केंद्र सरकार ने झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति को तुरंत रद्द करने की उठाई मांग

केंद्र सरकार ने झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति को तुरंत रद्द करने की उठाई मांग

देश की राजधानी नई दिल्ली से झारखंड के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों तक इस वक्त एक बहुत बड़ी और भूचाल ला देने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने राज्य की हेमंत सोरेन सरकार और केंद्र के बीच एक नया और गंभीर टकराव पैदा कर दिया है। भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवा के सर्वोच्च मानकों तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर समय-समय पर जारी किए गए स्पष्ट दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने झारखंड में वर्तमान डीजीपी की नियुक्ति पर गहरी आपत्ति जताई है। केंद्र सरकार की ओर से संबंधित प्राधिकारियों को भेजे गए आधिकारिक पत्रों और निर्देशों में यह कड़े शब्दों में कहा गया है कि झारखंड सरकार द्वारा राज्य के नए डीजीपी के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के उन ऐतिहासिक फैसलों और नियमों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है, जिनमें यूपीएससी (UPSC) के माध्यम से पैनल भेजने और पारदर्शी तरीके से चयन करने की अनिवार्य शर्त रखी गई थी। केंद्र सरकार के इस आक्रामक और सख्त रुख के सामने आने के बाद से रांची से लेकर दिल्ली तक प्रशासनिक हलकों में भारी खलबली मच गई है और यह कयास लगाए जाने लगे हैं कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य के बीच यह विवाद कानूनी और राजनीतिक रूप से और अधिक तूल पकड़ सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं इस पूरे विवाद के पीछे की कानूनी पेचीदगियों और केंद्र सरकार की आपत्तियों के मुख्य बिंदुओं के बारे में।

क्या है पूरा मामला और क्यों सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देकर केंद्र ने उठाए डीजीपी की नियुक्ति पर सवाल

पूरा घटनाक्रम तब गर्माया जब झारखंड सरकार द्वारा राज्य में पुलिस बल के मुखिया यानी डीजीपी पद पर एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की गई, जिसे लेकर प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने कई पुराने और ऐतिहासिक फैसलों (विशेषकर प्रकाश सिंह मामले में) में यह बेहद स्पष्ट और कड़े निर्देश दिए थे कि देश के किसी भी राज्य में पुलिस महानिदेशक (DGP) के पद पर नियुक्ति के लिए एक निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया के तहत राज्य सरकारों को अपने यहां के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का एक पैनल संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के पास भेजना होता है, जहाँ से यूपीएससी द्वारा योग्यता और अनुभव के आधार पर नामों को शॉर्टलिस्ट करके वापस राज्य सरकार को भेजा जाता है, और उसी पैनल में से किसी एक अधिकारी को डीजीपी चुना जा सकता है। केंद्र सरकार का यह मुख्य आरोप है कि झारखंड सरकार ने इस स्थापित और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया या यूपीएससी के निर्धारित मानदंडों का पूरी तरह से पालन किए बिना ही अपनी मर्जी से डीजीपी की नियुक्ति कर दी, जो सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना और नियमों का खुला उल्लंघन है।

केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन के बीच गहराता टकराव: प्रशासनिक और संवैधानिक संकट के मंडराने लगे साए

केंद्र सरकार द्वारा झारखंड के डीजीपी की नियुक्ति को रद्द करने की मांग उठाने के बाद से राज्य की प्रशासनिक मशीनरी के सामने एक बहुत बड़ा संवैधानिक और व्यावहारिक संकट खड़ा हो गया है। जानकारों का कहना है कि जब केंद्र सरकार किसी राज्य में पुलिस प्रमुख जैसे संवेदनशील और शीर्ष पद पर की गई नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विरुद्ध मानती है, तो इसका मतलब है कि केंद्र और राज्य के बीच प्रशासनिक असहयोग की खाई और अधिक चौड़ी होने वाली है। एक तरफ जहां झारखंड सरकार अपनी स्वायत्तता और स्थानीय प्रशासनिक जरूरतों का हवाला देकर इस नियुक्ति को सही ठहराने की कोशिश कर सकती है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय इस बात पर अड़े हैं कि देश के संघीय ढांचे में सर्वोच्च अदालत के दिशानिर्देशों का पालन करना हर राज्य के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी है। इस गतिरोध के कारण न केवल राज्य पुलिस बल के भीतर भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है, बल्कि पुलिस प्रशासन की सर्वोच्च कमान को लेकर भी अनिश्चितता का माहौल बनता जा रहा है।

आने वाले दिनों में क्या होगा इसका राजनीतिक और कानूनी असर: क्या झारखंड सरकार को झुकना पड़ेगा या मामला पहुंचेगा अदालत

राजनीतिक और कानूनी विश्लेषकों का यह मानना है कि यह पूरा प्रकरण आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में एक बहुत बड़ा भूचाल ला सकता है, क्योंकि विपक्ष पहले से ही राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक मोर्चे पर विफल होने के आरोप लगाता रहा है। यदि केंद्र सरकार के इस दबाव के बाद झारखंड सरकार स्वेच्छा से इस नियुक्ति को रद्द नहीं करती है, तो मामला एक बार फिर से सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच सकता है, जहाँ अदालत की अवमानना या नियमों के उल्लंघन को लेकर कड़ी टिप्पणियां देखने को मिल सकती हैं। पुलिस सुधारों के जानकारों का हमेशा से यह कहना रहा है कि पुलिस विभाग जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील महकमे को राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रखने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शी डीजीपी चयन प्रक्रिया की व्यवस्था बनाई थी, ताकि अधिकारी बिना किसी दबाव के निष्पक्ष होकर कानून का राज स्थापित कर सकें। बहरहाल, केंद्र के इस सख्त फरमान के बाद झारखंड के राजनीतिक गलियारों में सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है और हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रांची और दिल्ली के बीच चल रहे इस प्रशासनिक रस्साकशी का अंत किस रूप में होता है।