना को सदन के समक्ष लाया जाना तकनीकी रूप से जरूरी था, लेकिन विवाद प्रोजेक्ट को लेकर नहीं बल्कि इसे सदन में पेश करने के गुपचुप तरीके को लेकर खड़ा हुआ। नगर निगम की सामान्य बैठक में इस 227 करोड़ के विशाल प्रस्ताव को मुख्य एजेंडे में शामिल करने के बजाय ऐन मौके पर 'टेबल एजेंडा' बनाकर पेश किया गया और बिना किसी बहस के कुछ ही मिनटों में पास घोषित कर दिया गया।

72 घंटे पहले विवरण देने का नियम ताक पर, आम आदमी पार्टी ने खोला मोर्चा

म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन एक्ट और नगर निगम की नियमावली के अनुसार, किसी भी वित्तीय प्रस्ताव का विवरण सदन की बैठक से कम से कम 72 घंटे पहले सभी पार्षदों को आधिकारिक रूप से वितरित किया जाना अनिवार्य होता है, ताकि जनहित और जनता के टैक्स के पैसे के उपयोग पर पूरी तरह अध्ययन और पारदर्शी बहस हो सके।

आम आदमी पार्टी ने तीखा आरोप लगाया कि 227 करोड़ के इस अति-महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट का न तो कोई विस्तृत तकनीकी खाका दिया गया और न ही एजेंडे के शीर्षक में खर्च की जाने वाली राशि का स्पष्ट उल्लेख किया गया। आप नेताओं ने सवाल उठाया कि जब सामान्य तौर पर 5 या 10 लाख रुपये के छोटे विकास कार्यों के एजेंडे में भी लागत का स्पष्ट विवरण लिखा जाता है, तो फिर 227 करोड़ रुपये के इतने बड़े प्रोजेक्ट की लागत को विषय-सूची से क्यों छुपाया गया? महज दो पन्नों के संक्षिप्त नोट के सहारे शहर की जनता की गाढ़ी कमाई के 227 करोड़ रुपये को बिना किसी जांच-परख के बैकडोर से पास कराना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं और पारदर्शिता का हनन है।

सेक्टर-17 से राजभवन कूच: वाटर कैनन और पुलिस से तीखी झड़प

इस कथित बैकडोर मंजूरी के विरोध में आम आदमी पार्टी ने नगर निगम कार्यालय के बाहर उग्र विरोध प्रदर्शन किया। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, पार्षदों और सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने हाथों में तख्तियां लेकर भाजपा शासित नगर निगम के खिलाफ नारेबाजी करते हुए पंजाब के राज्यपाल व यूटी प्रशासक को ज्ञापन सौंपने के लिए राजभवन की ओर कूच किया।

प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए चंडीगढ़ पुलिस ने सेक्टर-17 में कड़े सुरक्षा इंतजाम और भारी बैरिकेडिंग की थी। जब कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड्स पार करने का प्रयास किया, तो पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारें (वाटर कैनन) चलानी पड़ीं। घंटों तक चले इस हंगामे के दौरान आप नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि 227 करोड़ के इस संदिग्ध एजेंडे की स्वतंत्र जांच नहीं कराई गई और इसे विधिवत सदन में दोबारा चर्चा के लिए नहीं लाया गया, तो वे इस मुद्दे को लेकर चंडीगढ़ के घर-घर जाएंगे और अदालत का दरवाजा भी खटखटाएंगे।

सत्तारूढ़ खेमे में भी दरार, मेयर का यू-टर्न और एजेंडा वापस लेने की नौबत

इस मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल विपक्षी दल ही नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ पार्षदों ने भी इस तरह बिना बहस टेबल एजेंडा पास कराने पर असंतोष जताया। सीनियर डिप्टी मेयर और पूर्व मेयर सहित कई पार्षदों ने नगर निगम कमिश्नर से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर टेबल एजेंडे में वित्तीय राशियों का उल्लेख न होने और जल्दबाजी में फैसले लेने पर आपत्ति दर्ज कराई।

चौतरफा राजनीतिक दबाव, विपक्षी हमलों और अपनी ही पार्टी के भीतर उठी असहमति के बाद चंडीगढ़ के मेयर सौरभ जोशी को बैकफुट पर आना पड़ा। मेयर ने नगर निगम कमिश्नर को पत्र लिखकर कजौली वाटर वर्क्स से संबंधित इस 227 करोड़ के एजेंडे को वापस लेने और आगामी सदन की बैठक में नए सिरे से विस्तृत चर्चा के लिए पेश करने का अनुरोध किया। वहीं चंडीगढ़ के सांसद मनीष तिवारी और कांग्रेस पार्टी ने भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए मांग की है कि इतने बड़े बजट के प्रोजेक्ट की निविदा शर्तों और वित्तीय आवंटन पर बिंदुवार खुली बहस होनी चाहिए।

वित्तीय पारदर्शिता और नागरिकों के भरोसे की सबसे बड़ी कसौटी

चंडीगढ़ नगर निगम पहले से ही गंभीर वित्तीय संकट और बजट की कमी से जूझ रहा है। ऐसे दौर में शहर के विकास और पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए 227 करोड़ रुपये का प्रावधान बेशक एक जरूरी कदम है, लेकिन प्रक्रियागत शुचिता और नियमों की अनदेखी किसी भी बड़े प्रोजेक्ट को भ्रष्टाचार के संशय के घेरे में खड़ा कर देती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईपीसी अनुबंधों में इंजीनियरिंग डिजाइन, स्टील पाइप की गुणवत्ता, टेस्टिंग और कमीशनिंग के हर चरण में करोड़ों रुपये का खेल होने की आशंका रहती है। इसलिए सदन में सभी 35 वार्डों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सहमति और विस्तृत ऑडिट के बाद ही ऐसे बड़े प्रस्तावों को मंजूरी दी जानी चाहिए। कजौली वाटर वर्क्स परियोजना को लेकर मचा यह राजनीतिक घमासान साबित करता है कि स्थानीय शासन में बैकडोर फैसलों के बजाय जवाबदेही और खुली चर्चा ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

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