जानिए क्या है बिहार और उत्तर प्रदेश के दियारा भूमि विवाद, इस वजह से हर साल होता है यहां खूनी खेल

वर्ष 1997 के अंत आते -आते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस विवाद पर अपना निर्णय दिया जिसका पालन अब भी बिहार -यूपी के किसान आधे अधूरे मन से कर रहे हैंं।

बक्सर।। बिहार- उत्तर प्रदेश का दियारा भूमि विवाद हर वर्ष खेल की पटकथा लिखता है। इस विवाद में अब तक बिहार के तैंंतीस किसानोंं ने अपनी जान गंवायी है। एक ही दिन चौदह किसानोंं की गोलीमार कर सामूहिक हत्या भी की गई थी ।बिहार -यूपी के दियरा सीमा विवाद की पृष्ठभूमि वर्षोंं पुरानी है। आजाद भारत के संविधान के लागू होते ही 1953 में बिहार -यूपी सीमा विवाद की प्रथम गूंज भारतीय संसद में सुनाई दी थी।

 

तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु और गृह मंत्री सरदार पटेल की पहल पर त्रिवेदी आयोग का गठन कर इस भूमि विवाद को हल करने की पहल हुई थी। बाद में वर्षोंं तक यह भूमि विवाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चलता रहा जहांं बिहार और यूपी के किसान आमने सामने थे। वर्ष 1997 के अंत आते -आते इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस विवाद पर अपना निर्णय दिया जिसका पालन अब भी बिहार -यूपी के किसान आधे अधूरे मन से कर रहे हैंं।

इस विवाद के मूल में गंगा नदी को माना गया। गंगा नेे अपनी चंचल प्रकृति के कारण गुलाम भारत से आजाद भारत तक या यूंं कहेंं कि 1952 से 1996 तक भूूूमि का कटाव करकेदोनों राज्यों के बीच सीमा रेखा खींंचने में हर वक्त अड़चने पैदा की। इसी अड़चन के कारण दोनों ही राज्यों के बीच आज भी तैंंतीस हजार एकड़ दियारा क्षेत्र की भूमि पर फसल बुवाई से लेकर फसल कटाई तक हर वर्ष खूनी खेल होता है और खिलाड़ी होते हैंं बिहार- यूपी के दियरा क्षेत्र के किसान।

यह गनीमत थी कि वर्ष 1996 के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने बक्सर के तत्कालीन सांसद स्वर्गीय लालमुनी चौबे की पहल पर निजी तौर पर पहल करते हुए दियारा कटाव ग्रस्त क्षेत्र की पैमाईश करवाकर मझरिया गाँव से ब्रह्मपुर तक लगभग 18 किलोमीटर के कटाव क्षेत्र में पत्थरों के छलके बनवाये। इसके बाद अब स्थिति यह है कि यहांं के लोग कटाव से तो निजात पा गये पर फसल कटाई को लेकर अब भी दोनों ही राज्यों के किसान आमने- सामने होते हैंं ।और हर वर्ष खूनी खेल की पटकथा लिख ही देते है ।

अपने चंचल स्वभाव को लेकर बरसात के दिनों में गंगा भूमि को काटती है तो कटी हुई मिट्टी विपरीत दिशा में जाती है। चूंकि हर वर्ष गंगा ने बिहार की भूमि को सर्वाधिक काटा है जो गंगा चरित्र के कारण अब यूपी की तथाकथित सीमा में चली गयी है और यही विवाद का मूल भी है।

यहां गंगा की भगौलिक संरचना इतनी जटिल है कि इस दियरा का कोई निर्धारित सीमांकन हो ही नहींं सकता। कारण यह है कि बिहार के किसान मिट्टी को अपना मान कर फसलोंं बोते हैंं पर फसल कटाई के समय सीमा की दुहाई देते हुए यूपी के किसान तैयार फसल पर अपना हक जताते हैंं और शुरू होता है खूली संघर्ष। इस वक्त हथियारों से लैस दोनों ही राज्यों के किसान शक्ति प्रदर्शन के तौर पर जिसमेंं जितना दम होता है उतनी फसल वे काट लेते हैंं।

अजब नियम है यहांं। भूमि की पैमाईश की और बरसात के बाद गंगा का जल उतरते ही बिहार के किसान लाठियों से जमीन की नापी करते हुए जिसकी जैसी माली हालत उतनी लाठी जमीन पर फसल को बोते हैंं। उर्वरता से भरपूर गंगा की इस मिटटी पर ना सिंंचाई करनी होती है ना जोत ही करना पड़ता है। बस बीज डालना ही काफी है और फसल तैयार हो जाती है।

बिहार के किसानोंं का दर्द यह है और यहां के किसान कहते भी हैंं कि भगौलिक सीमा संरचना के कारण गंगा के तट पर वे अपनी कटी हुई जमीन पर ही खेती करते हैंं पर यूपी के किसान पीएसी के सहयोग से हमारी अधिकांंश फसलोंं को काट लेते हैंं। बार- बार गुहार लगाने पर भी बक्सर जिला प्रशासन हमारा सहयोग नहींं करता। हम अपने वैध और अवैध हथियारों के बल बूते ही फसलोंं की आंशिक कटाई करते हैंं जबकि यूपी के किसानोंं के पक्ष में खुल कर वहांं की पुलिस अपने हथियारों के साथ खड़ी होती है। कभी- कभी तो गोलियांं भी चलाती है।

आज आलम यह है कि बिहार के नैनीजोर के गायघाट मौजा से जवही ,नगपुरा ,साधुबाबा का डेरा ,सिमरी ,नियाजिपुर से लगे दर्जनों गाँवों के किसान विवाद की इन समस्याओं से ग्रस्त हैंं। केंद्र सरकार के कृषि संशोधन कानून का यहांं कोई मतलब नहींं। बस यहांं जिसकी लाठी उसकी भैस का एक मात्र कानून लागू होता है। जनप्रतिनिधियों के लिए यहांं के किसान सिर्फ और सिर्फ वोटर हैंं ,किसानोंं की समस्याओं से जनप्रतिनिधियों का कोई सरोकार नहींं रहता।

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