आज्ञाकारी पत्नी बनने से बेहतर है एक खूंखार गैंगस्टर बनना चुनूंगी

आज्ञाकारी पत्नी बनने से बेहतर है एक खूंखार गैंगस्टर बनना चुनूंगी

भारतीय साहित्य और राजनीतिक सक्रियता के मंच पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए हमेशा सुर्खियों में रहने वाली बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने एक बार फिर अपने बयानों से देश-दुनिया में खलबली मचा दी है। हाल ही में दिए गए उनके एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू ने न केवल साहित्यिक गलियारों बल्कि वैचारिक और सामाजिक मंचों पर भी एक गहरी बहस छेड़ दी है। अपने इस साक्षात्कार के दौरान उन्होंने समाज की उन पारंपरिक संरचनाओं और रूढ़िवादी मान्यताओं पर तीखा प्रहार किया है जो सदियों से महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके आत्मसम्मान का गला घोंटती चली आ रही हैं। अरुंधति रॉय ने अपने चिर-परिचित आक्रामक और स्पष्टवादी अंदाज में जिस प्रकार अपने आंतरिक विद्रोह को शब्दों में पिरोया है, उसने हर सुनने वाले को गहराई से झकझोर कर रख दिया है।

पारंपरिक पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सीधा और करारा प्रहार

साक्षात्कार के दौरान बातचीत का सिलसिला जब समाज में महिलाओं की स्थिति और पितृसत्तात्मक ढांचे पर पहुंचा, तो अरुंधति रॉय ने बिना किसी लाग-लपेट के अपनी राय रखी। उनका यह स्पष्ट मानना है कि हमारा समाज आज भी महिलाओं से यह उम्मीद करता है कि वे चुपचाप हर नियम को स्वीकार करें, एक 'आज्ञाकारी पत्नी' या आदर्श बहू बनकर अपनी पूरी पहचान को चूल्हे-चौके और पारिवारिक सीमाओं में समेट लें। इस दमनकारी व्यवस्था पर तंज कसते हुए उन्होंने बेहद चौंकाने वाली लेकिन गहरे अर्थ समेटे हुई बात कही कि यदि उन्हें पारंपरिक सांचे में ढलने वाली एक आज्ञाकारी पत्नी और समाज की नजरों में बगावती छवि रखने वाले एक गैंगस्टर में से किसी एक को चुनना पड़े, तो वह बिना एक पल गंवाए 'गैंगस्टर' बनना पसंद करेंगी। उनके इस रूपक (metaphor) ने रूढ़िवादी मानसिकता के उन तमाम पैरोकारों को बेचैन कर दिया है जो महिलाओं को हमेशा अधीन देखना चाहते हैं।

बगावत की भाषा और स्वतंत्र विचारों की अनूठी अभिव्यक्ति

अरुंधति रॉय के इस बयान को महज़ एक जुमला या तीखा व्यंग्य कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके पीछे उनका दशकों का वैचारिक संघर्ष और वैयक्तिक अनुभव जुड़ा हुआ है। उनका यह कथन दरअसल उस दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ खुला विद्रोह है जो महिलाओं के स्वतंत्र अस्तित्व को कुचलने का काम करती है। एक लेखिका के तौर पर उन्होंने हमेशा से सत्ता, व्यवस्था और अन्याय के खिलाफ अपनी कलम को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। इस इंटरव्यू में उन्होंने यह भी दर्शाया कि कैसे समाज महिलाओं को विद्रोही होने की सजा देता है और उन्हें मुख्यधारा से काटने का प्रयास करता है। उनका यह मानना है कि जब तक महिलाएं अपनी शर्तों पर जीना नहीं सीखेंगी और पारंपरिक अपेक्षाओं की बेड़ियों को नहीं तोड़ेंगी, तब तक समाज में वास्तविक समानता और स्वतंत्रता की कल्पना करना भी बेमानी होगा।

सोशल मीडिया और वैचारिक जगत में छिड़ी तीखी बहस

जैसे ही अरुंधति रॉय का यह एक्सक्लूसिव इंटरव्यू सार्वजनिक हुआ, इंटरनेट के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिक्रियाओं का सैलाब आ गया। एक तरफ जहां नारीवादी विचारकों, स्वतंत्र चिंतकों और प्रगतिशील युवाओं ने उनके इस मुखर समर्थन की भूरी-भूरी प्रशंसा की है और इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक साहसी बयान बताया है, वहीं दूसरी तरफ पारंपरिक और दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने उनकी इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के बयानों से पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक मर्यादाओं को ठेस पहुंचती है। इसके बावजूद, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अरुंधति रॉय ने एक बार फिर अपनी बेबाकी से समाज के उस संवेदनशील कोने को छू लिया है जिस पर बात करने से अमूमन लोग कतराते हैं, और यही कारण है कि यह इंटरव्यू हर जगह चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

साहित्य, समाज और व्यवस्था के बीच का जटिल रिश्ता

अरुंधति रॉय का पूरा जीवन और उनका लेखन साहित्य, राजनीति और सामाजिक न्याय के बीच बुने गए एक जटिल ताने-बाने का प्रतीक रहा है। उनका यह नया साक्षात्कार इस बात की गवाही देता है कि उम्र और अनुभवों के बढ़ने के साथ-साथ उनके भीतर व्यवस्था के प्रति तेवर और अधिक धारदार होते गए हैं। वे सिर्फ किताबों की दुनिया तक सीमित रहने वाली लेखिका नहीं हैं, बल्कि जमीन पर उतरकर हर उस अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करती हैं जिसे समाज सामान्य मानकर स्वीकार कर चुका है। 'आज्ञाकारी पत्नी' से लेकर 'गैंगस्टर' बनने तक की उनकी यह तुलना भले ही प्रतीकात्मक हो, लेकिन यह पितृसत्ता की नींव को हिलाने के लिए काफी है। आने वाले समय में उनके इस बयान पर वैचारिक और साहित्यिक बहसों का दौर लंबी अवधि तक चलने की पूरी संभावना है, जो समाज को आत्ममंथन करने के लिए लगातार मजबूर करता रहेगा।