यूक्रेन युद्ध में फ्लॉप साबित हुए T-14 आर्मटा टैंक को रूस ने भारत को किया ऑफर
दुनिया के रक्षा उद्योग और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अपने सबसे पुराने और रणनीतिक दोस्त भारत को रूस ने अपने सबसे अत्याधुनिक और विवादित मुख्य युद्धक टैंक यानी T-14 आर्मटा (T-14 Armata Tank) का नया ऑफर पेश किया है। भारतीय सेना अपने पुराने हो चुके रूसी T-72 टैंकों के विशाल बेड़े को बदलने के लिए 'फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल' (FRCV) प्रोग्राम के तहत 1700 से अधिक नए और आधुनिक टैंकों की तलाश कर रही है। इसी विशाल रक्षा सौदे को झपटने के लिए रूसी रक्षा कंपनी उरालवागोनज़ावोड और रोस्टेक ने भारत को T-14 आर्मटा के स्थानीय निर्माण (Local Production) और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ कस्टमाइज्ड मॉडल देने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, इस बड़े प्रस्ताव के सामने आते ही रक्षा विशेषज्ञों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं क्योंकि जिस टैंक पर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनकी खुद की सेना यूक्रेन युद्ध में पूरी तरह भरोसा नहीं जता सकी, उसे भारत को बेचे जाने के पीछे रूस की क्या रणनीति है?
आखिर यूक्रेन युद्ध के मैदान में क्यों असफल साबित हुआ T-14 आर्मटा और क्यों इसे फ्रंटलाइन से हटाना पड़ा?
रूस ने साल 2015 में पहली बार जब T-14 आर्मटा टैंक का प्रदर्शन किया था, तो इसे दुनिया की सबसे घातक 'नेक्स्ट-जनरेशन वार मशीन' बताया गया था। इसमें मानव रहित मानवरहित टर्रेट (Unmanned Turret), डिजिटल बैटल मैनेजमेंट सिस्टम और क्रू कैप्सूल आर्मर सुरक्षा जैसे आधुनिक फीचर्स शामिल थे। लेकिन जब यूक्रेन युद्ध का मैदान गरमाया, तब रूसी सेना ने इस हाई-टेक टैंक के बजाय अपने पुराने और भरोसेमंद T-90 और T-80 टैंकों पर ही दांव लगाना पसंद किया। जुलाई 2023 के आसपास रूस ने कुछ T-14 टैंकों को अग्रिम मोर्चे पर उतारा तो सही, लेकिन अत्यधिक तकनीकी खराबी, इंजन में आ रही दिक्कतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के खतरे को देखते हुए उन्हें बिना किसी बड़े सीधे मुकाबले के चुपचाप फ्रंटलाइन से वापस बुला लिया गया। इसके अलावा, रोस्टेक के प्रमुख सर्गेई चेमेजोव ने भी यह स्वीकार किया था कि यह टैंक अत्यधिक महंगा (High Cost) है, जिसके कारण रूसी सेना युद्ध क्षेत्र में अधिक किफायती टैंकों का ही इस्तेमाल कर रही है।
खुद इस्तेमाल न करके भारत को बेचना क्यों चाहता है रूस? 'मेक इन इंडिया' और फंडिंग का पूरा खेल
रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि रूस द्वारा भारत को T-14 आर्मटा का कस्टमाइज्ड मॉडल ऑफर करने के पीछे उसकी गहरी आर्थिक और तकनीकी जरूरतें छिपी हुई हैं। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंधों के चलते रूस अकेले T-14 का बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) करने और इसके शोध व विकास पर फंड खर्च करने में असमर्थ साबित हो रहा है। यही कारण है कि रूस भारत को 'मेक इन इंडिया' की मेक-I श्रेणी के तहत इसमें साझेदार बनाना चाहता है, जिसमें 70% तक सरकारी फंडिंग मिलती है। रूसी प्रस्ताव के अनुसार, इस टैंक में रूस के विवादित 12N360 इंजन की जगह भारत का स्वदेशी DATRAN-1500HP इंजन लगाया जा सकता है, एंटी-ड्रोन जैमर दिए जा सकते हैं और भारत में निर्माण होने से प्रति यूनिट लागत में भी बड़ी कमी आएगी। यानी रूस भारत के विशाल बाजार और रक्षा बजट के सहारे अपने इस लटके हुए टैंक प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित करना चाहता है।
भारतीय सेना की हिचकिचाहट और आगे का रास्ता: क्या भारत स्वीकार करेगा रूसी प्रस्ताव?
भारतीय सेना साल 2015 से ही T-14 आर्मटा का मूल्यांकन कर रही है, लेकिन रक्षा अधिकारियों के मन में इस टैंक की लड़ाकू विश्वसनीयता (Combat Proven Status) को लेकर कई बड़े संदेह हैं। जब खुद रूसी सेना युद्ध के मैदान में इसका खुलकर इस्तेमाल नहीं कर पा रही है, तो भारतीय सेना इतनी भारी-भरकम राशि किसी ऐसे प्लेटफॉर्म पर निवेश नहीं करना चाहती जिसका युद्ध क्षेत्र में रिकॉर्ड खराब रहा हो। इसके अतिरिक्त, भारत का प्राथमिक ध्यान अपनी मेक इन इंडिया नीति के तहत स्वदेशी टैंक प्लेटफॉर्म तैयार करने या ऐसे साझेदार को चुनने पर है जो बिना किसी भू-राजनीतिक झंझट के शत-प्रतिशत तकनीक का हस्तांतरण करे। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या भारत रूस के इस अपग्रैडेड कस्टमाइज्ड प्रस्ताव को स्वीकार करता है या फिर अपनी भविष्य की जरूरतों के लिए किसी अन्य विकल्प या स्वदेशी प्रोजेक्ट की राह पकड़ता है।