UP में ओवैसी की सक्रियता और दिल्ली में DMK की एंट्री से गरमाई राष्ट्रीय राजनीति
भारतीय राजनीतिक के गलियारों में हर गुजरते दिन के साथ समीकरण जिस तेजी से बदल रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि आगामी चुनावी लड़ाइयों के लिए सभी दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक मैदान में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की बढ़ती सक्रियता और दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में दक्षिण भारत के मजबूत गढ़ से उठी डीएमके (DMK) की सुगबुगाहट ने राष्ट्रीय राजधानी की सियासत का पारा अचानक बहुत हाई कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं कि क्या देश में एक बार फिर से कांग्रेस और बीजेपी दोनों से समान दूरी बनाते हुए एक सशक्त 'नॉन-बीजेपी-नॉन-कांग्रेस' यानी तीसरे मोर्चे (Third Front) की कवायद को दोबारा जिंदा करने की कोशिश की जा रही है। क्षेत्रीय दलों का यह बदलता रवैया और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ जमाने की छटपटाहट इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में देश का चुनावी परिदृश्य बेहद दिलचस्प और बहुकोणीय होने वाला है।
देश के दो सबसे अहम सियासी मोर्चों—उत्तर भारत के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश और दक्षिण के पावर हाउस तमिलनाडु—से उठने वाली इन राजनीतिक हवाओं के राष्ट्रीय राजनीति पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे, आइए इस विस्तृत और गहन विश्लेषण के जरिए एक-एक पहलू को बहुत ही बारीकी से समझते हैं।
उत्तर प्रदेश के रण में ओवैसी की आक्रामक एंट्री: क्या मुस्लिम वोटों के समीकरण में होने वाला है बड़ा उलटफेर?
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की सक्रियता हमेशा से मुख्यधारा के दलों के लिए चर्चा और चिंता का विषय रही है। ओवैसी एक बार फिर से यूपी के उन इलाकों में अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गए हैं जहां मुस्लिम मतदाता किसी भी दल की जीत और हार तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ओवैसी का यह प्रयास रहता है कि वे पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी (SP) या कांग्रेस को वोट देने वाले मुस्लिम वर्ग के एक बड़े हिस्से को अपने पक्ष में गोलबंद करें। हालांकि विरोधी दल अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि ओवैसी की पार्टी केवल बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव लड़ती है, लेकिन ओवैसी इन आरोपों को खारिज करते हुए अपने दम पर वंचितों और पिछड़ों की आवाज उठाने का दावा करते हैं।
उत्तर प्रदेश में ओवैसी के इस प्रकार लगातार दौरे करने, जनसभाएं करने और स्थानीय मुद्दों पर आक्रामक तेवर दिखाने से सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्षी गठबंधन दोनों की नींद उड़ी हुई है। यदि यूपी के चुनाव में ओवैसी कुछ चुनिंदा सीटों पर भी मजबूत सेंधमारी करने में कामयाब हो जाते हैं, तो वहां का पूरा चुनावी गणित बिगड़ सकता है। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले किसी भी नए राजनीतिक समीकरण या तीसरे मोर्चे की चर्चाओं में उत्तर प्रदेश की इन क्षेत्रीय चालों को बहुत गौर से देखा जा रहा है।
दिल्ली में दक्षिण से उठी गूंज: डीएमके (DMK) की सक्रियता और राष्ट्रीय राजनीति में उसकी बढ़ती भूमिका
उत्तर प्रदेश में चल रही हलचल के ठीक विपरीत, देश की राजधानी दिल्ली में दक्षिण भारत की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी और तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को और अधिक धारदार बनाना शुरू कर दिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की रणनीतिक चालें यह संकेत दे रही हैं कि डीएमके अब केवल अपने राज्य तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर तमाम गैर-भारतीय जनता पार्टी दलों के बीच एक नया वैचारिक और राजनीतिक समन्वय स्थापित करने की कोशिश कर रही है। हालांकि डीएमके वर्तमान में कांग्रेस के साथ गठबंधन में है, लेकिन समय-समय पर पार्टी के बयानों और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों ने यह साफ कर दिया है कि वे अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय पहचान और संघीय ढांचे (Federal Structure) के मुद्दों पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं।
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि क्या दक्षिण के ये दल एक ऐसे वैकल्पिक राजनीतिक मंच की वकालत कर रहे हैं जो कांग्रेस की केंद्रीय भूमिका के बिना भी देश की अन्य मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों को एक छत के नीचे ला सके। जब देश के अलग-अलग कोनों से इस तरह की क्षेत्रीय आवाजें उठती हैं, तो राष्ट्रीय राजधानी में 'थर्ड फ्रंट' की सुगबुगाहट तेज होना स्वाभाविक है। क्षेत्रीय दलों का यह मानना है कि राष्ट्रीय दल उनकी स्थानीय भावनाओं और समस्याओं की उपेक्षा करते हैं, इसलिए राज्यों के विकास के लिए क्षेत्रीय ताकतों का मजबूत होना अनिवार्य है।
क्या सचमुच देश में 'नॉन-बीजेपी-नॉन-कांग्रेस' थर्ड फ्रंट की जमीन तैयार हो रही है?
राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो देश में 'तीसरे मोर्चे' की यह अवधारणा कोई नई नहीं है। 1990 के दशक से लेकर कई अन्य अवसरों पर जब भी दो राष्ट्रीय दल (कांग्रेस और बीजेपी) के सामने एक मजबूत विकल्प की बात आई, तब-तब क्षेत्रीय क्षत्रपों ने मिलकर थर्ड फ्रंट बनाने की कोशिश की है। हालांकि अतीत के अनुभवों से यह देखा गया है कि वैचारिक मतभेदों, प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षाओं और आपसी खींचतान के कारण ये मोर्चे लंबे समय तक टिक नहीं पाए। इसके बावजूद, मौजूदा राजनीतिक हालात में एक बार फिर से इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो गई है कि क्या उत्तर में ओवैसी जैसे नेता और दक्षिण में डीएमके जैसी पार्टियां अप्रत्यक्ष रूप से एक ऐसी व्यवस्था की ओर इशारा कर रही हैं जहां क्षेत्रीय दल अपनी शर्तों पर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस पार्टी जहां एक तरफ अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है, वहीं क्षेत्रीय दल अपनी सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) को कम नहीं होने देना चाहते। जब ओवैसी जैसे नेता यूपी में स्वतंत्र रूप से अपनी ताकत बढ़ाते हैं, तो वह मुख्य विपक्षी गठबंधन के वोटों में बिखराव पैदा करते हैं, जिसका सीधा लाभ अक्सर सत्ताधारी एनडीए को मिलता है। दूसरी ओर, डीएमके जैसी पार्टियां दक्षिण भारत में अपने मजबूत किले को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय नीतियों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
क्षेत्रीय अस्मिता बनाम राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: आगामी चुनावों की असली और बड़ी चुनौती
आगामी समय में होने वाले विभिन्न राज्यों के चुनावों और राष्ट्रीय परिदृश्य को यदि जोड़कर देखा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राजनीति अब दोध्रुवीय (Bipolar) रहने के बजाय पूरी तरह बहुध्रुवीय (Multipolar) होती जा रही है। एक तरफ जहां बीजेपी राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के साथ अपनी राष्ट्रव्यापी पकड़ को मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दल अपनी-अपनी भाषाई, सांस्कृतिक और स्थानीय अस्मिता के आधार पर मतदाताओं को साधने में लगे हैं। ओवैसी का मुस्लिम अधिकारों की बात करना और दक्षिण से डीएमके का राज्यों के अधिकारों (State Autonomy) के लिए आवाज उठाना इसी बहुध्रुवीय राजनीति का हिस्सा है।
आम जनता के लिए यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में ये क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर क्या नया गुल खिलाते हैं। क्या ये सभी दल मिलकर किसी तीसरे मोर्चे के रूप में कोई ठोस विकल्प पेश कर पाएंगे या फिर यह केवल चुनावी मौसम की जुबानी बयानबाजी बनकर रह जाएगी? इसका जवाब आने वाला वक्त ही देगा, लेकिन इतना तय है कि इन गतिविधियों ने देश की सियासत का तापमान काफी बढ़ा दिया है।