कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बड़ा खतरा! पुल के एक्सपेंशन ज्वाइंट्स में आईं गहरी दरारें, NHAI और कार्यदायी संस्था में हड़कंप; सुरक्षा जांच तेज

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बड़ा खतरा! पुल के एक्सपेंशन ज्वाइंट्स में आईं गहरी दरारें, NHAI और कार्यदायी संस्था में हड़कंप; सुरक्षा जांच तेज

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और औद्योगिक नगरी कानपुर के बीच आवागमन को सुगम व हाई-स्पीड बनाने के उद्देश्य से तैयार किए जा रहे महत्वाकांक्षी कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे (NE-6) के निर्माण में एक बार फिर गंभीर गुणवत्ता संबंधी खामी सामने आई है। एक्सप्रेसवे पर बने फ्लाईओवरों और बड़े पुलों के पियर कैप्स तथा एक्सपेंशन ज्वाइंट्स (जोड़ों) में लंबी और चौड़ी दरारें साफ तौर पर देखी गई हैं।

इस तकनीकी विफलता के सामने आते ही भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI), स्थानीय प्रशासन और परियोजना से जुड़ी निर्माण एजेंसियों में भारी खलबली मच गई है। एक्सप्रेसवे के शुरू होने से पहले ही इस प्रकार संरचनात्मक विकृतियां सामने आने से करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट की निर्माण गुणवत्ता और पर्यवेक्षण तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

उन्नाव और नवाबगंज खंड के पुलों पर उभरीं खतरनाक दरारें

विभागीय सूत्रों और स्थानीय निरीक्षण रिपोर्टों के अनुसार, दरारें मुख्य रूप से उन्नाव जिले की सीमा में पड़ने वाले नवाबगंज, बनी और गदनखेड़ा के समीप बने एलिवेटेड स्ट्रक्चर व पुलों के जॉइंट्स पर उभरी हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, पुल के दो बड़े कंक्रीट गर्डरों को जोड़ने वाले एक्सपेंशन जॉइंट्स के आसपास का डामर और कंक्रीट कई स्थानों पर उखड़ गया है, जिससे कई मीटर लंबी गहरी दरारें बन गई हैं।

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि एक्सप्रेसवे पर 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भारी व हल्के वाहनों के दौड़ने की योजना है। ऐसे में यदि पुलों के जोड़ों में निर्माण के समय ही दरारें विकसित हो रही हैं, तो वाहनों के नियमित आवागमन और भारी कंपन (Vibration) के चलते यह स्थिति भविष्य में किसी बड़े संरचनात्मक हादसे का रूप ले सकती है।

तकनीकी खामी के पीछे क्या हैं मुख्य कारण?

इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के प्रारंभिक विश्लेषण में एक्सपेंशन जॉइंट्स में दरारें पड़ने के कई संभावित तकनीकी कारण चिह्नित किए गए हैं:

  • इलास्टोमेरिक या नियोप्रीन बेयरिंग की गलत फिटिंग या उनका अनुचित संरेखण (Misalignment), जिसके कारण भार का वितरण असमान हो जाता है।

  • कंक्रीटिंग के दौरान मानकों के अनुरूप क्यूरिंग (तराई) न होना और अत्यधिक तापमान भिन्नता के कारण कंक्रीट में थर्मल संकुचन (Thermal Shrinkage) पैदा होना।

  • जॉइंट सीलेंट और इलास्टिक फिलर्स की घटिया गुणवत्ता, जो कंक्रीट स्लैब के स्वाभाविक फैलाव और सिकुड़न को सहन नहीं कर पाए।

  • गर्डर लॉन्चिंग के समय संरचनात्मक भार की गलत गणना या निर्माण सामग्री के मिश्रण (Mix Design) में खामी।

डेडलाइन का दबाव और निर्माण गुणवत्ता से समझौता करने के आरोप

कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे लगभग 63 किलोमीटर लंबा 6-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड व ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट है, जिसकी कुल अनुमानित लागत ₹4,700 करोड़ से अधिक है। इस एक्सप्रेसवे का निर्माण दो प्रमुख पैकेजों में किया जा रहा है—पहला पैकेज लखनऊ के अमौसी (शहीद पथ) से उन्नाव के बनी तक (करीब 18 किमी एलिवेटेड) और दूसरा पैकेज बनी से कानपुर सीमा पर आजाद चौराहा तक (करीब 45 किमी)।

