वैशाली एक्सप्रेस में हाई वोल्टेज ड्रामा: ब्रेकयान की टूटी कुर्सी देख भड़के ट्रेन गार्ड, ड्यूटी करने से किया साफ इनकार; 1 घंटे तक खड़ी रही सुपरफास्ट ट्रेन, यात्रियों में मची अफरातफरी
भारतीय रेल की सबसे व्यस्त और लोकप्रिय सुपरफास्ट ट्रेनों में शुमार 12553/12554 वैशाली एक्सप्रेस में बीते दिनों एक बेहद चौंकाने वाला और असामान्य मामला सामने आया। ट्रेन के संचालन की अंतिम धुरी माने जाने वाले ट्रेन मैनेजर (गार्ड) ने जैसे ही ट्रेन के सबसे पिछले हिस्से यानी ब्रेकयान (SLR कोच) में कदम रखा, वहां का नजारा देखकर उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। ब्रेकयान के भीतर बैठने के लिए लगाई गई गार्ड की आधिकारिक रिवाल्विंग कुर्सी बुरी तरह टूटी और जर्जर हालत में थी। इस पर तीखी नाराजगी जताते हुए गार्ड ने स्पष्ट रूप से टूटी कुर्सी के साथ ट्रेन ले जाने से इनकार कर दिया।
ट्रेन मैनेजर के इस कड़े रुख के बाद रेलवे के परिचालन विभाग और स्टेशन प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। दोनों पक्षों के बीच काफी देर तक चली मान-मनौव्वल और आनन-फानन में दूसरी कुर्सी की व्यवस्था करने के चक्कर में वैशाली सुपरफास्ट एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म पर लगभग एक घंटे तक बिना हिले-डुले खड़ी रही। इस घटना ने जहां एक ओर सैकड़ों यात्रियों को भारी परेशानी में डाला, वहीं दूसरी ओर रेलवे की मेंटेनेंस विंग और रनिंग स्टाफ की बुनियादी सुविधाओं की कलई भी खोलकर रख दी।
प्लेटफॉर्म पर क्या हुआ? क्यों भड़क उठे ट्रेन मैनेजर?
प्रत्यक्षदर्शियों और परिचालन सूत्रों के अनुसार, ट्रेन जब अपने निर्धारित स्टॉपेज पर पहुंची, तो क्रू चेंज (चालक दल के बदलाव) के तहत नए ट्रेन मैनेजर को चार्ज संभालना था। अपनी यात्रा शुरू करने से पहले जब वे ब्रेकयान के केबिन का नियमित सुरक्षा निरीक्षण करने पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि गार्ड सीट का बेस टूटा हुआ था और वह पूरी तरह से एक तरफ झुकी हुई थी। इसके साथ ही केबिन में अत्यधिक गंदगी और खिड़कियों के शीशे भी जाम मिले।
ट्रेन मैनेजर ने तत्काल स्टेशन अधीक्षक और कंट्रोल रूम को सूचित करते हुए कहा कि लगातार 7 से 8 घंटे की थकाऊ और सतर्कता से भरी ड्यूटी के दौरान बिना समुचित सीटिंग व्यवस्था के खड़े रहकर या असंतुलित कुर्सी पर बैठकर यात्रा करना शारीरिक रूप से असंभव और असुरक्षित है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक केबिन में दुरुस्त कुर्सी नहीं लगाई जाएगी, वे ट्रेन का प्रस्थान सिग्नल (हरी झंडी/ग्रीन टॉर्च) नहीं दिखाएंगे और न ही वैक्यूम ब्रेक प्रेशर को रिलीज करने की अनुमति देंगे।
एक घंटे तक पहिये थमे रहे, यात्रियों में मची बेचैनी और गुस्सा
सुपरफास्ट दर्जे की वैशाली एक्सप्रेस, जिसे ट्रैक पर सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है, उसके मुख्य प्लेटफॉर्म पर एक घंटे तक बेवजह खड़े रहने से यात्रियों में भारी नाराजगी फैल गई। भीषण गर्मी और उमस के बीच ट्रेन में सवार सैकड़ों यात्री, जिनमें महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार मरीज भी शामिल थे, नीचे उतरकर पूछताछ केंद्र और गार्ड के डिब्बे के पास जमा हो गए।
यात्रियों को समझ नहीं आ रहा था कि इंजन ठीक होने और सिग्नल हरा होने के बावजूद ट्रेन रवाना क्यों नहीं हो रही है। जब लोगों को पता चला कि गार्ड की टूटी कुर्सी के कारण ट्रेन रुकी हुई है, तो कई यात्रियों ने नाराजगी जताई कि एक छोटी सी प्रशासनिक लापरवाही ने पूरी ट्रेन का शेड्यूल बिगाड़ दिया। इस अप्रत्याशित देरी के कारण मार्ग के आगे के स्टेशनों पर वैशाली एक्सप्रेस के पीछे चल रही कई अन्य मेल-एक्सप्रेस और मालगाड़ियों के संचालन पर भी क्रमिक असर (कैस्केडिंग डिले) पड़ा।
ट्रेन संचालन में ब्रेकयान और गार्ड की कुर्सी का तकनीकी महत्व
आम लोगों को भले ही यह मामला केवल एक 'कुर्सी' का लग सकता है, लेकिन रेलवे सुरक्षा नियमावली (General and Subsidiary Rules - G&SR) के तहत ट्रेन मैनेजर (गार्ड) की भूमिका अत्यंत संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण होती है। ट्रेन के सबसे पिछले छोर पर मौजूद ब्रेकयान में बैठकर गार्ड को निम्नलिखित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभानी होती हैं:
