झारखंड में 'मंत्री बनाम DGP' जंग: राधाकृष्ण किशोर का बड़ा बयान- 'कैबिनेट के प्रति जवाबदेह हैं अफसर, मुझे जवाब लेना आता है'

झारखंड में 'मंत्री बनाम DGP' जंग: राधाकृष्ण किशोर का बड़ा बयान- 'कैबिनेट के प्रति जवाबदेह हैं अफसर, मुझे जवाब लेना आता है'

झारखंड के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इस समय 'मंत्री बनाम पुलिस महानिदेशक (DGP)' का विवाद चरम पर पहुंच गया है। सत्ता पक्ष के मंत्रियों और राज्य के शीर्ष पुलिस अधिकारियों के बीच जारी इस जुबानी जंग और खींचतान के बीच प्रदेश के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री राधाकृष्ण किशोर का एक बेहद तल्ख और बड़ा बयान सामने आया है। राधाकृष्ण किशोर ने नौकरशाही (Bureaucracy) को आड़े हाथों लेते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लोकतंत्र में कोई भी अधिकारी सर्वोपरि नहीं हो सकता; सभी अफसर अंततः कैबिनेट के प्रति ही जवाबदेह हैं। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी भरे लहजे में कहा कि "मुझे अच्छी तरह पता है कि अफसरों से जवाब कैसे लिया जाता है।"

क्या है 'मंत्री बनाम डीजीपी' विवाद की असली वजह?

झारखंड में यह विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ मंत्रियों और सत्ताधारी विधायकों ने पुलिस प्रशासन की कार्यशैली, कानून-व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी किए जाने का गंभीर आरोप लगाया। मंत्रियों का मानना था कि पुलिस के आला अधिकारी उनके निर्देशों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, जिससे जनता के बीच सरकार की छवि प्रभावित हो रही है।

इस मुद्दे पर जब डीजीपी और पुलिस महकमे के शीर्ष अधिकारियों का रुख सामने आया, तो सरकार और ब्यूरोक्रेसी के बीच की खाई और चौड़ी हो गई। इस टकराव ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं कि राज्य में कानून का इकबाल बड़ा है या राजनीतिक रसूख।

'अफसर कैबिनेट के प्रति जवाबदेह हैं, मालिक नहीं'

इसी पूरे विवाद पर अपनी बेबाक राय रखते हुए राधाकृष्ण किशोर ने साफ किया कि कार्यपालिका (Executive) हमेशा विधायिका (Legislature) के प्रति उत्तरदायी होती है। उन्होंने कहा कि मंत्रियों के पास जनता का जनादेश होता है और वे कैबिनेट का हिस्सा होते हैं।

  • प्रशासनिक मर्यादा की याद दिलाई: राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि कोई भी अधिकारी चाहे वह कितने ही बड़े पद (जैसे DGP) पर क्यों न बैठा हो, वह नीतिगत फैसलों और जनता की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार और कैबिनेट के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह है।

  • अनुभव का हवाला: उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बड़े अधिकारियों के साथ काम किया है और उन्हें नियमों के दायरे में रखकर काम कराना और उनसे सही तरीके से जवाब मांगना बहुत अच्छी तरह आता है।

ब्यूरोक्रेसी और मंत्रियों के बीच बढ़ता अविश्वास

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राधाकृष्ण किशोर का यह बयान राज्य में ब्यूरोक्रेसी पर राजनीतिक नियंत्रण को दोबारा स्थापित करने की एक मजबूत कोशिश है। पिछले कुछ समय से झारखंड में यह शिकायतें आम रही हैं कि अधिकारी वर्ग जनप्रतिनिधियों के फोन नहीं उठाते या जनहित के मामलों को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।

किशोर ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधिकारी अपनी सीमाएं लांघने की कोशिश करेगा या कैबिनेट के प्रति अपनी जवाबदेही से भागेगा, तो इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार के पास अधिकारियों को अनुशासित करने और उनसे काम लेने के कई संवैधानिक और प्रशासनिक तरीके मौजूद हैं। इस बयान के बाद अब राज्य की ब्यूरोक्रेसी और पुलिस महकमे की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

Latest Posts