इस परियोजना को जल्द से जल्द यातायात के लिए खोलने के राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के बीच निर्माण की गति तो तेज की गई, लेकिन स्थानीय निवासियों और जानकारों का आरोप है कि कार्यदायी संस्थाओं ने गुणवत्ता नियंत्रण मानकों की अनदेखी की। इससे पूर्व भी मिट्टी धंसने और बारिश के दौरान सर्विस रोड के क्षतिग्रस्त होने के मामले प्रकाश में आ चुके हैं।

NHAI की उच्चस्तरीय तकनीकी टीम और IIT विशेषज्ञों द्वारा जांच शुरू

दरारों के संज्ञान में आते ही एनएचएआई के परियोजना निदेशक (Project Director) और वरिष्ठ स्ट्रक्चरल इंजीनियरों के दल ने प्रभावित स्थलों का गहन स्थलीय मुआयना किया है। एनएचएआई मुख्यालय ने पूरे मामले की स्वतंत्र और विस्तृत तकनीकी जांच के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT कानपुर) और केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) के स्ट्रक्चरल विशेषज्ञों की विशेष कमेटी से संपर्क किया है।

प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार, सभी पुलों और एलिवेटेड पिलरों की नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग (NDT) और अल्ट्रासोनिक पल्स वेलोसिटी टेस्ट कराया जाएगा, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दरारें केवल सतह तक सीमित हैं या कंक्रीट गर्डर के आंतरिक ढांचे में भी कोई गंभीर फ्रैक्चर हुआ है।

मरम्मत कार्य और री-इंजीनियरिंग की प्रक्रिया

प्रभावित हिस्सों पर दुर्घटनाओं को रोकने और स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए तात्कालिक उपाय शुरू कर दिए गए हैं:

  • प्रभावित एक्सपेंशन जॉइंट्स के चारों ओर मजबूत बैरिकेडिंग कर दी गई है और भारी मशीनरी की आवाजाही को सीमित कर दिया गया है।

  • दरारों को भरने के लिए विशेष हाई-स्ट्रेंथ नॉन-श्रिंक इपॉक्सी ग्राउटिंग (Epoxy Grouting) और पॉलिमराइज्ड सीलेंट का उपयोग किया जा रहा है।

  • जिन स्थानों पर बेयरिंग या एक्सपेंशन स्ट्रिप्स में गड़बड़ी पाई जाएगी, उन्हें पूरी तरह से बदलकर नए सिरे से री-इंजीनियरिंग की जाएगी।

  • पूरे 63 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर मौजूद सभी 18 बड़े पुलों, 28 छोटे पुलों और 4 बड़े फ्लाईओवरों का संयुक्त लोड टेस्ट (Load Capacity Testing) दोबारा कराया जाएगा।

स्थानीय नागरिकों, दैनिक यात्रियों और जनप्रतिनिधियों में गहरी चिंता

कानपुर और लखनऊ के बीच प्रतिदिन 40,000 से अधिक वाहनों की आवाजाही होती है। दोनों शहरों के बीच यात्रा समय को 2.5 घंटे से घटाकर मात्र 45 से 50 मिनट करने का सपना संजोए बैठे दैनिक यात्रियों और ट्रांसपोर्टरों ने इस लापरवाही पर गहरी चिंता जताई है।

स्थानीय व्यापारिक संगठनों और नागरिक मंचों ने मांग की है कि जब तक स्वतंत्र ऑडिट एजेंसियों से 'सुरक्षा एवं संरचनात्मक स्थिरता प्रमाणपत्र' (Safety & Structural Stability Certificate) जारी नहीं हो जाता, तब तक इस एक्सप्रेसवे पर किसी भी प्रकार के सार्वजनिक या भारी व्यावसायिक वाहनों का संचालन न शुरू किया जाए। साथ ही निर्माण में घटिया सामग्री इस्तेमाल करने वाली संविदा कंपनियों और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त वित्तीय व विधिक दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।

एक्सप्रेसवे के औपचारिक लोकार्पण पर पड़ सकता है असर

शुरुआती योजना के अनुसार, इस एक्सप्रेसवे के मुख्य कैरिजवे को इसी वर्ष पूर्ण रूप से यातायात के लिए समर्पित किया जाना था। हालांकि, पुलों के जोड़ों में आई दरारों की विस्तृत जांच, मरम्मत और पुनः भार परीक्षण की प्रक्रिया में अतिरिक्त समय लगने की प्रबल संभावना है।

एनएचएआई के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा मानकों के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा। तकनीकी रिपोर्ट आने और सभी प्रभावित स्पैन के पुख्ता सुदृढ़ीकरण के बाद ही अंतिम फिटनेस प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा, जिससे इसके औपचारिक उद्घाटन में कुछ महीनों का विलंब हो सकता है।

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