Sawan 2026: पवित्र सावन माह में जान लें क्यों भगवान शिव को नहीं चढ़ाई जाती तुलसी, क्या है देवी वृंदा से जुड़ी पौराणिक कथा?

Sawan 2026: पवित्र सावन माह में जान लें क्यों भगवान शिव को नहीं चढ़ाई जाती तुलसी, क्या है देवी वृंदा से जुड़ी पौराणिक कथा?

सनातन धर्म में चातुर्मास और विशेष तौर पर सावन मास (Sawan 2026) को देवाधिदेव महादेव की आराधना के लिए सबसे श्रेष्ठ और पवित्र महीना माना जाता है। इस पावन काल में देश भर के शिवालयों में 'ॐ नमः शिवाय' की गूंज सुनाई देती है और भक्तजन श्रद्धा के साथ शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि तमाम पूजा सामग्रियों और फूलों के बीच भगवान शिव को कभी भी तुलसी (Tulsi) के पत्ते नहीं चढ़ाए जाते हैं? हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना गया है, फिर भी महादेव की पूजा में इसे वर्जित क्यों माना गया है, इसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

देवी वृंदा और जलंधर की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं और शिव पुराण के अनुसार, प्राचीनकाल में जलंधर नाम का एक बहुत ही पराक्रमी और अहंकारी असुर हुआ करता था, जो भगवान शिव के ही अंश से उत्पन्न हुआ था। जलंधर को अजेय इसलिए माना जाता था क्योंकि उसकी पत्नी वृंदा (Vrinda) अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थी। वृंदा के सतीत्व और पवित्रता के बल पर ही जलंधर तीनों लोकों में अजेय हो गया था और उसने देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया था। जब देवताओं के लिए जलंधर को हराना असंभव हो गया, तो सभी देवता अपनी गुहार लेकर भगवान विष्णु और शिवजी के पास पहुंचे।

भगवान विष्णु का छल और वृंदा का श्राप

जलंधर के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु को एक कठिन निर्णय लेना पड़ा। वृंदा के व्रत और पतिव्रता धर्म को खंडित करने के लिए भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया, जिससे वृंदा का संकल्प टूट गया। जैसे ही वृंदा का सतीत्व भंग हुआ, युद्ध के मैदान में देवताओं ने जलंधर का वध कर दिया। जब वृंदा को इस छल का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने भगवान विष्णु को पत्थर (शालिग्राम) बन जाने का श्राप दे दिया। हालांकि, भगवान विष्णु के अनुरोध और अपनी तपस्या के बल पर वृंदा ने स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया। उनकी राख से ही तुलसी के पौधे की उत्पत्ति हुई।

क्यों भगवान शिव की पूजा में वर्जित है तुलसी?

कथा के अनुसार, जिस जलंधर का वध भगवान शिव ने किया था, वह असल में वृंदा का पति था। अपने पति की मृत्यु और भगवान विष्णु के छल से उपजे दुखों के कारण वृंदा ने महादेव की पूजा और शिवलिंग पर तुलसी अर्पित करने को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। इसके अलावा, एक अन्य पौराणिक प्रसंग यह भी कहता है कि तुलसी पूर्व जन्म में जलंधर की पत्नी थीं, इसलिए शिव पूजन में उनका प्रयोग वर्जित माना गया है। यही कारण है कि भगवान विष्णु और उनके स्वरूप शालिग्राम को जहां तुलसी के बिना अधूरा माना जाता है, वहीं महादेव के अभिषेक और पूजन में बेलपत्र, धतूरा और आक के फूल ही मुख्य रूप से अर्पित किए जाते हैं।

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