पब्लिक ट्रांसपोर्ट से क्यों उचट रहा है जनता का मोह

पब्लिक ट्रांसपोर्ट से क्यों उचट रहा है जनता का मोह

आज के दौर में जब देश के महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों तक ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और सफर की समस्याएं दिन-प्रतिदिन विकराल रूप लेती जा रही हैं, तब सरकारें और नगर निकाय लगातार यह दावा करते हैं कि नागरिकों को प्रदूषणमुक्त और सुगम यात्रा देने के लिए बस (Buses), मेट्रो (Metro) और लोकल ट्रेनों जैसी सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) प्रणालियों को मजबूत किया जा रहा है। कागजों और विज्ञापनों में इन योजनाओं के आंकड़े भले ही बेहद शानदार और लुभावने दिखाई देते हों, लेकिन जब जमीनी स्तर पर आम यात्री की सुबह की शुरुआत होती है, तो उसकी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है। आज आलम यह है कि शहर का आम नागरिक या नौकरीपेशा इंसान अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि केवल और केवल अपनी बेबस मजबूरी के चलते बसों और मेट्रो में धक्के खाने को विवश है। लोगों के मन में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को लेकर लगातार असंतोष बढ़ रहा है और वे धीरे-धीरे इससे किनारा करने लगे हैं, जिसके पीछे कई गहरे प्रशासनिक और व्यावहारिक कारण छिपे हुए हैं।

बसों की लेट-लतीफी, खस्ताहाल हालत और भीड़भाड़: रोजाना सफर करने वालों का टूटता है सब्र का बांध

सार्वजनिक बसों की स्थिति पर अगर नजर डाली जाए तो अधिकांश डिपो और रूटों पर चलने वाली सरकारी व अनुबंधित बसें अपनी तय समय-सारणी से कोसों दूर चलती हैं। सुबह ऑफिस या कॉलेज जाने वाले छात्र-छात्राओं और कर्मचारियों को बस स्टॉप पर घंटों खड़े रहकर बसों का इंतजार करना पड़ता है, और जब बस आती भी है तो वह इतनी ज्यादा खचखच भरी होती है कि पैर रखने तक की जगह नहीं मिलती। पुरानी सीटें, टूटी हुई खिड़कियां, बारिश में टपकती छतें और गर्मियों में बिना पंखे या एसी के दमघोंटू माहौल ने बस यात्रा को एक सजा जैसा बना दिया है। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए इन बसों में सुरक्षित और आरामदायक सफर करना किसी चुनौती से कम नहीं रह गया है। यही कारण है कि जो व्यक्ति एक बार बस की इस जद्दोजहद से गुजरता है, वह किसी तरह कर्ज लेकर या अपनी जमा पूंजी जोड़कर दोपहिया वाहन या कार खरीदने की सोचने पर मजबूर हो जाता है, ताकि वह इस रोज-रोज के मानसिक तनाव से मुक्ति पा सके।

मेट्रो की बढ़ती कीमतें, आखिरी छोर तक कनेक्टिविटी का अभाव और जनता की बढ़ती आर्थिक परेशानियां

बड़े शहरों में जहां एक तरफ मेट्रो ट्रेन (Metro Train) ने सफर को तेज और आधुनिक बनाया है, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी की जेब पर इसका बढ़ता बोझ अब भारी पड़ने लगा है। मेट्रो का किराया लगातार महंगा होता जा रहा है, जिससे दिहाड़ी मजदूरों, छोटे दुकानदारों और कम वेतन वाले कर्मचारियों के लिए हर दिन का सफर आर्थिक रूप से बहुत खर्चीला साबित हो रहा है। इसके अलावा, मेट्रो स्टेशनों से घर या दफ्तर तक यानी 'लास्ट माइल कनेक्टिविटी' (Last Mile Connectivity) की स्थिति आज भी बेहद दयनीय है। मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही ऑटो और ई-रिक्शा चालकों की मनमानी फीस, तय मीटर का अभाव और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यात्रियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यदि कोई यात्री रात के समय लौट रहा है, तो स्टेशन के बाहर से सुरक्षित अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए उसे कई तरह की अनिश्चितताओं से जूझना पड़ता है, जो सार्वजनिक परिवहन की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

निजी वाहनों की तरफ बढ़ता रुझान और ट्रैफिक का जहर, क्या भविष्य में सुधरेगी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तस्वीर?

जब सरकारें और यातायात विभाग जनता को सुरक्षित, सस्ती और आरामदायक यात्रा देने में असफल साबित होते हैं, तो आम नागरिक अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करके दोपहिया या चार पहिया वाहन खरीदने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यही वजह है कि आज देश की सड़कों पर निजी वाहनों (Private Vehicles) की संख्या बेहिसाब बढ़ चुकी है, जिसके कारण हर सुबह और शाम लंबा ट्रैफिक जाम, ध्वनि प्रदूषण और जहरीली हवा आम बात बन गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार को वास्तव में प्रदूषण कम करना है और शहरों की रफ्तार को दुरुस्त रखना है, तो केवल बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि बसों की संख्या बढ़ानी होगी, समय की पाबंदी तय करनी होगी, किराए को किफायती रखना होगा और सुरक्षा के कड़े इंतजाम करने होंगे। जब तक आम आदमी को यह भरोसा नहीं हो जाता कि सार्वजनिक परिवहन उसकी जेब और समय दोनों के अनुकूल है, तब तक मजबूरी का यह सफर यूं ही जारी रहेगा और शहर कंक्रीट के साथ-साथ ट्रैफिक के जाल में घुटते रहेंगे।