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लगातार एयर प्रेशर गेज और वैक्यूम मीटर की मॉनिटरिंग करना ताकि ट्रेन के किसी भी डिब्बे में ब्रेक बाइंडिंग या प्रेशर लीकेज का तुरंत पता चल सके।
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प्रत्येक स्टेशन, केबिन और क्रॉसिंग पर स्टेशन मास्टर व गेटमैन के साथ दोनों तरफ से झंडी या सिग्नल लाइट का सुरक्षित आदान-प्रदान (Signal Exchange) करना।
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चलती ट्रेन के पहियों से निकलने वाले धुएं, चिंगारी (Hot Axle) या हैंगिंग पार्ट्स पर लगातार दोनों खिड़कियों से नजर रखना।
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किसी भी तकनीकी विफलता, डिरेलमेंट के खतरे या आपात स्थिति में तुरंत गार्ड इमरजेंसी ब्रेक वॉल्व (BP Valve) को संचालित करना।
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि 110 से 130 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ने वाली सुपरफास्ट ट्रेन में गार्ड के डिब्बे में अत्यधिक कंपन और झटके (Jerks) लगते हैं। यदि गार्ड के पास मजबूत, शॉक-एब्जॉर्बिंग और फिक्स सीट न हो, तो तेज झटके के दौरान गार्ड का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे वे गंभीर रूप से चोटिल हो सकते हैं या आपातकालीन प्रतिक्रिया देने में चूक हो सकती है।
रेलवे प्रशासन में मचा हड़कंप, स्टेशन मास्टर के दफ्तर से लाई गई नई कुर्सी
मामला जब मंडल रेल प्रबंधक (DRM) कार्यालय और वरिष्ठ मंडल परिचालन प्रबंधक (Sr. DOM) तक पहुंचा, तो हड़कंप मच गया। कैरिज एंड वैगन (C&W) विभाग के तकनीकी स्टाफ और स्टेशन पर मौजूद अधिकारियों को तत्काल मौके पर भेजा गया। पहले तो गार्ड को मौखिक रूप से समझाकर अगले बड़े जंक्शन तक चलने का आग्रह किया गया, लेकिन सुरक्षा नियमों का हवाला देते हुए गार्ड अपनी मांग पर पूरी तरह अड़े रहे।
स्थिति को बिगड़ता देख रेलवे कर्मचारियों ने आपातकालीन समाधान निकाला। स्टेशन मास्टर के कार्यालय या प्रतीक्षालय से एक मजबूत गद्देदार कुर्सी मंगाकर मैकेनिकों की मदद से ब्रेकयान के भीतर वेल्डिंग और नट-बोल्ट के जरिए अस्थायी रूप से मजबूती से फिक्स कराया गया। इसके साथ ही प्रेशर मीटर और इमरजेंसी वॉल्व की जांच की गई। तकनीकी रूप से संतुष्ट होने के बाद ही ट्रेन मैनेजर ने हरी झंडी दिखाई और ट्रेन करीब 60 मिनट की देरी से गंतव्य के लिए रवाना हो सकी।
रनिंग स्टाफ की कार्यदशा और मेंटेनेंस पर कर्मचारी यूनियनों ने उठाए सवाल
इस घटना के बाद ऑल इंडिया गार्ड्स काउंसिल (AIGC) और रेलवे कर्मचारी यूनियनों ने कोचिंग डिपो तथा प्राइमरी मेंटेनेंस यार्डों की कार्यशैली पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। यूनियनों का आरोप है कि कोचिंग डिपो से ट्रेन को 'फिट' सर्टिफिकेट जारी करते समय गार्ड के ब्रेकयान की जांच में घोर लापरवाही बरती जाती है।
यूनियन प्रतिनिधियों का कहना है कि आज भी कई ट्रेनों के ब्रेकयानों में बेसिक सुविधाएं नदारद हैं। न तो वहां ठीक से पंखे काम करते हैं, न ही चार्जिंग पॉइंट या साफ-सुथरा बायो-टॉयलेट उपलब्ध होता है। वर्षों पुरानी टूटी कुर्सियों के सहारे रनिंग स्टाफ को अपनी जान जोखिम में डालकर 8 से 10 घंटे की कठिन ड्यूटी करनी पड़ती है। गार्ड का यह विरोध किसी जिद का परिणाम नहीं, बल्कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी के खिलाफ जायज प्रतिक्रिया थी।
रेलवे ने दिए जांच के आदेश, जिम्मेदार कर्मियों पर गिर सकती है गाज
मंडल रेल प्रशासन ने इस पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है। सीनियर डीओएम और सीनियर डीएमई (C&W) की संयुक्त टीम को इस मामले की विस्तृत जांच सौंपी गई है। जांच इस बात पर केंद्रित है कि प्रारंभिक यार्ड (Primary Maintenance Depot) में मेंटेनेंस और रोलिंग-इन परीक्षण के दौरान ब्रेकयान की टूटी कुर्सी को ठीक क्यों नहीं किया गया और डिफेक्ट रजिस्टर में इसका उल्लेख होने के बावजूद इसे अनदेखा क्यों किया गया।
अधिकारियों का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद कोचिंग डिपो के जिम्मेदार सुपरवाइजरों और फिटरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में इस तरह की मामूली खामी के कारण किसी भी महत्वपूर्ण सुपरफास्ट ट्रेन के परिचालन में बाधा न पहुंचे।